2 अक्टूबर पर नोएडा लोकमंच के महासचिव महेश सक्सेना ने व्यक्त की अपनी पीड़ा , अफ़सर हो गये अहंकारी, निवासियों की पहुँच से हो गए दूर
अधिकारियों और नोएडा वासियों के बीच खिंच गई एक अजीब-सी दूरी की लकीर
विनम्रता की जगह ले लिया अहंकार
नोएडा । 2 अक्टूबर पर नोएडा लोकमंच के महासचिव महेश सक्सेना ने अपनी मन की पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि देश हम सबके प्रिय बापू और राष्ट्र के स्वाभिमान लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस की औपचारिकता निभा रहा है, चंद अपवादों को छोड़कर देश आज बापू और शास्त्री के बताए हुए मार्ग से पूरी तरह हट चुका है।
उन्होंने कहा कि आने वाले 6 माह में मैं जीवन के आठवें दशक में प्रवेश करने जा रहा हूँ। लगभग 42 वर्षों से, अपनी युवावस्था से आज तक, नोएडा में बदलते परिवेश, बदलते अधिकारियों की कार्यशैली और बदलते मूल्यों को देखता आया हूँ। बहुत भारी मन से कहना पड़ रहा है कि देश के युवाओं के हाथों में देश का वर्तमान है और हमारे नन्हे-मुन्ने बच्चे इस देश का भविष्य हैं, परंतु हम वरिष्ठ नागरिकों ने मूल्य, आचरण और व्यवहारशीलता में पिछले लगभग 30 वर्षों में भारी गिरावट देखी है। भारत का गौरवशाली अतीत सोने की चिड़िया वाले देश के सपने के स्थान पर हम आज के बच्चों को पश्चिम की नकल वाला, क्रोध और अहंकार से भरा वातावरण ही दे पाए हैं। हिंसा, नफ़रत, प्रतिशोध और उचित-अनुचित की अनदेखी अपने चरम पर है, और आपसी प्रेम-भाव जाति और वर्ण में बँटकर लुप्तप्राय हो चुका है।
उन्होंने अपने बीते समय को याद करते हुए बताया कि पाकिस्तान युद्ध के दौरान शास्त्री जी ने देशवासियों से अपील की थी कि सोमवार के दिन एक समय का भोजन त्याग दें। तब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.एससी. का छात्र था। हमने अपने हॉस्टल के महाराज से स्पष्ट कह दिया था कि सोमवार को आप हॉस्टल से नदारद रहेंगे, ताकि खाना बनने की कोई संभावना ही न रहे। और जब ताशकंद से शास्त्री जी के देहांत का समाचार मिला, तो जीवन में पहली और अंतिम बार हम अपने देश के नेता के अंतिम दर्शन के लिए बिना टिकट यात्रा करके दिल्ली आए। उस समय के हम युवा अपने नेताओं से आत्मा से जुड़े हुए थे और देशप्रेम हम सबके लहू में था।
महेश सक्सेना ने बताया कि 1985 में जब हमने नोएडा के सेक्टर 9 में अपना उद्योग प्रारंभ किया, तब से लेकर वर्ष 2000 तक हम नोएडा वासी भाग्यशाली रहे कि हमें हेमेंद्र कुमार,प्रशांत मिश्रा, टी. जॉर्ज जोसेफ, विनोद कुमार मल्होत्रा, डॉ. प्रभात कुमार, सुशील त्रिपाठी, बलविंदर कुमार, सुनीता कंडवाल, एन. विश्वनाथन, डॉ. अरुणवीर सिंह, दीपक कुमार, मनोज कुमार सिंह जैसे अध्यक्ष, मुख्य कार्यपालक अधिकारी और जिलाधिकारी मिले।इनके पास जाने में नोएडा वासियों को यह संतोष रहता था कि मुलाक़ात सहजता से हो जाएगी और बात ध्यान से सुनी जाएगी। इन अधिकारियों को अच्छे और बुरे नोएडा वासियों की भली-भाँति पहचान थी; प्रत्येक को उसके स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार मिलता था।
लोकमंच के महासचिव श्री सक्सेना ने उन वर्षों को याद करते हुए बताया कि वर्ष 2000 तक नोएडा के निवासियों में हमने परस्पर आत्मीयता पाई। हिंसा और नफ़रत कम ही दिखाई देती थी और भौतिकता की होड़ भी उतने चरम पर नहीं थी। उस समय अधिकारी नोएडा वासियों और नोएडा के लिए नीतियाँ बनाते थे। परंतु पिछले लगभग 25 वर्षों में अधिकारियों और नोएडा वासियों के बीच एक अजीब-सी दूरी की लकीर खिंच गई है। आज भले लोग प्राधिकरण और सरकारी दफ़्तरों में मजबूरीवश तो जाते हैं, परंतु उन्हें न वह संतुष्टि मिलती है और न समस्या का प्राथमिकता पर वह निदान, जो पहले मिलता था। आज के अधिकारियों से मिलना अपने आप में एक कठिन कार्य हो गया है , बिना किसी सिफ़ारिश या पूर्व फ़ोन के मिलना लगभग असंभव-सा है। जबकि पहले हमने नोएडा में देखा है कि कुछ मुख्य कार्यपालक अधिकारियों और अध्यक्षों ने तो अपने कार्यालय में आमजन से मिलने के लिए खुली खिड़कियाँ और द्वारपाल-रहित व्यवस्था रखी थी। कोई भी निवासी प्रातः 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक अपनी समस्या के लिए इन अधिकारियों से सीधे मिल सकता था। आज के अधिकारी सरकार की इच्छा और निर्देशानुसार, राजनीतिक हितों के लिए ही मौखिक निर्देशों पर कार्यरत हैं; क्षेत्र का विकास और उसकी ज़रूरतों से कहीं दूर, केवल शासनादेश ही इनकी कार्यशैली बन चुका है। उस समय के शीर्ष अधिकारी नोएडा के विभिन्न क्षेत्रों का अचानक भ्रमण भी करते थे और सामाजिक तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट लोगों से मिल-बैठकर सलाह और विचार-विमर्श भी करते थे। नोएडा के जागरूक नागरिकों से उनके भावनात्मक संबंध थे और वे सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में भाग भी लेते थे। तब आम भारतवासी को ये अफ़सर सहजता से मिल जाते थे, मगर शायद अब इन अफ़सरों का क़द इतना ऊँचा हो गया है कि ये आम भारतवासी की पहुँच से दूर हो गए हैं। अब इनका बहुमूल्य समय सिर्फ़ रसूखदार, राजनीतिक या प्रभावशाली लोगों के लिए ही उपलब्ध है।
उन्होंने अपना सुझाव देते हुए कहा कि आज के युवाओं को इस चुनौती से गुजरते हुए बेहतर भारत के लिए समस्या का निदान खोजना ही होगा। जब देश के अधिकारी और राजनेता आमजन की सेवार्थ और सहायतार्थ कार्यशैली सबके लिएएक समान अपनाएँगे, तभी देशप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा अपने चरम पर होगी। काश, स्वर्णिम भारत-काल हमारे युवा ला सकें! हमने तो अधिकारों के बारे में ही ज़्यादा सोचा; कर्तव्य की अपेक्षा हमने सिर्फ़ फ़ौजियों और चंद सुशासकों से की। हम सबको देशहित में अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों पर विशेष ध्यान देना होगा।