कोरोना की सक्षम वैक्सीन और दवाओं के विकास में मददगार हो सकता है नया शोध

 नई


दिल्ली (इंडिया साइंस वायर): देश और दुनिया में कोरोना संक्रमण की रफ्तार भले ही कुछ नरम पड़ी हो, लेकिन उसकी अगली लहर की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह बहुत स्वाभाविक है कि विभिन्न शोधकर्ता कोरोना संक्रमण और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सतत अध्ययन और शोध में जुटे हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), इंदौर भीसार्स-कोव-2 संक्रमण से जुड़ी वैक्सीन और दवाओं को लेकर नई संभावनाएं तलाशने में लगा है।

देश को कोरोनावायरस से जूझते लगभग 18 महीने हो चुके और अब सार्स-कोव-2के सामने आ रहे नये प्रतिरूप निरंतर चुनौती बने हुए हैं। वैज्ञानिक और अग्रिम मोर्चे पर इस महामारी का सामना करने में जुटे स्वास्थ्यकर्मियों की चुनौतियां इन प्रतिरूपों ने कई गुना बढ़ा दी हैं। ऐसे में वायरस के नए-नए प्रतिरूपों से निपटने के लिए मौजूदा दावों और वैक्सीन को और सक्षम बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल कोविड-19 रोधी जो वैक्सीन उपलब्ध हैं, उनमें से अधिकांश एमआरएनए आधारित वैक्सीन हैं। इनमें मॉडर्ना और कॉमिनेट्री की वैक्सीन प्रमुख हैं। वहीं वैक्सेजेरिवा, जॉनसन एंड जॉनसन, स्पूतनिक-वी और कोविशील्ड जैसी वैक्सीन वेक्टर आधारित हैं। वहीं सिनोवैक और कोवैक्सीन इनएक्टिवेडेट वायरस आधारित हैं। इसी तरह कोनवेडेसिया प्रोटीन आधारित वैक्सीन है। इस समय विश्व के तमाम हिस्सों में इन वैक्सीन का उपयोग हो रहा है। जबकि विभिन्न स्मॉल मॉलिक्यूलर ड्रग्स, प्रोटीन फ्रेग्मेंट (पेप्टाइड) इनहिबिटर्स और एंटीबॉडीज जैसी कोविड-19 रोधी पद्धतियां इस समय विकास की अवस्था में हैं, जिन्होंने अपने शुरुआती परीक्षण में उत्साहजनक परिणाम दिए हैं।

आईआईटी इंदौर का शोध आलेख इन विभिन्न तकनीकों और प्रविधियों की व्यापक व्याख्या करता है। इसमें बताया गया है कि वायरस होस्ट के साथ किस प्रकार अभिक्रिया करता है। महामारी के प्रसार में पर्यावरणीय पहलुओं के प्रभाव का विश्लेषण भी इस अध्ययन का एक  महत्वपूर्ण भाग है। साथ ही वायरस में म्यूटेशन, उसके उपचार की प्रविधियां और उसमें काम आ रही वैक्सीन पर भी इसमें विस्तार से चर्चा की गई है। इस शोध से कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। जैसे कि क्लिनिकली अप्रूव्ड दवाओं में कुछ बदलाव नई प्रभावी एवं सुरक्षित दवाओं की खोज में क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं। इस समय कई एमआरएनए आधारित वैक्सीन उपलब्ध हैं, लेकिन उनके विनिर्माण से लेकर उनके भंडारण के लिए आवश्यक तापमान सुनिश्चित करने की राह में आने वाली बाधाओं को देखते हुए उनकी पहुंच बहुत सीमित है और उन्हें दूर-दराज के इलाकों में भेज पाना उतना आसान नहीं। इससे वैश्विक टीकाकरण अभियान कुछ सीमित हो जाता है। यह शोध अध्ययन मुंह और नाक के म्यूकस मेम्ब्रेन की वायरस प्रतिरोधी क्षमता को रेखांकित करते हुए नाक से दी जाने वाली वैक्सीन के विकास की आवश्यकता पर बल देता है, जिस से वायरस को शरीर के प्रवेश द्वार पर ही निष्क्रिय किया जा सके। चुंकि अधिकांश वैक्सीन सर्फेस प्रोटीन आधार पर विकसित हो रही हैं, जिससे वायरस के, शरीर में मौजूद एंटीबॉडीज को मात देकर शरीर में पैठ बनाने की आशंका बनी रहती है। इसलिए एक ऐसी सक्षम वैक्सीनेशन रणनीति विकसित करने की आवश्यकता है जो वायरस के हर सम्भव स्थान को लक्षित हो। 

यह शोध अध्ययन कोविड वैक्सीन एवं कोविद के उपचार में उपयोग की जा रही विभिन्न दवाओं पर विस्तृत और व्यापक जानकारी उपलब्ध कराता है जिससे वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों को इस महामारी के विरुद्ध एक सक्षम प्रबंधन नीति विकसित करने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आईआईटी इंदौर का यह शोध डॉ. हेमचंद्र झा के नेतृ्त्व में संपन्न हुआ। इस अध्ययन में उन्हें सैम  सैम हिगिनबॉटम कृषि, प्रौद्योगिकी और विज्ञान विश्वविद्यालय,प्रयागराज के डॉ. विजय त्रिपाठी, आईपीएनए स्पेन के डॉ. जोसे एम पेरेज डी ला लास्त्रा सहित देश-विदेश के कई वैज्ञानिकों का सहयोग मिला। इसके अतिरिक्त बेन बेन गुरियन विश्वविद्यालय, इस्रैल्के डॉ आनंद, डॉ झा की प्रयोगशाला के ओमकार इन्द्री एवं श्वेता जखमोला, और अमेरिका के सेंट जॉन्स विश्वविद्यालय के डॉ झे-शेंग चेन की भी इस शोध अध्ययन में भागीदारी रही। (इंडिया साइंस वायर)

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हल्के और मध्यम कोविड-19 संक्रमण के इलाज में कारगर है ‘आयुष-64’

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस: भारतीय विज्ञान की प्रगति का उत्सव

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए हुआ " श्रीमती माधुरी सक्सेना कंप्यूटर शिक्षण केंद्र" का उद्घाटन