भारतीय शोधकर्ता विकसित कर रहे हैं स्वदेशी वेसल ट्रैफिक सॉफ्टवेयर

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ई दिल्ली(इंडिया साइंस वायर): देश के वैज्ञानिक केंद्र सरकार की डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को साकार करने में पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं। इसी कड़ी में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास के शोधार्थियों ने स्वदेशी वेसल ट्रैफिक सॉफ्टवेयर (वीटीएस) विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यह वीटीएस निरंतर बढ़ते सामुद्रिक परिवहन की निगरानी रखने में मददगार होने के साथ-साथ इस क्षेत्र में हो रहे वैश्विक तकनीकी विकास से भी कदमताल करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। सामुद्रिक जीवन की सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के अनुसार वीटीएस एक अनिवार्य पहलू होता है। वर्तमान में, भारतीय बंदरगाह इसके लिए विदेशी विकल्पों का उपयोग करते हैं, जिससे लागत अधिक होती है। 

आरंभिक तौर पर इस परियोजना की संकल्पना मैरिटाइम विजन, 2030 कार्ययोजना के अनुरूप की गई। यह सॉफ्टवेयर विकास परियोजना आईआईटी मद्रास और वीओ चिदंबरनार (वीओसी) पोर्ट ट्रस्ट, तूतिकोरिन, तमिलनाडु की संयुक्त पहल पर आधारित है। इसके लिए हाल में ही सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

यह सॉफ्टवेयर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने के साथ ही डिजिटल तकनीकों की शक्ति के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला को भी मजबूत बनाने में प्रभावी हो सकता है। इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल देश के दूसरे बंदरगाहों में भी किया जा सकता है, जिसके जरिये वे सामुद्रिक आवाजाही की निगरानी बेहतर तरीके से करने में सक्षम हो सकेंगे। 

इस परियोजना की कमान आईआईटी मद्रास के उत्कृष्ट केंद्र नेशनल टेक्नोलॉजी सेंटर फॉर पोर्ट्स वॉटरवेज ऐंड कोस्ट्स (एनटीसीपीडब्ल्यूसी) के हाथ में है। यह संस्थान भारत सरकार के बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्रालय की तकनीकी शाखा के रूप में कार्य करता है।

इस साझेदारी की विशेषताओं के बारे में वीओ चिदंबरनार पोर्ट ट्रस्ट के चेयरमैन टीके रामचंद्रन बताते हैं – “वीओसी पोर्ट देश का पहला ऐसा बड़ा बंदरगाह है, जिसने वीटीएस सिस्टम का स्वदेशी सॉफ्टवेयर विकसित करने के लिए एनटीसीपीडब्ल्यूसी के साथ करार किया है। किसी विदेशी और महंगे सॉफ्टवेयर के बजाय एनटीसीपीडब्ल्यूसी द्वारा वीओसी पोर्ट की आवश्यकतानुसार विकसित किया गया स्वदेशी सिस्टम भारतीय सामुद्रिक उद्योग के लिए कायापलट करने वाला साबित होगा।”

इस गठजोड़ से भारतीय सामुद्रिक क्षेत्र को मिलने वाले संभावित लाभ को लेकर आईआईटी मद्रास स्थित एनटीसीपीडब्ल्यूसी प्रोफेसर के. मुरली ने कहा है – “स्वदेशी वीटीएस सॉफ्टवेयर विकसित करने से अन्य सामुद्रिक क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीकों के विकास की राह खुलेगी, जिनके लिए हम विदेशी समाधानों पर निर्भर हैं।” वह मानते हैं कि यह साझेदारी देश के अन्य बड़े बंदरगाहों के साथ गठजोड़ के लिए संभावनाएं बढ़ा सकती है।

किसी भी गठजोड़ की सफलता तभी संभव है, जब उसमें साझेदारों का दायित्व एकदम स्पष्ट हो। इस साझेदारी में यह सुनिश्चित करने का प्रयास भी किया गया है। जैसे- एनटीसीपीडब्ल्यूसी का ध्यान तूतिकोरिन में वेसल ट्रैफिक सिस्टम के परिचालन, कार्मिक और रखरखाव से संबंधित सॉफ्टवेयर का विकास करने पर होगा। हालांकि, दैनिक परिचालन के लिए एनटीसीपीडब्ल्यूसी मौजूदा वेसल ट्रैफिक सेवाओं का ही उपयोग करेगा। वहीं, प्रायोगिक स्तर पर उसका दृष्टिकोण अलग होगा।

वीओसी पोर्ट पर वर्तमान में लगा वीटीएस करीब सात वर्षों से काम कर रहा है। ऐसे में, भारत और देश से बाहर बढ़ते सामुद्रिक परिवहन को देखते हुए अधिक प्रभावी वीटीएस सिस्टम की आवश्यकता महसूस होती है, ताकि सुरक्षा मानकों का स्तर और बेहतर हो सके। (इंडिया साइंस वायर)

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