नमामि गंगे: गंगा में गिर रहे नाले

             डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र                                 


  गंगा  मात्र नदी नहीं अपितु भारतीय समाज एवं संस्कृति की जीवन रेखा है। गंगा जहां एक और भारतीय जनमानस को सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास के पथ पर ले जाती है वहीं दूसरी ओर वह मानव के लौकिक जीवन को समृद्धिशाली बनाने के साथ साथ उसके पारलौकिक और आध्यात्मिक जीवन को भी सार्थक और सफल बनाती है किंतु उसका अपना स्वयं का जीवन समाप्ति की दहलीज पर है ।गंगा को गंगा बनाने वाला न तो उसमें जल है और न ही भारतीय संस्कृति को  अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत। वह नित्य प्रति निरंतर सूखती जा रही है। पानी का निरंतर अभाव उसके अस्तित्व के समक्ष प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ा है। जहां कहीं थोड़ा बहुत पानी दिखाई दे जाता है ,वह कहने भर को पानी है ,उसे छूने से भी संक्रमित हो जाने का डर लगता है। धरती के समस्त पाप को आत्मसात कर सबको पवित्र बना देने वाली गंगा,अब उसमें छोड़े गए अपशिष्ट पदार्थों, औद्योगिक कचरे एवं प्रदूषित जल तथा शहरों के अपशिष्ट मल जल  से काले नाले के रूप में परिणत हो गई है।गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक उसमें प्रवाहित होने वाला कलुषित जल श्रद्धालुओं के लिए भले ही जल हो, किंतु आम आदमी उसे जल के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। गंगा में बहता हुआ औद्योगिक कचरा शहरों का अवशिष्ट मल जल तथा नाना प्रकार के प्रदूषित पदार्थ गंगाजल को पूर्णरूपेण प्रदूषित कर उसके वैशिष्ट्य को लगभग समाप्त कर चुके हैं और गंगा असहाय बनकर लंबे समय से  किसी भगीरथ की प्रतीक्षा में अनवरत मृतप्राय सी बह रही है।सौभाग्य से वर्ष 2014 में संपन्न लोकसभा चुनाव में श्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से प्रत्याशी बने और उन्होंने अपने आप को गंगा के पुत्र के रूप में प्रस्तुत कर गंगा के आवाहन पर बनारस आने तथा गंगा  को प्रदूषण मुक्त कर उसे अविरल प्रवाह प्रदान करने का संकल्प व्यक्त किया तथा नमामि गंगे नाम से एक स्वतंत्र मंत्रालय का गठन कर गंगा की मुक्ति ,शुद्धि के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए  ठोस कदम उठाने का कार्य किया है। नमामि गंगे का शाब्दिक अर्थ या तात्पर्य है गंगा को नमस्कार करता हूं या गंगा को प्रणाम करता हूं । 'नमामि गंगे' वाक्य गंगा के प्रति राष्ट्र एवं समाज की सहज रूप से प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।‌वस्तुतः नमामि गंगे परियोजना का लक्ष्य गंगा को बचाना है,उसे प्रदूषण से मुक्ति प्रदान करना तथा  प्रवाह को उसके मौलिक स्वरूप में लाना है। इस योजना का आधिकारिक नाम एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन परियोजना अर्थात स्वच्छ गंगा परियोजना है। इस परियोजना हेतु वर्ष 2014 -15 के बजट में 2037करोड़ रुपए की आरंभिक राशि की व्यवस्था कर योजना को प्रारंभ किया गया था तथा प्रारंभ करते हुए कहा गया था कि गंगा की सफाई और उसे संरक्षण प्रदान करने के नाम पर अब तक बहुत अधिक राशि खर्च की जा चुकी है किंतु उसकी हालत में कोई अंतर नहीं आया, जिसे देखते हुए इस परियोजना को व्यापक रूप से प्रारंभ किया जा रहा है ।योजना के अंतर्गत गंगा की व्यापक रूप से सफाई कर उसे पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त करना है ।