न्याय के मंदिर में अन्याय का मंज़र क्यों

नरेन्द्र सहगल

एक टी.वी. चैनल पर हुई बहस में पैगम्बर मोहम्मद पर अपनी गैरजिम्मेदाराना विवादास्पद टिप्पणी के लिए सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना कर चुकी भाजपा की निलम्बित प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट की वकील नुपुर शर्मा को फटकार लगाकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी घोर गैरजिम्मेदाराना और विवादास्पद व्यवहार किया है। यह घोर अन्याय है। न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों से देश में अराजकता फैलने का क्या खतरा नहीं है? प्रत्येक क्षेत्र में हो रही प्रतिक्रिया से यही आभास होता है कि कुछ न्यायधीश भी घोर महजबी और संकीर्ण मानसिकता के शिकार हो सकते हैं। ध्यान दें कि सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार अलिखित है और पूरा अनैतिक एकतरफा भाषण है। संविधान और कोर्ट के सभी कायदे-कानूनों और साधारण प्रक्रिया को भी ताक पर रखकर न्यायधीशों ने नुपुर शर्मा को फटकार लगाकर अपने भीतर छुपी हिन्दू विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन किया है। इन न्यायधीशों पर महाअभियोग चलना चाहिए।


देश का माहौल बिगाड़ने का खतरनाक आरोप लगाते हुए न्यायमूर्ति जे.बी. पार्दीवाला और सूर्यकांत ने क्या उन लोगों के हौसले बुलंद नहीं किए जो वास्तव में आज से नहीं अपितु सदियों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं। जो भारत में रहकर दूसरे पाकिस्तान के ख्वाब देख रहे हैं और ‘‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही सजा तन से गला जुदा’ जैसे अत्यंत खतरनाक किस्म के नारे लगाते हुए मजहबी गौरव महसूस करते हैं। क्या वह अनसर लोग कन्हैया लाल की हत्या के जिम्मेदार नहीं हैं जो नुपुर का गला काटने, बलात्कार करने और सजा-ए-मौत का ऐलान कर रहे थे?

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी असंवैधानिक फटकार में यहां तक कह दिया कि ‘‘आज भारत में जो कुछ हिंसक इत्यादि हो रहा है उसके लिए नुपुर शर्मा अकेली जिम्मेदार है। इस महिला की गंदी जुबान ने सारे देश को आग में झोंक दिया है। यह महिला समाज के लिए खतरा है। इसने सारे देश की भावनाओं को भड़काया है।’’

उदयपुर में एक बेकसूर और निहत्थे हिन्दू की गला काटकर की गई हत्या को भी नुपुर शर्मा के नाम जड़ देने वाले जजों के ध्यान में वह लोग क्यों नहीं आए जिन्होंने टी.वी. चैनल को सुनते ही देश में उत्तेजित नारेबाजी, भड़काऊ जलसे-जुलूस और आगजनी करते हुए माहौल को बिगाड़ा था। क्या इसी वातावरण का नतीजा है कन्हैया लाल की हत्या?

