*नारी शक्ति वंदन: बदलाव की निर्णायक दस्तक* —सुनीता शर्मा



       नोएडा :  सेक्टर १२२ निवासी समाजसेवी सुनीता  शर्मा के अनुसार “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के मूल मंत्र के साथ 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने जब से देश की बागडोर संभाली, तब से उनकी सरकार की अनेक नीतियों और योजनाओं में महिला उत्थान को विशेष महत्व दिया गया है।

वे बताती हैं कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान के माध्यम से बेटियों की सुरक्षा और शिक्षा पर बल दिया गया।

शौचालय निर्माण के माध्यम से महिलाओं के स्वास्थ्य और सम्मान की चिंता की गई।

उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन देकर उनके स्वास्थ्य—विशेषकर आँखों और फेफड़ों—की सुरक्षा सुनिश्चित की गई।

महिलाओं को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन्हें ऋण उपलब्ध कराए गए, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें।

“लखपति दीदी” जैसी योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला।

पीएम आवास योजना के अंतर्गत उन्हें घर की मालकिन बनाकर सामाजिक सम्मान दिया गया।

तीन तलाक के विरुद्ध कानून लागू कर मुस्लिम बहनों-बेटियों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।और फिर आया— नारी शक्ति वंदन अधिनियम।

सुनीता शर्मा बताती हैं कि राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटों का आरक्षण प्रदान करता है। यह आरक्षण प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए लागू होगा, जिसे आवश्यकता अनुसार बढ़ाया भी जा सकता है।

इसके अंतर्गत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए भी उप-कोटा सुनिश्चित किया गया है।

परिसीमन के बाद इस कानून के लागू होने की संभावना है, जो 2029 तक प्रभावी हो सकता है।

इस विधेयक का इतिहास यह दर्शाता है कि बड़े बदलावों में राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी महत्वपूर्ण होती है।

उन्होंने बताया कि  में प्रस्तुत यह प्रस्ताव 2010 में राज्यसभा से पारित हुआ, लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों—जैसे समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड—के विरोध के कारण लोकसभा में पारित नहीं हो सका और अंततः निरस्त हो गया।वर्ष 2023 में पुनः प्रस्तुत किए गए इस विधेयक को, विरोध के बावजूद, सरकार ने दोनों सदनों से पारित करवाया और इसे “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” का नाम दिया।

यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि राजनीतिक भागीदारी में एक निर्णायक मोड़ है।यह महिला सम्मान, सुरक्षा और सशक्तिकरण के प्रति एक सशक्त प्रतिबद्धता का प्रतीक है।राष्ट्र निर्माण में “नीति निर्धारण” के स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम है।

अपना विचार प्रगट करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में आधी आबादी की भागीदारी अब और अधिक सशक्त रूप में सामने आएगी।यह उन सभी महिला कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा है, जो राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए समाज में बदलाव लाने का प्रयास कर रही हैं।

क्या आरक्षण ही पर्याप्त है?यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।केवल सीट आरक्षित कर देने से ही महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, जब तक कि राजनीतिक दलों के भीतर उनकी निर्णयात्मक भूमिका भी मजबूत न हो।साथ ही, यह भी आवश्यक है कि यह व्यवस्था “प्रॉक्सी” या “पैराशूट राजनीति” का रूप न ले।

हर बड़े परिवर्तन की शुरुआत संरचनात्मक बदलाव से होती है—और यह अधिनियम उसी दिशा में एक सशक्त कदम है।महिला सशक्तिकरण की यात्रा अब एक नए मोड़ पर है।नीतियाँ बन चुकी हैं, दिशा तय हो चुकी है—अब असली चुनौती है प्रभावी क्रियान्वयन, निरंतरता और दृढ़ इच्छाशक्ति की।




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