आध्यात्मिकता की सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के लिए ध्यान ही एकमात्र कुंजी

 रांची : स्वामी पवित्रानन्द  ने अपने प्रवचन में कहा कि  ध्यान ही एकमात्र ऐसा कुंजी है, ऐसी दिव्य शक्ति है, जिसकी सहायता से आप आध्यात्मिकता की सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं। इसी के माध्यम से  आप अपनी आत्मा को जागृत और ईश्वर से उसे जोड़ सकते हैं। उक्त बातें योगदा सत्संग मठ में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी पवित्रानन्द ने कही।

उन्होंने कहा कि ये ध्यान ही हैं, जो हमें क्षमाशीलता के अद्भुत गुणों से हमें सुसज्जित करता है, जिससे हम क्षमाशीलता के जादुई प्रभावों से हम प्रभावित होकर स्वयं को देवत्व की ओर ले जाते हैं। स्वामी पवित्रानन्द ने ध्यान की विभिन्न प्रविधियों के बारे में बताते हुए कहा कि कैसे क्षमाशीलता को प्राप्त कर व्यक्ति महानता की शिखर पर पहुंच जाता है।

स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि यह सत्संग ही है कि हमें भक्ति और स्वयं को ईश्वर के मार्ग पर ले जाने के लिए हमें नाना प्रकार से प्रेरित करता है। क्षमाशीलता हमें शांति, परम आनन्द व नाना प्रकार की खुशियों से हमें आच्छादित कर हमारे परिवार को बेहतर स्थिति में ले आता है।

स्वामी पवित्रानन्द ने योगदा सत्संग में सम्मिलित योगदा भक्तों को हंसते-हसांते और कई दृष्टांतों को उनके समक्ष में रख जीवन के मूलभूत सिद्धांतों से परिचय कराया। उन्होंने एक दृष्टांत में कहा कि अगर आप क्षमाशीलता को अपनाते हैं तो आप देवत्व के निकट होते हैं। उन्होंने कहा कि जब आप अपने घर से दूर होते हैं और आपके साथ कोई व्यक्ति अनादर करता है तो आपके पास तीन परिस्थितियां होती है। 

एक तो जिसने आपका अनादर किया, उससे आप बदला लें, उसका प्रतिकार करें, मुंहतोड़ जवाब दें। दूसरा ये हो सकता है कि आप अनादर करनेवाले व्यक्ति को जवाब देने की स्थिति में न हो और इस अपमान से प्रभावित होकर आप तनाव या नाना प्रकार की बीमारियों के शिकार हो जाये और तीसरा ये भी स्थिति हो सकती है कि जिसने आपका अनादर किया, इसे आप क्षमा कर दें यह सोचकर कि कर्मफल सिद्धांत के अनुसार ऐसा होना ही था और इस घटना को आप सहज भाव में लेकर, अनादर करनेवाले व्यक्ति को आप क्षमा कर दें।

स्वामी पवित्रानन्द ने आश्रम में ही एक ऐसी घटना के बारे में सुनाया, जिसे सुनकर योगदा भक्त आश्चर्यचकित हो गये। स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि एक बार स्वामी श्रद्धानन्द के पास एक 35 वर्ष का युवक आया और नाना प्रकार से स्वामी श्रद्धानन्द से जोर-जोर से बातें करने लगा। लेकिन स्वामी श्रद्धानन्द 


पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, वे अंत-अंत तक मुस्कुराते रहे। उसके क्रोध का भी कोई असर उन पर नहीं था। आखिर क्यों? क्योंकि स्वामी श्रद्धानन्द क्षमाशीलता के भाव को जानते थे। वो जानते थे कि युवक भले ही 35 वर्ष का हो गया हैं, पर इसका बालपन का स्वभाव इसके मस्तिष्क से नहीं गया है। कर्मफल के सिद्धांत के प्रभाव में युवक है, जिसका प्रभाव अभी दिख रहा है।

स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि आपके कर्मफल ही आपके सामने आते हैं। जो आपके जीवन को प्रभावित करते हैं और इस प्रभाव से दूर होने का सबसे सुंदर समाधान परमहंस योगानन्द जी की बताई प्रविधियां और ध्यान है। क्रियायोग है। इसे अपनाइये। बिना किसी किन्तु-परन्तु व देर किये ध्यान को अपनाइये, सिर्फ यही एक ऐसा मार्ग है, जो आपके बेहतर स्थिति में ला सकता हैं। दूसरा कोई रास्ता नहीं।

- (लेखक बिहार-झारखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार व विद्रोही24 के संपादक हैं।) 

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