अंबेडकर ने प्रतिकूल परिस्थितियों को मात देकर सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त किया : डॉ कुसुम पथरिया
सिकंदराबाद । सामाजिक न्याय और महिला अधिकारिता बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ कुसुम पथरिया ने कहा कि अंबेडकर जयंती का वर्णन केवल एक महापुरुष को याद करने के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का सम्मान करने के रूप में किया जाता है, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों को मात देकर सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त किया।वे सिकंदराबाद में आयोजित अंबेडकर जयन्ती समारोह को संबोधित कर रहीं थी।
उन्होंने कहा कि मैं डॉ. अंबेडकर को एक ऐसे दूरदर्शी नेता के रूप में देखती हूँ जिन्होंने भारत के सबसे पीड़ित और शोषित लोगों को गरिमा और अधिकार प्रदान किया। वे सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़े और कानूनी स्तर पर समानता बहाल की ।
डॉ. अंबेडकर इस बात के शानदार उदाहरण हैं कि असाधारण प्रतिभा के लिए किसी प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने सामाजिक वंचितता (Social disadvantages) के बावजूद अपने जीवन की कमान खुद संभाली और एक 'अनस्टॉपेबल' (अजेय) व्यक्तित्व बने।
डॉ कुसुम पथरिया ने कहा कि बाबा साहेब को केवल मूर्तियों में न खोजें, बल्कि उनके विचारों का अनुसरण करें। उनकी जयंती मनाने का असली अर्थ उनके द्वारा बताए गए समानता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को अपने जीवन में उतारना है। सामाजिक लोकतंत्र का सपना हालाँकि भारत को राजनीतिक लोकतंत्र मिल गया, लेकिन अंबेडकर जी का सामाजिक लोकतंत्र बनाने का सपना अभी भी एक लक्ष्य है। यह हमारी पीढ़ी की ज़िम्मेदारी है कि हम एक ऐसा समाज बनाएं जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके वंश से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा से हो।
उन्होंने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मैं बाबा साहेब को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सराहती हूँ जो सामाजिक संरचनाओं द्वारा थोपी गई सीमाओं से ऊपर उठ गए। उनका जीवन यह सिखाता है कि जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम बनने से इनकार कर देता है, तो वह क्या हासिल कर सकता है। आज 14अप्रैल को हम एक ऐसे इंसान को नमन करते हैं जिन्होंने हमारे राष्ट्रवाद की आकांक्षाओं को आकार और रूप दिया। यह दिन हमें शिक्षित बनने, संगठित रहने और संघर्ष करने की याद दिलाता है।आज डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर मन कुछ ठहर-सा गया था जैसे किसी गहरे कुएँ में झाँककर हम अपने ही समाज की परछाइयों को देख रहे हों—कुछ उजली, कुछ अब भी धुंधली।
उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने केवल कागज़ पर कानून नहीं लिखे थे, उन्होंने उन बेआवाज़ लोगों की तकदीर लिखने की कोशिश की थी, जिन्हें सदियों से बोलने का अधिकार तक नहीं मिला। उन्होंने हमें सिखाया कि इंसान की असली पहचान उसकी जाति या जन्म नहीं, बल्कि उसका अधिकार और उसका सम्मान है।
उन्होंने बताया कि औरतों के बारे में उनकी सोच उस समय की संकीर्णताओं से बहुत आगे थी। वे जानते थे कि जब तक एक स्त्री अपने पैरों पर खड़ी नहीं होगी, तब तक समाज भी आधा ही खड़ा रहेगा। एक शिक्षित, आत्मनिर्भर और सम्मानित स्त्री ही उस घर और समाज को सशक्त बना सकती है, जिसमें वह रहती है।
आज जब हम उनके नाम के दीप जलाते हैं, तो यह भी सोचें—क्या हमारे घरों, हमारी सोच में सचमुच बराबरी का उजाला पहुँचा है? क्या हमारी बेटियाँ, बहनें और माताएँ वही स्वतंत्रता और सम्मान पा रही हैं, जिसकी कल्पना बाबासाहेब ने की थी?
सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, कर्मों से दी जाती है। आइए, हम अपने भीतर की उन जंजीरों को तोड़ें, जो किसी को छोटा और किसी को बड़ा मानती हैं। एक ऐसा समाज बनाएं, जहाँ हर व्यक्ति—चाहे वह पुरुष हो या स्त्री—सम्मान और समानता के साथ जी सके।
यही बाबासाहेब के सपनों का भारत होगा।
इस अवसर पर सामाजिक न्याय एवं महिला अधिकारिता बोर्ड की उपाध्यक्ष उमा जैसवाल (उत्तर प्रदेश) व नोएडा से अध्यक्ष सुरेश कुमारजी ने पूर्ण सहयोग दिया। महिला सशक्तिकरण सम्मान और समानता के लिए हम और हमारी टीम साथ मिलकर काम कर रही है



