राजनीति के मकड़जाल में उलझे नदी जल विवाद

डॉ दिनेश प्रसाद मिश्र 


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी की विभिन्न राजमार्गों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की भांति देश की समस्त प्रमुख नदियों को परस्पर जोड़कर सूखे एवं बाढ़ की स्थिति से निपटने हेतु नदियों को जोड़ने की योजना देश के भविष्य को सुधारने हेतु अप्रतिम थी , किंतु विभिन्न राज्यों के अपने-अपने हित एवं वहां के राजनीतिक दलों  की सोच एवं स्वार्थ के चलते  विद्यमान नदी जल विवादों के कारण यह योजना मूर्त रूप नहीं ले पा रही है। उत्तर से दक्षिण तक समस्त राज्यों के मध्य उन से होकर गुजरने वाली नदियों के जल की हिस्सेदारी को लेकर निरंतर विवाद बना हुआ है और कोई भी राज्य अपनी मांग से हटने के लिए तैयार नहीं है।

‌वर्तमान में देश में विभिन्न राज्यों के मध्य नदियों के जल में उनकी हिस्सेदारी को लेकर अनेक जल विवाद विद्यमान हैं ,जिनमें से कावेरी के जल को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु के मध्य विद्यमान कावेरी जल् विवाद, कर्नाटक महाराष्ट्र एवं आंध्र प्रदेश के मध्य कृष्णानदी के जल बंटवारे को लेकर कृष्णा जल विवाद,रावी एवं व्यास के जल  के बंटवारे को लेकर हरियाणा एवं पंजाब के मध्य विद्यमान रावी व्यास नदी जल विवाद तथा महादयी नदी के जल को लेकर कर्नाटक महाराष्ट्र और गोवा के बीच विद्यमान महादयी जल विवाद प्रमुख रूप से वर्तमान में देश के समक्ष समस्या बने हुए हैं। इस समय कावेरी जल विवाद देश के समक्ष विद्यमान विभिन्न नदी जल विवादों में से सर्व प्रमुख है जो तमिलनाडु एवं कर्नाटक के मध्य है। कर्नाटक एवं तमिलनाडु के मध्य विद्यावान कावेरी जल विवाद नया नहीं है यह स्वतंत्रता पूर्व से चला रहा है और इसके निदान हेतु स्वतंत्रता के पूर्व 18 92  एवं1924में अंग्रेज सरकार के प्रयासों से तत्कालीन मैसूर एवं मद्रास रेजीडेंसी के मध्य समझौते हुए थे। तत्कालीन मैसूर राज्य एवं मद्रास रेजीडेंसी आज क्रमश:कर्नाटक एवं तमिलनाडु राज्य के भाग हैं और दोनों  राज्यों के मध्य जल के बंटवारे को लेकर गंभीर विवाद बना हुआ है जो कभी-कभी राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण गंभीर रूप धारण कर लेता है। कर्नाटक का बनाना है कर्नाटक का मानना है कि तमिलनाडु को अत्यधिक पानी दे दिए जाने के कारण उसके यहां फसल की सिंचाई भली-भांति नहीं हो पाती जिससे अपेक्षित फसलों का उत्पादन नहीं हो पाता वही तमिलनाडु का कहना है कि कर्नाटक द्वारा पर्याप्त मात्रा में समय से पानी न दिए जाने के कारण फसलों को पर्याप्त जल प्राप्त नहीं हो पाता और फसलों का उत्पादन जल का अभाव होने के कारण उससे प्रभावित हो जाता है उसे उसकी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त जल प्रदान किया जाना चाहिए। तमिलनाडु ने1986 में केंद्र सरकार से नदी जल अधिनियम के अंतर्गत एक पंचाट बनाकर कावेरी नदी के जल आवंटन को सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया था, जिसके क्रम में केंद्र सरकार ने नदी जल पंचाट अधिनियम 1956 के अंतर्गत 1990 में एक पंचाट का गठन किया था जिसके द्वारा 17 वर्षों बाद अपना आदेश पारित किया गया जिसे इस निर्णय के 6 वर्ष बाद 2013 में अधिसूचित किया गया। ऑफिस में इस आदेश में तत्काल तमिलनाडु के लिए 12000 क्यूसेक फिट जल तत्काल छोड़ने का निर्देश दिया गया था जिसके विरोध में कर्नाटक में उग्र विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। कर्नाटक का मानना है कि कावेरी नदी का अधिकांश भाग कर्नाटक राज्य में है तथा कर्नाटक में बने कृष्णा राजा सागर बांध में पानी एकत्र  किया जाता है अतः उसके अधिकांश जल में कर्नाटक का हक है वहीं दूसरी ओर तमिलनाडु का कहना है कि तमिलनाडु के अंतर्गत कावेरी नदी का 54% बेसिन एरिया  फैला हुआ है, जबकि कर्नाटक में मात्र 42% बेसिन क्षेत्र है। तमिलनाडु के  विशाल बेसिन क्षेत्रफल को देखते हुए उसके अनुरूप उसे कावेरी के जल का पर्याप्त हिस्सा मिलना चाहिए, जिससे वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें कर्नाटक इसके लिए तैयार नहीं है और उसके द्वारा पंचाट के निर्णय के विरुद्ध अपील किए जाने के कारण परिवाद का निस्तारण अभी तक नहीं हो सका है। राज्य द्वारा पंचाट के आदेश को  सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, जिसमें वर्ष दो हजार अट्ठारह में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय पारित करते हुए  कर्नाटक को 284.75  मिलियन क्यूबिक फिट तमिलनाडु को 404.25 मिलियन क्यूबिक फिट केरल को 30 मिलियन क्यूबिक फीट तथा पांडुचेरी को 7 मिलीयन क्यूबिक फीट जल देने का आदेश दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को कावेरी प्रबंधन योजना को अधिसूचित करने का भी निर्देश दिया है ।केंद्र सरकार ने जून 2018 में कावेरी जल प्रबंधन योजना अधिसूचित की, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार ने निर्णय को प्रभावी करने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति का गठन किया हैहै।

