*नवरात्रा: आत्मशक्ति जागरण का मनोवैज्ञानिक उत्सव”*
डॉ उमेश शर्मा नवरात्रा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव मन और चेतना को संतुलित करने वाला एक गहन मनोवैज्ञानिक उत्सव भी है। यह नौ दिनों का पर्व हमें बाहरी जगत से हटकर अपने भीतर झाँकने, आत्मविश्लेषण करने और मानसिक शुद्धि की ओर अग्रसर करता है। भारतीय परंपरा में नवरात्रि को देवी शक्ति की उपासना का समय माना गया है, लेकिन इसके पीछे छिपा मनोवैज्ञानिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, नवरात्रा आत्मनियंत्रण का अभ्यास कराता है। उपवास (व्रत) केवल शारीरिक शुद्धि का माध्यम नहीं, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण और मानसिक दृढ़ता को विकसित करने का साधन है। जब व्यक्ति अपनी आदतों और इच्छाओं को नियंत्रित करता है, तो उसका आत्मविश्वास और आत्मबल बढ़ता है। यह प्रक्रिया मन को स्थिर और केंद्रित बनाती है। दूसरे, यह पर्व सकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। देवी की आराधना, मंत्रों का जाप और भक्ति संगीत मन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा भरते हैं। यह एक प्रकार की ध्यान प्रक्रिया है, जो तनाव, चिंता और अवसाद को कम करने में सहायक होती है। सामूहिक पूजा और उत्सव में भाग लेने से व्यक्ति को...