जाति से ग्रस्त भारत नहीं, जाति-मुक्त भारत ही विकसित भारत है
डॉ उमेश शर्मा भारत में जाति प्रथा आज एक वीभत्स और विकृत रूप धारण कर चुकी है। यह अब केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्थानों, विद्यालयों, गाँवों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में गहराई से समा चुकी है। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जो इसके प्रभाव से अछूता हो। जिस समाज ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” की कल्पना की थी, वही समाज आज जाति के संकुचित दायरों में सिमटता जा रहा है। जाति का सर्वव्यापी प्रभाव आज स्थिति यह है कि विद्यालयों और संस्थानों में योग्यता से पहले जाति देखी जाती है। गाँवों में व्यक्ति का सामाजिक सम्मान उसके आचरण या योगदान से नहीं, बल्कि उसकी जाति से तय होता है। पंचायत चुनाव हों, आरडब्लूए (RWA) के चुनाव हों या लोकसभा के चुनाव—अधिकांश स्थानों पर मत मुद्दों और नीतियों के आधार पर नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों के आधार पर पड़ता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा को भीतर से कमजोर करती है और नागरिक चेतना को संकीर्ण बनाती है। जाति आधारित राजनीति के नुकसान जाति आधारित राजनीति ने देश...