भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए सरकार का जोर स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास पर

नई दिल्ली (इंडिया साइंस वायर): भविष्य की ऊर्जा सामग्री में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में, एल्यूमीनियम आयन बैटरी, सोडियम आयन बैटरी, पॉलिमर बैटरी और ग्राफीन आधारित बैटरियों की उभरती प्रौद्योगिकी को भविष्य में ऊर्जा संसाधनों के प्रभावी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। भारत सरकार का विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) विभिन्न बैटरियों, विशेष रूप से ग्राफीन आधारित बैटरी के क्षेत्र में स्वदेशी प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा दे रहा है। डीएसटी ने उच्च ऊर्जा घनत्व वाली ली-आयन बैटरी विकसित करने के लिए ग्राफीन संरक्षित सिलिकॉन नैनो-स्फीयर (इंटरकनेक्टेड) पर केंद्रित एक परियोजना का समर्थन भी किया है। यह जानकारी केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान; राज्य मंत्री पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष, डॉ जितेंद्र सिंह द्वारा प्रदान की गई है। लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में डॉ जितेंद्र सिंह ने बताया कि डीएसटी के अंतर्गत कार्यरत सांविधिक निकाय विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (एसईआरबी) ने भविष्य की ऊर्जा सामग्री; विशेष रूप से एल्युमीनियम आयन बैटरी, सोडियम आयन बैटरी, पॉलिमर बैटरी और ग्राफीन आधारित बैटरी के विकास एवं इससे संबंधित ज्ञान का प्रसार के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों/कार्यशालाओं सहित कुल 42 परियोजनाओं का समर्थन किया है। डीएसटी का स्वायत्त अनुसंधान और विकास केंद्र - इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी ऐंड न्यू मैटेरियल्स (एआरसीआई); सुपर-कैपेसिटर और सोडियम आयन बैटरी के लिए भविष्य की प्रौद्योगिकियों के रूप में सामग्री और उपकरणों पर काम कर रहा है। एआरसीआई इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए ली-आयन बैटरी के लिए बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रोड सामग्री (कैथोड और एनोड) का उत्पादन करने के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के विकास में लगा हुआ है। एआरसीआई ने लिथियम-आयन-फॉस्फेट और लिथियम टाइटेनेट के लिए प्रौद्योगिकियों का भी सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है, जो ली-आयन बैटरी में उपयोग होने वाली प्रमुख सामग्री हैं। केंद्रीय मंत्री ने संसद को बताया कि उच्च ऊर्जा घनत्व और लंबे जीवन को देखते हुए अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ग्रेफाइट आधारित सामग्री और लिथियम-आयन सेल के स्वदेशीकरण पर काम कर रहा है। ऊर्जा घनत्व, बैटरियों के चक्रीय जीवन और सुरक्षा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से बेलनाकार सेल आधारित उन्नत सामग्रियों पर अनुसंधान एवं विकास के प्रयास भी किए जा रहे हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) ने स्वदेशी रूप से संश्लेषित इलेक्ट्रोड सामग्री का उपयोग करके ~ 200Wh प्रति किलोग्राम के ऊर्जा घनत्व के साथ सोडियम आयन कॉइन सेल का निर्माण किया है। लिथियम आयन बैटरी के क्षेत्र में, इलेक्ट्रोड सामग्री के लिए एक लागत प्रभावी, प्रयोगशाला पैमाने पर संश्लेषण प्रक्रिया स्थापित की गई है और प्रौद्योगिकी को कई कंपनियों को स्थानांतरित कर दिया गया है। अगली पीढ़ी की Li-S बैटरी के लिए कई कुशल कैथोड सामग्री भी विकसित की गई है। परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) ने स्वदेशी रूप से संश्लेषित इलेक्ट्रोड सामग्री का उपयोग करके ~ 200Wh प्रति किलोग्राम के ऊर्जा घनत्व के साथ सोडियम आयन कॉइन सेल का निर्माण किया है। लिथियम आयन बैटरी के क्षेत्र में, इलेक्ट्रोड सामग्री के लिए प्रयोगशाला पैमाने पर किफायती संश्लेषण प्रक्रिया स्थापित की गई है, और प्रौद्योगिकी को कई कंपनियों को हस्तांतरित किया गया है। अगली पीढ़ी की Li-S बैटरी के लिए कई कुशल कैथोड सामग्री भी विकसित की गई है। पॉलीमर-आधारित एक प्रोटॉन बैटरी को भी डिजाइन और निर्मित किया गया है। कार्बनिक -अकार्बनिक हाइब्रिड पेरोसाइट सामग्री, अर्थात् CH3NH3Pb13 एक नई खोजी गई सौर सेल सामग्री है, जिसकी फोटोवोल्टिक दक्षता 28% से अधिक है। एक नयी तरह की उन्नत ऊर्जा सामग्री, अर्थात् AgCuS में बहुत अच्छे थर्मो-इलेक्ट्रिक गुण देखे गए हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस साइंस रिसर्च (जेएनसीएएसआर) के सहयोग से AgCuSin अपशिष्ट ऊर्जा संचयन अनुप्रयोगों के उपयोग के लिए काम कर रहा है। वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक घटक प्रयोगशाला केंद्रीय विद्युत रासायनिक अनुसंधान संस्थान (सीईसीआरआई) ऊर्जा भंडारण अनुप्रयोगों के लिए हरित और सस्ती आयरन आधारित रेडॉक्स फ्लो बैटरी अनुसंधान में लगा हुआ है। इसके साथ ही, सुपरकैपेसिटर अनुप्रयोगों के लिए ग्राफीन आधारित पॉलीमर नैनोकम्पोजिट्स की खोज; सोडियम-आयन बैटरी के विकास को सक्षम बनाने, उच्च शक्ति ली-आयन बैटरी सामग्री-स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास के स्केल-अप संश्लेषण, लिथियम-सल्फर बैटरी के लिए कार्यात्मक सामग्री के रूप में इलेक्ट्रोस्पन नैनोफाइबर, और संश्लेषण लक्षण वर्णन और सिमुलेशन के माध्यम से नई Mg-S बैटरी केमिस्ट्री और इलेक्ट्रोड के विकास का कार्य भी किया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि नीति आयोग ने इस संदर्भ में संस्थानों को भविष्य के लिए कार्यबल तैयार करने और भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पारिस्थितिक तंत्र अपनाने में तेजी लाने के लिए विश्व स्तरीय इलेक्ट्रिक वाहनों पर केंद्रित अनुसंधान एवं विकास संरचना और नवाचार कार्यक्रम बनाने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा है। उन्होंने बताया कि इस दिशा में पहल करते हुए अब तक 09 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मास्टर और डॉक्टरेट स्तर पर उच्च शैक्षिक कार्यक्रम शुरू कर चुके हैं और कुछ ने समर्पित केंद्र भी स्थापित किए हैं। (इंडिया साइंस वायर)

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