बच्चों को मोबाइल की लत से कैसे बचाएँ :डॉ कुसुम पथरिया




नोएडा 

सामाजिक न्याय एवं महिला अधिकारिता बोर्ड के महिला विंग की अध्यक्ष और समाज सेविका डॉ कुसुम पथरिया के अनुसार मोबाइल सुविधा है, लत नहीं, और माता-पिता को बच्चों के लिए समय सीमा तय करनी चाहिए, उन्हें अन्य रचनात्मक गतिविधियों (किताबें, खेल, प्रकृति) में लगाना चाहिए, और खुद एक उदाहरण बनना चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ बच्चों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है; फोन को "जरूरत" तक सीमित कर दें और इसे बच्चों के मानसिक, शारीरिक विकास के लिए खतरा समझें। 

वे सलाह देती हैं कि बच्चों को मोबाइल से दूर  रखें:

मोबाइल को एक टूल समझें, लाइफलाइन नहीं: मोबाइल फ़ोन आपके काम को आसान बनाने के लिए है। इसे खुद पर हावी न होने दें। अगर आप इसे स्विच ऑफ भी कर दें, तो दुनिया चलती रहेगी।

माता-पिता खुद उदाहरण बनें: बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते देखते हैं। अगर आप खुद हर समय फोन पर रहेंगे, तो बच्चे भी वही करेंगे। इसलिए, पहले खुद मोबाइल का उपयोग कम करें।

स्क्रीन टाइम सीमित करें (Time Table बनाएं): बच्चों के लिए मोबाइल और स्क्रीन देखने का समय निश्चित करें। इससे ज़्यादा उन्हें फोन न दें। 6 साल से कम उम्र के बच्चों को बिल्कुल नहीं देना चाहिए, और बड़ों के लिए भी समय तय होना चाहिए।

विकल्प दें (Alternatives Provide करें): उन्हें किताबें पढ़ने, बाहर खेलने, पेंटिंग करने या अन्य क्रिएटिव कामों में लगाएं। जब उनके पास फोन के अलावा करने को कुछ अच्छा होगा, तो वे खुद फोन से दूर रहेंगे।

घर में "नो-फोन" ज़ोन बनाएं: डाइनिंग टेबल या बेडरूम जैसी जगहोंओ

 पर फोन का इस्तेमाल न करने का नियम बनाएं, ताकि परिवार के सदस्य आपस में बात कर सकें।

शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर जोर: ध्यान (Meditation), योग और खेलकूद जैसी गतिविधियां बच्चों को फोन की लत से बचानेv में मदद करती हैं, क्योंकि ये उन्हें अंदर से मजबूत बनाती हैं।

जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल करें: फोन का उपयोग केवल काम के लिए करें, पूरे दिन ऑनलाइन रहने के लिए नहीं। बच्चों को भी यही सिखाएं। 

बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए उन्हें तकनीक का गुलाम बनने के बजाय, उसका समझदार उपयोगकर्ता बनना सिखाना ज़रूरी है। इसके लिए परिवार में संतुलन और जागरूकता लाना सबसे ज़रूरी है। 

डॉ कुसुम का कहना है कि आजकल बचपन से ही टीवी का प्रभाव पड़ रहा है

देखिए, शुरू में ऐसा होता था कि जब तक बच्चे चार या पांच साल के होते थे, उन पर विशेष रूप से मां का प्रभाव रहता था। पांच-छह साल से दस साल का होते-होते पिता की भूमिका भी शुरू हो जाती थी। और फिर जब तक वे चौदह या पंद्रह के होते थे, तो दोस्त व दूसरे लोग आते थे। लेकिन अब ऐसा बिलकुल नहीं होता है। आपका तीन साल का बच्चा टीवी से चिपका रहता है। हमें नहीं पता कि जो टीवी पर दिखाया जा रहा है, वह उसे कितना और कैसे समझ रहा है। यहां तक कि आप भी नहीं पता लगा सकते कि टीवी पर क्या चल रहा है, यह इतना ज्यादा बदलता रहता है। टीवी पर कोई एक सुंदर दुनिया बनाने की बात करता है तो अगले ही पल आपको कहीं बम फटता दिखाई देता है, अगले ही पल कुछ और हो रहा होता है। अगर आप सहज रूप से टीवी देख रही होंगी तो आप देखेंगी कि टीवी पर भयानक अव्यवस्था दिखाई देती है। अगर दो या तीन साल का बच्चा आराम से टीवी देख रहा है, तो हम नहीं जानते कि इन चीजों का भविष्य में उसके जीवन पर क्या प्रभाव होगा। जाहिर सी बात है कि इसका कोई बहुत अच्छा प्रभाव तो 

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