‌ कृष्णा नदी के जल बंटवारे को लेकर ब्रिटिश काल में तत्कालीन हैदराबाद एवं एवं मैसूर राज्य के मध्य विवाद हुआ था। बाद में राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह विवाद महाराष्ट्र कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के बीच जारी रहा, जो अब तेलंगाना राज्य के बन जाने के बाद महाराष्ट्र कर्नाटक आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्यों के मध्य विद्यमान है।महाराष्ट्र कर्नाटक एवं प्रदेश आंध्र प्रदेश के मध्य कृष्णा जल विवाद को देखते हुए सर्वप्रथम सन 1969 में कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया था जिसके द्वारा 1973में प्रस्तुत रिपोर्ट को 1976में प्रकाशित किया गया था जिसके अनुसार सुषमा नदी के 2060 हजार मिलियन घन फीट जल में से महाराष्ट्र के लिए 560 हजार हजार मिलियन घन फिट कर्नाटक के लिए 780 हजार मिलियन घन फिट और आंध्र प्रदेश के लिए 800 हजार मिलियन घन फिट पानी आवंटित किया गया था। राज्यों की मांग पर 2004 में दूसरा कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया था, 45 वर्षों से पानी के जल प्रवाह के आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2010 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए महाराष्ट्र को 666 हजार घन फिट पानी ,कर्नाटक को 911 हजार मिलियन घन फिट पानी तथा आंध्र प्रदेश को 1001हजार मिलियन घन फिट पानी आवंटित करने का विधान करते हुए इस व्यवस्था को 2050 तक लागू रहने का विधान किया था। वर्ष 2014 में तेलंगाना के निर्माण के पश्चात जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा आंध्र प्रदेश के इससे में से तेलंगाना को जल आवंटित कर दिए जाने पर उसे न्यायालय में चुनौती दी गई तथा अनुरोध किया गया की तेलंगाना को एक पक्ष के रूप में मान्यता देते हुए कृष्णा नदी के जल को 3 राज्यों के बजाए चार राज्यों में बांटा जाए ,जबकि महाराष्ट्र एवं कर्नाटक आंध्र प्रदेश की इस मांग का विरोध करते हुए कह रहे हैं कि तेलंगाना को आंध्र प्रदेश के हिस्से से ही जल आवंटित किया जाना चाहिए जिसे न्यायाधिकरण ने मंजूरी दी थी जिस पर पुनर्विचार नहीं होना चाहिए। परिणाम स्वरूप कृष्णा नदी जल विवाद अब आंध्र एवं तेलंगाना के मध्य विवाद का विषय बना हुआ है और उसका निस्तारण अभी तक नहीं हो सका है।

