निष्काम कर्म: अशान्त संसार में शान्ति प्राप्त करने के लिए गीता की गुप्त कुंजी
लेखिका : रेणु सिंह परमार
श्रीमद्भगवद्गीता युद्धभूमि पर घटित भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य एक संवाद है। परन्तु इसका वास्तविक सन्देश केवल युद्ध के विषय में ही नहीं अपितु यह भी है कि प्रत्येक दिन बुद्धिमानीपूर्वक कैसे जीवन व्यतीत किया जा सकता है। इसकी सर्वाधिक प्रभावशाली शिक्षाओं में से एक है निष्काम कर्म अर्थात् फल के प्रति आसक्त हुए बिना अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना।
महान् भारतीय आध्यात्मिक गुरु, श्री श्री परमहंस योगानन्द के अनुसार, निष्काम कर्म योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। श्रीमद्भगवद्गीता की अपनी चिरस्मरणीय व्याख्या, ईश्वर-अर्जुन संवाद : श्रीमद्भगवद्गीता, में उन्होंने यह समझाया है कि श्रीकृष्ण का सन्देश कोई अमूर्त दर्शन नहीं अपितु प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक व्यावहारिक पथप्रदर्शक है, चाहे वह गृहस्थ धर्म का पालन कर रहा हो, किसी व्यवसाय का संचालन कर रहा हो, अथवा ईश्वर की खोज कर रहा हो।
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं :
“तुम्हारा मानव-अधिकार केवल कर्म करने के लिए है, परिणामस्वरूप कर्मफलों पर नहीं। स्वयं को अपने कर्मों के फलों का स्रष्टा न मानो; न ही स्वयं को अकर्मण्यता से आसक्त होने दो।”
इसका अर्थ यह है कि अपना कर्तव्य निभाएँ—चाहे वह आपका व्यवसाय हो, परिवार की देखभाल करना हो या कोई भी अन्य उत्तरदायित्व हो—परन्तु निरन्तर प्रतिफल अथवा सम्मान की चिन्ता न करते रहें। “मुझे क्या प्राप्त होगा” की चिन्ता करने से केवल तनाव ही उत्पन्न होता है। मुक्ति तब प्राप्त होती है जब आप परिणाम पर नहीं अपितु कर्म पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। इसके साथ ही आलसी अथवा अकर्मण्य न बनें।
आगे श्लोक 48 में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह परामर्श देते हैं :
हे धनञ्जय (अर्जुन), योग में स्थित रहकर, सफलता एवं असफलता के प्रति तटस्थ रहते हुए, (फलों के प्रति) आसक्ति का त्याग करके अपने सभी कर्म करते रहो। यह मानसिक समता ही योग कहलाता है।”
जीवन में हमें प्रशंसा एवं निन्दा, सफलता एवं असफलता, का सामना करना पड़ता है। श्रीकृष्ण हमें दोनों ही परिस्थितियों में शान्त रहने की शिक्षा प्रदान करते हैं। यह मानसिक समता ही सच्चा योग है—आन्तरिक शान्ति और बाह्य कर्म की एकता।
तत्पश्चात् अध्याय 3, श्लोक 30 में श्रीकृष्ण इस अवस्था को प्राप्त करने की कुंजी प्रदान करते हैं :
“सब कार्यों को मुझे अर्पण करो! अहंभाव एवं आसक्ति का त्याग कर, अपनी आत्मा पर ध्यान केन्द्रित करके, सन्तापरहित होकर, (कर्म के) युद्ध में संलग्न हो जाओ।”
सरल शब्दों में : अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर दें। इस प्रकार जीवन व्यतीत करने का अर्थ संसार से विमुख होना नहीं अपितु अपने प्रत्येक कार्य को ईश्वर को अर्पित करते हुए करना है—अशान्त इच्छा, अहंभाव, अपेक्षा, और उत्तेजनापूर्ण चिन्ता के बिना। शान्तिपूर्ण जीवन जीने का यही एकमात्र मार्ग है।
तथा अध्याय 5, श्लोक 10 में श्रीकृष्ण एक सुन्दर सादृश्य प्रस्तुत करते हैं :
“जैसे कमल-पत्र जल से दूषित नहीं होता, वैसे ही वह योगी जो आसक्ति को त्याग कर, अपने कर्म ईश्वर को अर्पित करता है, इन्द्रियों की उलझनों में नहीं फँसता।”
जिस प्रकार कमल कीचड़ से भरे जल में उगता है परन्तु फिर भी उससे अछूता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य निष्काम कर्म और ईश्वर के प्रति समर्पण के अभ्यास के द्वारा सांसारिक संघर्षों के मध्य भी शान्त रह सकता है।
योगानन्दजी ने इन शाश्वत शिक्षाओं को साझा करने के उद्देश्य से भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (वाईएसएस) तथा पश्चिम में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप (एसआरएफ़) की स्थापना की थी। उनके गौरव ग्रन्थ योगी कथामृत ने लाखों लोगों को योग और ध्यान और विशेष रूप से ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करने के मार्ग के रूप में श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित प्राचीन प्रविधि क्रियायोग से परिचित कराया है।
निष्काम कर्म उत्तरदायित्वों से दूर भागना नहीं है, अपितु इसका अर्थ है पूरे मन से परन्तु फल के प्रति आसक्त हुए बिना कार्य करना—कार्यालय में, सम्बन्धों में, व्यक्तिगत लक्ष्यों में।
युद्धक्षेत्र प्रतीकात्मक हो सकता है परन्तु संघर्ष वास्तविक है—आसक्ति और मुक्ति तथा अहंकार और समर्पण के मध्य। श्रीमद्भगवद्गीता यह प्रदर्शित करती है कि निष्काम कर्म में ही विजय निहित है, क्योंकि केवल वही स्थायी आनन्द प्रदान करता है।