हृदयाघात से बचाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है नया आनुवंशिक अध्ययन

 नई दिल्ली (इंडिया साइंस वायर): पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में हृदय रोगों से होने वाली मृत्यु दर काफी अधिक है। गंभीर कार्डियोमायोपैथी की स्थिति में हृदय गति का रुकना सामान्य माना जाता है, जो कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों में से एक है। कार्डियोमायोपैथी हृदय की मांसपेशियों की अभिन्न संरचना को बदल देती है, जिसके परिणामस्वरूप, हृदय में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से नहीं हो पाता। इससे हृदय गति रुकने का खतरा बढ़ जाता है, और अचानक हृदयाघात हो जाता है। 

भारतीय शोधकर्ताओं ने अपने एक ताजा अध्ययन में बीटा मायोशसन हेवी चेन जीन (β-MYH7) में नये आनुवंशिक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) का पता लगाया है, जो कि भारतीयों में कार्डियोमायोपैथी का कारण है। यह अध्ययन, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की हैदराबाद स्थित घटक प्रयोगशाला सीएसआईआर-कोशशकीय एवं आणविक जीवविज्ञान (सीसीएमबी) के वैज्ञानिक डॉ के. तंगराज के नेतृत्व में किया गया है। यह अध्ययन कैनेडियन जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।

विश्व स्तर पर, हृदय रोगों का कारण बनने वाले प्रमुख जीनों में β-MYH7 एक प्रमुख जीन माना जाता है। सीसीएमबी के निदेशक डॉ विनय कुमार नंदिकूरी के अऩुसार – “यह अध्ययन जीन एडिटिंग विधियों को विकसित करने में मदद कर सकता है, जिससे इस उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) की वजह से हृदयाघात से होने वाली मृत्यु से भारतीयों को बचाया जा सकता है।” 

वर्तमान में, सेंटर फॉर डीएनए फिंगर-प्रिंटिंग ऐंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी) के निदेशक और इस शोध के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ तंगराज ने कहा है कि “भारतीय कार्डियोमायोपैथी रोगियों पर बहुत ज्यादा अध्ययन नहीं किया गया था। इसलिए, हमने उत्परिवर्तनों (म्यूटेशन) की पहचान के लिए 167 जातीय रूप से मेल खाने वाले स्वस्थ कंट्रोल्स के साथ 137 डाइलेटेड कार्डियोमापैथी रोगियों के β-MYH7 जीन का अनुक्रम किया, जो भारतीय रोगियों में डाइलेटेड कार्डियोमापैथी से संबंधित थे।”

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉ दीपा सेल्वी रानी ने कहा कि – “हमारे अध्ययन में 27 भिन्नताओं का खुलासा किया गया है, जिनमें से 07 उत्परिवर्तन (8.0%) नये थे, और विशेष रूप से भारतीयों में फैले कार्डियोमायोपैथी रोगियों में पाये गए थे। इनमें 04 मिस्सेंस (Missense) म्यूटेशन शामिल थे; β-MYH7 प्रोटीन में क्रमिक रूप से संरक्षित अमीनो एसिड में परिवर्तन, और जैव सूचना विज्ञान उपकरणों द्वारा जिनके रोगजनक होने का अनुमान लगाया था। β-MYH7 के होमोलॉजी मॉडल का उपयोग करते हुए बाद के शोधों में, हमने दिखाया कि कैसे ये उत्परिवर्तन आणविक स्तर पर गैर-बॉन्डिंग इंटरैक्शन के एक महत्वपूर्ण नेटवर्क को विशिष्ट रूप से बाधित करते हैं, और रोग में योगदान दे सकते हैं।” 

प्रत्येक प्रोटीन अणु विशिष्ट प्रकार के अमीनो एसिड से बना होता है। अमीनो एसिड अवशेषों के बीच होने वाली विभिन्न अंतःक्रियाएं प्रोटीन की 3डी संरचना को संचालित करती है, इसके कार्य निर्धारित करती हैं। किसी महत्वपूर्ण स्थान पर एक अमीनो एसिड परिवर्तन कर प्रोटीन संरचना अस्वाभाविक रूप से बदल सकता है और रोगजनकता को जन्म दे सकता है। (इंडिया साइंस वायर)


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