राहुल गांधी: सत्ता का सपना, झूठ की सीढ़ी से नहीं चढ़ा जा सकता--डॉ शर्मा
(मनोवैज्ञानिक डॉ उमेश शर्मा)
नोएडा : सेक्टर 122 आवासीय कल्याण संगठन के अध्यक्ष और मनोवैज्ञानिक डॉ उमेश शर्मा के अनुसार राहुल गांधी पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे बिना पर्याप्त तथ्यों की पुष्टि किए बयान दे देते हैं या ऐसे दावे करते हैं जो जन भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से होते हैं। उनके कई बयान बाद में तथ्य-जांच (fact-check) में या तो गलत साबित हुए हैं या भ्रामक। हाल ही में उन्होंने कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट को लेकर यह दावा किया कि वहाँ लोकसभा चुनाव 2024 में “वोट चोरी” हुई है और बड़ी मात्रा में नकली वोटर लिस्टें तैयार की गईं। उन्होंने दावा किया कि लगभग 1 लाख वोट फर्जी तरीके से दर्ज किए गए, जिनमें डुप्लिकेट नाम, फर्जी पते, अमान्य फोटो और फॉर्म 6 का दुरुपयोग शामिल था।
डॉ शर्मा बताते हैं कि हालांकि, चुनाव आयोग ने इस पूरे आरोप को सिरे से खारिज करते हुए इसे “*तथ्यहीन और भ्रामक*” कहा। आयोग ने राहुल गांधी से औपचारिक शिकायत दर्ज करने और प्रमाण प्रस्तुत करने की मांग की, परंतु ऐसा कोई ठोस दस्तावेज अब तक प्रस्तुत नहीं किया गया। यह वही चुनाव आयोग है जिस पर बार-बार विपक्षी दल निशाना साधते हैं, लेकिन जब तथ्यों की मांग होती है, तो पीछे हट जाते हैं।
इसी तरह, सोशल मीडिया पर एक समय यह भी प्रचारित किया गया कि राहुल गांधी ने अपने चुनावी वादों—जैसे ₹8,500 प्रति माह की गारंटी या ₹1,00,000 तक की नौकरी—के लिए माफी मांगी है, लेकिन यह भी एक झूठा दावा निकला। विश्वसनीय मीडिया संस्थानों और फैक्ट-चेकिंग एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई सार्वजनिक माफी नहीं दी गई है।
उन्होंने बताया कि तेलंगाना में कांग्रेस द्वारा दी गई “*छः* गारंटियों” के पूर्ण क्रियान्वयन का दावा भी राहुल गांधी द्वारा मंच से किया गया, जिसे विपक्षी BRS पार्टी ने “झूठा और गुमराह करने वाला” बताया। आरोप लगाए गए कि उन वादों को या तो आधा-अधूरा लागू किया गया है या बिल्कुल भी नहीं।
डॉ शर्मा बताते हैं कि राहुल गांधी की सबसे चर्चित और विवादित राजनीतिक मुहिमों में से एक थी राफेल सौदे पर सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप। उन्होंने अनिल अंबानी को अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया और बार-बार मंचों से “चौकीदार चोर है” का नारा दिया। लेकिन जब यह बात सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कही गई, तो उन्हें बाद में स्वयं सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहना पड़ा कि उन्होंने गलती से यह दावा कर दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं कहा था और यह बस एक राजनीतिक बयान था।
एक और विवादास्पद बयान में राहुल गांधी ने यह कहा कि नरेंद्र मोदी OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) से नहीं हैं, बल्कि बाद में उन्होंने अपनी जाति को OBC में दर्ज कराया। जबकि तथ्य यह है कि मोदी की जाति (तेली/घांची) को 1994 में गुजरात सरकार ने और 1999 में केंद्र सरकार ने OBC सूची में शामिल किया था। इस प्रकार यह दावा भी आधा सच और आधा झूठ पाया गया।
इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि राहुल गांधी द्वारा बार-बार ऐसे बयान दिए गए हैं जो या तो बिना प्रमाण के होते हैं, या राजनीतिक प्रचार की आड़ में तथ्यात्मक रूप से गलत। इस प्रवृत्ति ने न सिर्फ उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि देश की संवैधानिक संस्थाओं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया, और जनता के विश्वास पर भी आघात पहुँचाया है।
डॉ शर्मा के अनुसार भ्रम फैलाने की राजनीति, देश को नहीं खुद को नुकसान देती है।