‌ स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही राजस्थान एवं पंजाब के मध्य रावी व्यास नदी के जल के वितरण को लेकर विवाद बना हुआ है, जिसके दृष्टिगत सन 1955 में भारत सरकार ने रावी व्यास नदियों में विद्यमान बंटवारे योग्य पानी का आकलन करा कर उसे  पंजाब एवं राजस्थान राज्य के मध्य आवंटित करने का समझौता कराया था। इस आकलन में इन दोनों नदियों में 15.85 मिलीयन एकड़ फीट पानी पाया गया था जिसे समझौते में 7.2 एकड़ फीट पानी पंजाब को तथा 8 मिलियन एकड़ फीट पानी राजस्थान को आवंटित किया गया था।  भाषा के आधार पंजाब राज्य का पुनर्गठन कर उसे पंजाब और हरियाणा में विभाजित करने पर सन 1955 के समझौते के अनुसार पंजाब को मिले 7.2 मिलीयन एकड़ फीट पानी को पंजाब और हरियाणा के मध्य विभाजित कर दिया गया जिसमें हरियाणा एवं पंजाब को 3.5-- 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी तथा दिल्ली को 0.2 एकड़ फीट पानी दिया गया। जिससे असंतुष्ट होकर पंजाब ने उच्चतमन् न्यायालय में चुनौती दी तथा हरियाणा ने समझौते को लागू करने के लिए उच्चतम न्यायालय में अपनी याचिका योजित की, जिसके परिणाम स्वरूप भारत सरकार द्वारा दोनों राज्यों के मध्य वितरित किए जाने वाले पानी की मात्रा का पुनः आकलन किया गया और हरियाणा तथा पंजाब दोनों राज्यों के मध्य पुन,: समझौता हुआ जिसके अंतर्गत पंजाब राज्य को 4.22 मिलियन एकड़ फीट पानी और और हरियाणा को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी आवंटित किया गया। समझौते के बाद उच्चतम न्यायालय से पंजाब एवं हरियाणा दोनों राज्यों के द्वारा अपने अपने वाद वापस ले लिए गए किंतु पानी के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के मध्य असहमति बनी रही, जिसके परिणाम स्वरूप केंद्र सरकार द्वारा सन 1985 में रावी व्यास ट्रिब्यूनल ईराडी आयोग का गठन किया गया। ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों के तथ्य तथ्यों एवं तर्कों को सुनकर सन 1987 में आदेश  पारित करते हुए पंजाब को 5 मिलियन एकड़ फीट पानी तथा हरियाणा को 3.83 मिलियन एकल फिट पानी आवंटित किया। जबकि हरियाणा 5.6 मिलीयन एकड़ फिट पानी की मांग कर रहा था ।ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश में आवंटित पानी की मात्रा से पंजाब सहमत नहीं हुआ तथा हरियाणा उसे लागू करने की मांग करने लगा करने लगा।परिणामस्वरूप पंजाब की असहमति के कारण ट्रिब्यूनल के आदेश को राजपत्र में अधिसूचित नहीं किया जा सका और दोनों राज्यों के मध्य जल आवंटन का विवाद बना रहा। जल आवंटन से असंतुष्ट तथा निरंतर जल की अधिक मांग कर रहे पंजाब ने अकस्मात सन 2004 में पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पास कर पिछले सभी अंतरराज्यीय  नदी जल समझौतों को निरस्त कर दिया, और पूर्ववर्ती समझौतों से अपने आप को  पूरी तरह अलग कर लिया,जिसके दृष्टिगत केंद्र सरकार द्वारा उक्त विवाद को  पुनः उच्चतम न्यायालय के समक्ष निस्तारण हेतु प्रस्तुत किया गया है, किंतु अभी तक यह विवाद हल नहीं हो सका है।

