क्या हिंदुस्तान सच में आगे बढ़ रहा हैं, या जाति के चक्र में ही घूम रहा हैं?
नव वर्ष पर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और लेखक डॉ उमेश शर्मा के विचार डॉ उमेश शर्मा कहते हैं कि भारत ने विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था में बड़ी छलांग लगाई है, लेकिन एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है— क्या हमारी सोच भी उतनी ही आगे बढ़ी है? या हम आज भी जाति की दीवारों के भीतर ही जी रहे हैं? *“जब देश चाँद छू रहा हो, और समाज जाति गिन रहा हो — तो सवाल उठना ज़रूरी है।”* *जाति प्रथा: खत्म होने के बजाय गहरी क्यों होती जा रही है?* जाति प्रथा कभी श्रम-विभाजन के नाम पर शुरू हुई थी, लेकिन समय के साथ यह श्रेष्ठता और हीनता का ज़हर बन गई। आज भी बच्चा पैदा होते ही उससे पहले उसकी जाति पहचान ली जाती है, न कि उसकी संभावनाएँ। राजनीति ने इसे और गहरा किया। जाति अब सामाजिक सच्चाई नहीं, राजनीतिक हथियार बन चुकी है। *“जब पहचान राजनीति बने, तब समाज पीछे रह जाता है।”* *इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे होता है?* *सबको*। • योग्य व्यक्ति को अवसर नहीं मिलता • अयोग्य को केवल पहचान के कारण लाभ मिल जाता है • समाज आपस में बँट जाता है • युवा भ्रम और आक्रोश से भर जाते हैं “*जाति नहीं, योग्यता पहचान बने।*” “*बँटा स...