संकट में राष्ट्र सर्वोपरि, राजनीति सीमित रहनी चाहिए”
नोएडा । भारत के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और कई पुस्तकों के लेखक डॉ उमेश शर्मा ने वर्तमान दौर की स्थिति पर अपना विचार प्रकट करते हुए बताया कि राष्ट्रीय संकट—चाहे वह युद्ध जैसी स्थिति हो, सीमाई तनाव, घुसपैठ, या अंतरराष्ट्रीय टकराव—इन समयों में राजनीति का स्वर और व्यवहार अक्सर लोगों के ध्यान में आता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस समाजवादी पार्टी एवं त्रिमूल कांग्रेस इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय हित से ऊपर अपने राजनीतिक स्वार्थ को रखता है।
उन्होंने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सीधा “हाँ” या “नहीं” में देना उचित नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बहुआयामी होती है।
*क्या संकट में स्वार्थ की राजनीति होती है?*
कुछ परिस्थितियों में राजनीतिक बयानबाजी से ऐसा प्रतीत होता है कि दल संकट को भी राजनीतिक दृष्टि से देखते हैं:
• सैन्य कार्रवाइयों के बाद बहस:
जैसे बालकोट के बाद कई राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आईं, जिनमें सरकार से प्रमाण या रणनीति पर सवाल पूछे गए। समर्थकों ने इसे अनुचित कहा, जबकि अन्य ने इसे लोकतांत्रिक अधिकार माना।
• *घुसपैठ और सुरक्षा मुद्दे*:
सीमा सुरक्षा या अवैध घुसपैठ के मामलों पर अक्सर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस होती है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताता है, तो दूसरा नीति की खामियों पर सवाल उठाता है।
• *अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ*:
डॉ शर्मा के अनुसार ईरान जैसे देशों से जुड़े तनाव या युद्ध की स्थिति पर भी भारत की विदेश नीति को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण सामने आते हैं।इन उदाहरणों से यह दिखता है कि राजनीतिक दल घटनाओं को अपने-अपने नजरिए से प्रस्तुत करते हैं, जिसे कुछ लोग स्वार्थ कहते हैं और कुछ लोकतांत्रिक कर्तव्य.
*क्या ऐसे समय में सरकार का साथ देना चाहिए?*
यह एक संतुलन का प्रश्न है:
• राष्ट्रहित में एकता जरूरी है:
बाहरी खतरे के समय देश के भीतर एकजुटता से मजबूत संदेश जाता है।
• अंध समर्थन भी ठीक नहीं:
यदि बिना सवाल किए हर निर्णय का समर्थन किया जाए, तो गलत नीतियों की संभावना बढ़ सकती है।
मनोवैज्ञानिक डॉ शर्मा कहते हैं कि आदर्श स्थिति यह है कि राष्ट्र के खिलाफ किसी भी ताकत का समर्थन नहीं होना चाहिए,लेकिन सरकार की नीतियों पर संयमित और जिम्मेदार सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है।
*मनोवैज्ञानिक व्याख्या*
राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू महत्वपूर्ण हैं:
राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू महत्वपूर्ण हैं:
• *समूह पहचान* :
लोग अपने राजनीतिक दल या विचारधारा से गहराई से जुड़ जाते हैं, जिससे वे हर स्थिति को उसी नजरिए से देखने लगते हैं।
• *पुष्टिकरण पूर्वाग्रह* :
व्यक्ति वही जानकारी स्वीकार करता है जो उसके पहले से बने विचारों को सही साबित करे, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है।
• *भावनात्मक प्रतिक्रिया* :
संकट के समय डर, गुस्सा और देशभक्ति जैसी भावनाएँ अधिक तीव्र हो जाती हैं, जो राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं।
• *नेतृत्व प्रभाव*:
नेताओं के बयान और रुख उनके समर्थकों के विचारों को सीधे प्रभावित करते हैI
राष्ट्रीय संकट के समय राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकती, क्योंकि लोकतंत्र में विचार-विमर्श और जवाबदेही आवश्यक हैं। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक दल अपने मतभेदों को सीमित रखें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानें।
*संकट के समय एकता, संयम और जिम्मेदारी—यही सच्ची राष्ट्रभक्ति की पहचान है।*
