कहां गया ‘मोदी विरोधी गैंग’?

नयी दिल्ली


विश्वव्यापी करोना महामारी ने भारतीयों के समक्ष दो दृश्य प्रस्तुत कर दिए हैं| एक ओर देशभक्त राष्ट्रवादी शक्तियां एकजुट होकर सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए, कोरोना राक्षस के वध के लिए जूझ रही हैं और दूसरी ओर इस संकट काल का फायदा उठाकर प्राय: सभी विपक्षी दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं|


एक ओर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, आर्यसमाज,शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी,दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान जैसी संस्थाएं समाज सेवा के काम में सक्रिय हैं, तो दूसरी ओर ‘मोदी विरोधी’ गैंग सरकार द्वारा उठाए जा रहे प्रत्येक कदम की आलोचना करने में सक्रिय हैं| इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा|


इन अवसरवादी राजनीतिक नेताओं का न तो कोई कार्यकर्ता आधारित संगठन है और ना ही कोई विचारधारा| यही वजह है कि नेताओं का यह जमघट सिवाए बयानबाजी के और कुछ भी नहीं कर रहा| गरीबों की सहायता के लिए इनके पास कोई योजना नहीं|धन, खाद्य सामग्री, भोजन इत्यादि बांटने और बंटवाने में इनका रत्ती भर भी योगदान नहीं हैं|


भारतीय समाज के दुख,संकट, त्रासदी और मजबूरी से पूर्णत्या कटे हुए यह नेता विपक्ष के धर्म को भी नहीं निभा रहे|सर्वविदित है कि यह वही लोग हैं जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक, तीन तलाक के अंत, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के आंदोलन,अलगाववादी धारा 370 के समाप्त होने और नागरिकता संशोधन कानून जैसे राष्ट्रहित के मुद्दों का भी विरोध किया था|


अब जरा उन संस्थाओं के समाजसेवी समर्पित कार्यकर्ताओं को भी देखें जो अपनी जान को हथेली पर रख कर दूर-दराज में फंसे हुए बेसहारा लोगों तक राहत सामाग्री पहुंचा रहे हैं| दुख तो इस बात का है कि इन निस्वार्थी राष्ट्रभक्तों की कर्तव्य परायणता से भी यह सत्ता के भूखे अवसरवादी नेता कुछ नहीं सीख रहे हैं|


केवल मात्र मोदी विरोधी ही इनकी राजनीति है| राष्ट्रीय संकट के समय एकजुट होकर सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की भी सूझ-बूझ इनमें नहीं है|इनके संस्कारों में समाज सेवा और राष्ट्रहित कहीं भी दिखाई नहीं देता|बस अपनी नेतागिरी, घर परिवार,संपत्ति और व्यक्तिगत वर्चस्व के अलावा कुछ नहीं|


याद करें कि गत वर्ष हुए संसद के चुनावों के पूर्व इन सभी विपक्षी दलों के नेताओं ने जो महागठबंधन बनाया था, वह भी मात्र मोदी के विरोध में‘महामिलावट’ ही था| यह लोग अपने दलगत स्वार्थ से परे हट कर कोई ‘कामन मिनीमम प्रोग्राम’ भी नहीं बना पाए थे| उसका एक कारण था कि इनके पास देश के विकास,सुरक्षा और संवर्धन के लिए कोई निश्चित वैचारिक आधार ही नहीं है|


दुर्भाग्य की बात यह भी है कि समय की आवश्यकता के अनुसार राजनीति करने का मादा भी इनमें नहीं है| आज सारे विश्व में मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे कोरोना से लड़ने के प्रयासों की प्रशंसा हो रही है| परंतु हमारे यह अतिहोनहार विपक्षी नेता ना जाने कहां छिप कर अपनी मौका परस्त राजनीति को चमकाने के अवसर तलाश रहे हैं|यह अपनी बिलों से कब निकलेंगे खुदा जाने|


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