श्राद्ध और पितृ पक्ष मृत पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अनुष्ठान

 


डॉ कुसुम पथरिया 

श्राद्ध और पितृ पक्ष मृत पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, उन्हें याद करने और उनकी आगे की यात्रा में सहयोग करने का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।कृतज्ञता का भाव रखें।यह अपने माता-पिता और पिछली पीढ़ियों के प्रति आभार जताने का समय है, जिनकी बदौलत आज हमारा जीवन और अस्तित्व है।शारीरिक और ऊर्जावान अभिव्यक्ति: मृत्यु के बाद भी शरीर और जीवन की ऊर्जा कुछ समय तक अलग तरह से काम करती है। अनुष्ठान और क्रियाएं मृत व्यक्ति की ऊर्जा को शांति और स्थिरता देने में मदद करते हैं।पूर्वजों तथा दिवंगत रिश्तेदारों के कल्याण के लिए 'कालभैरव शांति' और 'काल भैरव कर्म' जैसे अनुष्ठान कराए जाते हैं, जो शरीर छोड़ने वाले जीव को गति और सहायता प्रदान करते हैं।यह पुण्यकाल है पितृ पक्ष को किसी भी प्रकार का अशुभ काल मानने के बजाय पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा से किए गए कर्मों के लिए एक सकारात्मक व पवित्र समय  बिताना चाहिए।दशहरे के पहले जो अमावस्या की रात आती है उसे ‘महालया अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है। एक तरह से इसी दिन से दशहरा की शुरुआत हो जाती है। जब इस धरती पर सिर्फ पशु थे, उस समय सिर्फ जीवित रहने की जद्दोजहद थी। बस खाना, सोना, प्रजनन करना और एक दिन मर जाना ही जीवन था। फिर धीरे-धीरे उस पशु ने विकास करना शुरू किया। पशु की तरह चलने की जगह उसने खड़ा होना शुरू किया, धीरे-धीरे उसका दिमाग विकसित होने लगा और उसकी क्षमताएं तेजी से बढ़ने लगी। विकसित होकर वह पशु, इंसान बना। इंसान होने की सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि हम औजारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। औजारों का इस्तेमाल कर सकने की इस साधारण क्षमता को हमने बढ़ाया और उसे तकनीकों के विकास तक ले गए। जिस दिन एक वानर ने अपने हाथों की बजाय किसी पशु की हड्डी उठाकर उसकी मदद से लड़ना शुरू किया था, जिस दिन उसे अपनी जिन्दगी को आसान बनाने के लिए अपने शरीर के अलावा औजारों के इस्तेमाल की जरूरी समझ आ गई, एक तरह से धरती पर वही मानव जीवन की शुरुआत थी।

इंसान होने की सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि हम औजारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह विशेष दिन हमारी उन सभी पिछली पीढ़ियों को समर्पित होता है, जिन्होंने हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया है। इस दिन कुछ भेंट करके हम उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान और उनके पूर्वज 2 करोड़ सालों से इस धरती पर हैं। यह एक बहुत लंबा समय है। इस धरती पर हमसे पहले रहने वाली इन लाखों पीढ़ियों ने हमें कुछ न कुछ जरूर दिया है। हम जो भाषा बोलते हैं, जिस तरह बैठते हैं, हमारे कपड़े, हमारी इमारतें – आज हम जो कुछ भी जानते हैं, लगभग हर चीज हमें पिछली पीढ़ियों से मिली है ।

हमारे पास आज जो भी चीजें हैं, हम उनका महत्व नहीं समझते। लेकिन हमसे पहले आने वाली पीढ़ियों के बिना, पहली बात तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता, दूसरी बात, उनके योगदान के बिना हमारे पास वे चीजें नहीं होतीं, जो आज हमारे पास हैं। इसलिए आज के दिन हम उनका महत्व समझते हुए उन सब के प्रति अपना आभार व्यक्त करें।वैसे तो लोग अपने मरे हुए मां-बाप को अपनी श्रद्धांजली देने के तौर पर एक धार्मिक रिवाज के रूप में इस दिन को मनाते हैं, लेकिन दरअसल यह उन सभी पीढियों के प्रति अपना आभार प्रकट करने का एक जरिया है जो हमसे पहले इस धरती पर आईं थी। मैं ऐसा मानती हूँ इस समय भारतीय उपमहाद्वीप में, नई फसलों का पकना भी शुरू हो जाता है। इसलिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के प्रतीक रूप में, सबसे पहला अन्न उन्हें पिंड के रूप में भेंट करने की प्रथा रही है। इसके बाद ही लोग नवरात्रि,विजयादशमी और दीवाली जैसे त्यौहारों के जश्न मनाते हैं।इस समय भारतीय उपमहाद्वीप में, नई फसलों का पकना भी शुरू हो जाता है। इसलिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के प्रतीक रूप में, सबसे पहला अन्न उन्हें पिंड के रूप में भेंट करने की प्रथा रही है।उसके बाद, इंसान ने जिंदगी को योजनाबद्ध करना शुरू कर दिया ताकि हम पशुओं से थोड़ी बेहतर जिंदगी जी सकें। फिर रहने के लिए ठिकाने बने, इमारतें बनीं, कपड़े आए – इस धरती पर इंसान के कारण बहुत सी चीजें हुईं। आग पैदा करने जैसी मामूली चीज से लेकर पहिये और असंख्य दूसरी चीजों की खोज तक, यह विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी जाती रही। हम आज इस रूप में सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि इतनी सारी चीजें हमें विरासत में मिली हुई हैं। मान लीजिए इंसान ने कभी कपड़े नहीं पहने होते और आप एक कमीज बनाने वाले पहले इंसान होते, तो वह कोई आसान काम नहीं होता, एक कमीज बनाने का तरीका खोजने में कई साल लग जाते।


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