न्याय के इन तथाकथित रक्षकों से पूछना चाहिए कि क्या यह बिगड़ा माहौल देश में पहली बार बना है? सदियों से बिगाड़े जा रहे माहौल के लिए क्या नुपुर शर्मा ही जिम्मेदार है? आक्रांता मुगलों के जमाने से शुरू हुए और आज तक चल रहे एकतरफा हिंसक इतिहास के लिए अकेली नुपुर शर्मा को ही बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है? गत वर्षों में तोड़ दिए गए हजारों मंदिर, तलवार की नोक पर हुए खूनी धर्मांतरण, माताओं-बहनों के साथ हुए शर्मनाक बलात्कार, छोटे-छोटे बच्चों को दीवारों में चिन देने जैसी गैर इंसानी हरकतें, संतों महात्माओं के सर काटना, उनकी चमड़ी उधेड़ना, युवा लड़कियों को अगवा करके उनसे निकाह करना जैसी जघन्य हरकतों के लिए क्या नुपुर शर्मा ही जिम्मेदार है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई गैरकानूनी फटकार से तो यही लगता है कि आज से पहले भारत में कभी एकतरफा कत्लेआम, साम्प्रदायिक दंगे इत्यादि कभी नहीं हुए। नुपुर शर्मा को कटघरे में खड़ा करने वाले न्यायाधीशों को न्याय जैसे पवित्र शब्द के साथ जोड़ाना भी वास्तव में शर्मनाक ही होगा। जो न्यायधीश अपनी निजी मनोवृति, कुंठित मजहबी मानसिकता और अमानवीय रुझान पर नियंत्रण नहीं कर सकते उन्हें न्यायालय में प्रवेश करने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि नुपुर शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दी अपनी याचिका में केवल यही कहा था कि उसके खिलाफ विभिन्न प्रांतों में दाखिल की गई प्राथमिकियों एवं याचिकाओं को एक स्थान पर सुप्रीम कोर्ट में लाकर कार्रवाई की जाए। सभी जगह जाने पर उसकी जान को खतरा है। परन्तु कोर्ट ने नुपुर शर्मा के इस अधिकार को ठोकर मारकर अपना फैसला ही सुना दिया कि वर्षों से चले आ रहे फसाद की जड़ वर्तमान में केवल नुपुर ही है।

सुप्रीम कोर्ट के इस तर्कहीन और बिन मांगे फैसले के आते ही सत्ता के भूखे कई राजनेता भी न्यायधीशों द्वारा थूके हुए को चाटने के लिए दौड़ पड़े। अपने समाप्त हो रहे जनाधार को पुनः प्राप्त करने के लिए विफल प्रयास में जुटे। राहुल गांधी भला पीछे कैसे रहते भाई ने तुरंत कह दिया ‘‘यह माहौल केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के द्वारा बनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और आरएसएस ने यह माहौल बनाया है, यह राष्ट्र विराधी गतिविधियां हैं।’’

राहुल गांधी जी के इन शब्दों पर हंसना या क्रोधित होने की जरूरत नहीं है। वह अपने दल के डीएनए के अनुसार ही सोचते और बोलते हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण को सच्चा राष्ट्रवाद मानने वाले, भारत को एक राष्ट्र न समझने वाले, भारत के विभाजन पर मोहर लगाने वालों की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले और भारत के भावी प्रधानमंत्री का भ्रम पाले हुए इस आंखमार (संसद में) कथित युवा नेता से और कोई उम्मीद की भी जा नहीं सकती।

अब तो धीरे-धीरे सारे राज खुल भी रहे हैं। पकड़े गए दोनों कातिलों का सम्बंध पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से है। गला रेतकर मारने की प्रक्रिया भी आई.एस.आई.एस. द्वारा अपनाई जा रही रीति है। अमरावती (महाराष्ट्र) में उमेश कोल्हापुरे की दर्दनाक हत्या भी इसी मजहबी उन्माद का हिस्सा प्रतीत हो रही है। देश की जिम्मेदार जांच एजेंसियां इस कथित षड्यंत्र की गहराई से जांच कर रही हैं। यह अच्छी बात है कि भारत के प्रायः सभी मुस्लिम संगठनों और धार्मिक नेताओं ने इस हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए इसे इस्लाम के विरुद्ध बताया है। राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक सौहार्द के लिए मुस्लिम धर्मगुरुओं का यह प्रयास प्रशंसनीय है।

अंत में यही निवेदन है कि इस समय देश में बन रहे माहौल को शांत बनाए रखने के लिए सभी जिम्मेदार दल एवं नेता अपने पर नियंत्रण रखकर ही व्यवहार करें। नुपुर शर्मा द्वारा अपने शब्द वापस लेकर क्षमा याचना कर लेने के पश्चात सारा माहौल अपने आप ही शांत हो जाना चाहिए।

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