'*शीशे के महल और पत्थरबाज़ राजनीति: जब दूसरों पर फेंका पत्थर खुद पर आ गिरे'*
डॉ उमेश शर्मा ,सेक्टर 122 ,नोएडा
"*जिसके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते।*"
भारतीय राजनीति और परीक्षा प्रणाली के इर्द-गिर्द इन दिनों जो तमाशा और ड्रामा चल रहा है, वह सिर्फ प्रशासनिक खामी या राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान और राजनीतिक रणनीतियों का एक दिलचस्प अध्ययन भी है। हर बार जब NEET परीक्षा जैसे बड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर उंगलियां उठाई जाती हैं, तो राजनीतिक गलियारों में '*दूध का धुला'* साबित होने की होड़ मच जाती है। लेकिन विरोधी पार्टियां शायद यह भूल रही हैं कि जनता अब मूक दर्शक नहीं, बल्कि इस मनोवैज्ञानिक खेल को बखूबी समझ रही है।
1. *राजनीतिक शीशे के घर और पत्थरों की बौछार*
जब कोई राजनीतिक दल या नेता किसी व्यवस्था पर हमला बोलता है, तो मनोविज्ञान के अनुसार वह जनता के सामने खुद को बेदाग और नैतिकता का प्रतीक (Moral Superiority) दिखाने की कोशिश करता है। लेकिन समस्या यह है कि भारत में राजनीति का इतिहास उठाकर देखें तो किसी भी पार्टी का घर पूरी तरह से बुलेटप्रूफ या 'शीशे-रहित' नहीं है।
अतीत में हुए लीक, घोटालों और परीक्षा अनियमितताओं का रिकॉर्ड हर दल के कार्यकाल में रहा है। ऐसे में आज नीट (NEET) के मुद्दे पर अति-उग्र होकर पत्थर फेंकना, अपने ही अतीत के शीशमहल को उजागर करने जैसा है।
1. *बूमरैंग इफ़ेक्ट* (Boomerang Effect) का मनोवैज्ञानिक चक्र
सामाजिक मनोविज्ञान में 'साइकोलॉजिकल बूमरैंग इफ़ेक्ट' (Psychological Boomerang Effect) एक ऐसी स्थिति को कहा जाता है, जहाँ आप किसी विचार या विरोध को इतने अतिवादी (extreme) तरीके से जनता पर थोपने की कोशिश करते हैं कि उसका परिणाम बिल्कुल उल्टा (counterproductive) हो जाता है।
जब विरोधी पार्टियाँ इस मुद्दे को सुधार या समाधान की नीयत से उठाने के बजाय केवल 'राजनीतिक लाभ' और 'अफरातफरी' (Chaos) फैलाने के इरादे से इस्तेमाल करती हैं, तो जनता के मन में एक रक्षात्मक तंत्र (Defense Mechanism) सक्रिय हो जाता है।
सहानुभूति का उलटना: जब विरोध हद से ज्यादा आक्रामक और दुर्भावनापूर्ण लगने लगता है, तो तटस्थ जनता और प्रभावित छात्रों के मन में सत्ता पक्ष या व्यवस्था के प्रति एक अनजानी सहानुभूति (Sympathy) जन्म लेने लगती है।
*अतीत का स्मरण*: उग्र विरोध देखकर आम नागरिक सोचने लगता है—"क्या इनके समय में सब कुछ सही था?" और यहीं से विरोधी पक्ष का नरेटिव ध्वस्त होना शुरू हो जाता है।
1. '*प्रोजेक्शन' और जनता की घटती विश्वसनीयता*
सिगमंड फ्रायड के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत 'प्रोजेक्शन' (Projection) के अनुसार, व्यक्ति या समूह अक्सर अपनी कमियों और असफलताओं को छिपाने के लिए दूसरों पर वही आरोप सबसे तेजी से लगाता है।
आज जब विपक्षी दल NEET के बहाने पूरी व्यवस्था को ध्वस्त या निष्फल साबित करने पर आमादा हैं, तो वे भूल रहे हैं कि भारतीय मतदाता अब बहुत परिपक्व है। जब विरोध का उद्देश्य सुधार के बजाय सिर्फ "चुनावी अंक हासिल करना" दिखता है, तो जनता विरोधी दलों के इरादों पर ही सवाल उठाने लगती है।
अंततः पत्थर खुद के शीशमहल पर ही गिरेगा
नीट परीक्षा में शामिल लाखों छात्रों का भविष्य और उनकी मेहनत कोई राजनीतिक खिलौना नहीं है। जो दल इस संवेदनशील मुद्दे को केवल एक राजनीतिक हथियार बनाकर पत्थरबाज़ी कर रहे हैं, वे इस बात से अनजान हैं कि बूमरैंग हवा में घूमकर वापस उन्हीं की तरफ आ रहा है।
जब यह विवाद शांत होगा और धूल छटेगी, तो जनता के सामने केवल व्यवस्था की चुनौतियाँ नहीं होंगी, बल्कि उन विरोधी पार्टियों का दोहरा रवैया भी बेनकाब हो चुका होगा। दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकने की यह होड़ अंततः *विरोधी दलों के अपने ही राजनीतिक शीशमहल को चकनाचूर करके रहेगी।*
