*"बाप की कुर्सी, बेटे की विरासत — लोकतंत्र या राजतंत्र?"*





 *"न अनुभव, न योग्यता, सिर्फ उपनाम — यही है नए भारत का शासन?"*

डॉ उमेश शर्मा

भारत में सत्ता अब चुनाव से नहीं, परिवार से ट्रांसफर हो रही है। *बिहार इसका ताजा उदाहरण है*, जहां हाल की कैबिनेट में चार-पांच मंत्री ऐसे बनाए गए हैं जिनकी एकमात्र योग्यता उनका सरनेम है। उनके पास न प्रशासनिक अनुभव है, न जमीनी संघर्ष का रिकॉर्ड और न ही सेवा का कोई भाव। बस पिता मंत्री थे, इसलिए बेटे को भी मंत्री बनना था। यह बीमारी सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में पवार बनाम पवार की लड़ाई चल रही है, उत्तर प्रदेश में यादव परिवार की तीसरी पीढ़ी सत्ता संभाल रही है, राजस्थान में पायलट और गहलोत के बेटे कतार में हैं, हरियाणा में चौटाला और हुड्डा परिवार का दबदबा है, और दक्षिण में करुणानिधि, केसीआर और जगन मोहन रेड्डी के राजवंश चल रहे हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोकतंत्र के नाम पर राजतंत्र चल रहा है।

यह "*बेटा- बेटी मॉडल"* इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह सबसे पहले योग्यता की हत्या करता है। जब मंत्री बनने के लिए आईएएस जैसा एग्जाम पास करना जरूरी नहीं, सिर्फ डीएनए टेस्ट काफी हो, तो टैलेंट दम तोड़ देता है। गांव का पढ़ा-लिखा नौजवान सोचने लगता है कि मेहनत करने का क्या फायदा, मंत्री तो फलाने नेता का बेटा ही बनेगा। दूसरा, यह भ्रष्टाचार का शॉर्टकट बन जाता है। जिसने कुर्सी विरासत में पाई है, उसे उसकी कीमत का अंदाजा नहीं होता। उसके लिए सत्ता सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि पैतृक संपत्ति बन जाती है और घोटाले, ठेके और कमीशन पारिवारिक बिजनेस का हिस्सा बन जाते हैं। तीसरा, इससे जवाबदेही खत्म हो जाती है। बाप से विरासत में मिली सीट पर बैठा बेटा जनता से नहीं डरता क्योंकि उसे पता है कि टिकट तो घर की चीज है। नतीजा यह होता है कि जनता पांच साल तक ठगी जाती रहती है। चौथा, नई सोच के रास्ते बंद हो जाते हैं। अगर पच्चीस साल का मंत्री सत्तर साल के पिता की सोच से चलेगा तो नीतियां भी पचास साल पुरानी ही रहेंगी। स्टार्टअप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दे इन राजकुमारों के एजेंडे में कभी नहीं आते।

इस वंशवाद का असर बेहद गहरा होगा। पहला असर यह होगा कि लोकतंत्र खोखला हो जाएगा और चुनाव महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। असली चुनाव तो नेता के ड्राइंग रूम में होगा जहां यह तय किया जाएगा कि अगला वारिस कौन होगा। दूसरा, देश का युवा हताश होगा। जब हर पार्टी में टिकट परिवार पैक में बंटेंगे तो आम कार्यकर्ता सिर्फ पोस्टर चिपकाने और नारे लगाने तक सीमित रह जाएगा। इससे ब्रेन-ड्रेन बढ़ेगा और टैलेंट राजनीति की जगह विदेश का रुख करेगा। तीसरा, राज्य बर्बाद होंगे। बिहार इसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी है। बिना विजन वाले बेटे-मंत्रियों से न सड़क बनती है और न रोजगार आता है। नतीजा पलायन, गरीबी और अपराध के रूप में सामने आता है। चौथा, जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा। जब हर कुर्सी पर एक ही उपनाम नजर आएगा तो वोटर कहेगा कि सब एक जैसे हैं। फिर या तो नोटा जीतेगा या लोकतंत्र ही हार जाएगा।

"हार को हार न मानना, अक्ल पर पड़ा पर्दा है" — यह लाइन सिर्फ नेताओं पर नहीं, पूरी पार्टियों पर लागू होती है। चुनाव हारने के बाद भी बेटे को टिकट देना सीधे-सीधे जनता के फैसले को नकारना है। यह ठीक वैसा ही है जैसे क्रिकेटर डब्ल्यू.जी. ग्रेस ने आउट होने पर कहा था कि भीड़ मुझे खेलते देखने आई है, अंपायरिंग देखने नहीं। आज के नेता भी यही सोचते हैं कि भीड़ उन्हें देखने आई है, उनकी योग्यता देखने नहीं।

इसका इलाज मुश्किल नहीं है। पहला, पार्टियों के अंदर भी लोकतंत्र लाना होगा और टिकट बंटवारे में परिवार नहीं, परफॉर्मेंस देखनी होगी। दूसरा, "एक परिवार, एक टिकट" का कानून बनाना होगा ताकि अगर बाप सांसद है तो बेटा विधायक न बन सके। तीसरा, सबसे बड़ा चाबुक जनता के हाथ में है। वंशवादी उम्मीदवार को वोट से हराना होगा और उपनाम की जगह उम्मीदवार का काम देखना होगा। 

अगर हमने अभी नहीं संभाला तो वो दिन दूर नहीं जब विधानसभा किसी परिवार का फंक्शन लगेगी और मुख्यमंत्री की शपथ गृह प्रवेश जैसी रस्म बन जाएगी। सबक साफ है: कुर्सी पांच साल की होती है, राजवंश का मोह मत पालो। मेरा वोट, मेरी जिम्मेदारी — उपनाम नहीं, उम्मीदवार देखो।

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