‌ महामयी नदी जल विवाद महाराष्ट्र कर्नाटक एवं गोवा के मध्य विद्यमान है। यह नदी कर्नाटक में 35 किलोमीटर तथा गोवा में 52 किलोमीटर तक बहती है। इसके डूब क्षेत्र में महाराष्ट्र के भी कुछ हिस्से आते हैं। महादयी कैचमेंट क्षेत्र में 2032 किलोमीटर का क्षेत्र आता है। कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2002 में अपनी जल की आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय और नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट से मंजूरी लेकर कलसा और बंडूरी नदियों में दो बैराज बनाने की घोषणा की थी, जिनके पानी का उपयोग क्षेत्रीय लोगों के पीने और खेती की सिंचाई में किया जाना था। कर्नाटक सरकार द्वारा महादयी नदी की सहयोगी नदियों में बांध बना देने से गोवा को अपनी अपेक्षा अनुसार पानी न मिल पाने की आशंका से सितंबर 2002 मे उच्चतम न्यायालय में उन बांधों के निर्माण को चुनौती दी गई, तथा 2006 में जल विवाद न्यायाधिकरण बनाने की मांग की गई,, जिस के क्रम में 2010 में जस्टिस पांचाल की अध्यक्षता में ट्रिब्यूनल का गठन किया गया। न्यायाधिकरण ने 14 अगस्त 2018 को आदेश पारित करते हुए महादायी नदी के जल में से 13.4टीएमसी कर्नाटक को, 1.33 टीएमसी महाराष्ट्र को तथा 24 टीएमसी गोवा को जल आवंटित करने का आदेश दिया है। जिससे असंतुष्ट गोवा ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की है और प्रकरण अभी लंबित है। इनके अतिरिक्त गोदावरी नर्मदा सतलज यमुना आदि नदियों के जल वितरण को लेकर विभिन्न राज्यों के मध्य विवाद बना हुआ है जिनके का स्थाई निदान खोज पाना संभव नहीं हो पा रहा है राष्ट्रहित में समस्त विवादों का हल खोजना अति आवश्यक है। 

‌ आज देश के समक्ष अनेकानेक राज्यों के मध्य विद्यमान नदी जल विवाद विचाराधीन हैं। स्थानीय परिस्थितियों ,स्वार्थों तथा राजनीतिक दलों के व्यक्तिगत हितों के कारण नदी जल विवादों का त्वरित निस्तारण कर उनका समाधान खोजना संभव नहीं हो पा रहा है।  उनके समाधान के स्थान पर राजनीतिक दलों द्वारा अपने हितों को दृष्टि में रखकर स्थानीय जनमानस को लाली पॉप दिखाकर उग्र आंदोलन करते हुए ऐसे विवादों को वोट का आधार बनाए रखने हेतु विवादों को निस्तारित ना करा कर उन्हें दीर्घकाल तक बनाए रखना ही लाभकारी प्रतीत होता है। केंद्र सरकार भी लगभग उन्हीं स्थितियों में कार्य करती है और वह भी स्थानीय स्तर पर वोट की राजनीति का शिकार होकर ऐसे विवादों के स्थाई निराकरण से दूर भागती है जिससे राष्ट्रीय हित बाधित होते हैं ।देश  की प्रगति और विकास की गति बाधित होती है। ऐसी स्थिति में राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों का ही यह दायित्व बनता है कि वह अपने व्यक्तिगत हितों का परित्याग कर राष्ट्र के सार्वभौमिक विकास तथा राष्ट्रीय हितों को दृष्टि में रखते हुए समस्त विवादों का निराकरण व्यक्तिगत लाभ हानि को दृष्टि में न रखकर सर्वोच्च प्राथमिकता के साथसुनिश्चित करें जिससे राज्य एवं राष्ट्र  दोनों का ही विकास होगा तथा देश की जल शक्ति का राष्ट्र के हित में समुचित उपयोग हो सकेगा।

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