परियोजना  देश के 5 राज्यों तक फैली हुई है, जिनमें उत्तराखंड, झारखंड, उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल और बिहार तो पूर्णरूपेण गंगा नदी के प्रवाह पथ में स्थित हैं ,इसके अतिरिक्त सहायक नदियों के कारण हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा ,छत्तीसगढ़ और दिल्ली का भी कुछ हिस्सा इस परियोजना में सम्मिलित हैं।‌ गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का कार्य वर्ष 1985 में गंगा कार्य योजना के नाम से प्रारंभ हुआ था जिसके द्वारा दूषित कचरा एवं मल-जल लेकर गंगा में मिलने वाले नालों की पहचान कर उन पर जल उपचार संयत्र लगाने की योजना प्रारंभ की गई थी और मार्च 2000 में लगभग 451 करोड़  की धनराशि खर्च करने के बाद इस योजना को पूर्ण घोषित कर दिया गया था किंतु अब तक किए गए कार्य से कोई सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं हुआ । गंगा में गिरने वाले प्रदूषित मल जलयुक्त नाले  अविरल कचरा युक्त प्रदूषित  जल को गंगा में छोड़ रहे हैं,उनमें लगे हुए मलजल उपचार यंत्र  हाथी के दांत की तरह ही दिखाई पड़ रहे हैं।उनका कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। गंदे नालों के साथ ही गंगा में प्रदूषित जल की आपूर्ति उसकी सहायक नदियां भी निरंतर कर रही हैं ,जिसे देखते हुए पिछले दिनों राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 16 राज्यों में 34 नदियों की सफाई के लिए 5800 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी थी और अपने हिस्से की 2500 करोड़ की धनराशि भी विभिन्न राज्यों को प्रदान किया था ,जिससे गंगा में मिलने वाली उसकी सहायक नदियों की भी साफ-सफाई हो सके क्योंकि देश की नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो चुकी है ।इनमें निरंतर हो रही जल की कमी और बढ़ते प्रदूषण के कारण इनका अस्तित्व निरंतर समाप्त हो रहा है तथा यह स्वयं में अपने नदी के स्वरूप का परित्याग कर गंदे नाले के रूप में ही स्थापित होकर रह गई हैं। इन नदियों की दो प्रमुख समस्याएं हैं -नदियों में हो रहे जल की निरंतर कमी और दूसरा गंदे नालों तथा औद्योगिक इकाइयों के  अपशिष्ट पदार्थों का नालों के माध्यम से इन नदियों पर मिलना ,जिसके कारण लगभग सूख रही नदियों का बचा कुचा जल, जल न होकर अब गंदे नाले का ही स्वरूप धारण कर चुका है और जिसे किसी न किसी रूप में ढोकर वह गंगा में समर्पित कर उसके जल को प्रदूषित करने तथा गंगा को नाले के रूप में परिवर्तित करने मैं अपना अप्रतिम योगदान दे रही हैं ,जिससे गंगा का जल जो कभी शरीर ही नहीं आत्मा को भी पवित्र करने की सामर्थ्य रखता था, आज उसको छूने मात्र से शरीर में अनेक प्रकार के रोग हो जाने की संभावना बन जाने से उसका स्पर्श करना भी लोग श्रेयस्कर नहीं मानते। नमामि गंगे की घोषणा के बाद यह विश्वास बना था की गंगा की सफाई होगी और गंगा अपने मूल स्वरूप को वापस प्राप्त कर लेगी किंतु इस दिशा में कोई ठोस कार्य न होने से उसका भी कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। गंगा के नाम पर राजनीति करने वाले और धन संग्रह कर अटालिकाएं बनाने वालों के नमामि गंगे योजना या गंगा स्वच्छता परियोजना महज धन संग्रह करने का ही एक साधन बनकर रह गई है, फलस्वरूप स्वच्छता एवं प्रदूषण मुक्ति के नाम पर ढाक के वही तीन पात ।गंगा उसी तरह प्रदूषित मल युक्त ,मैली कुचैली ,गंदे नाले के रूप में मरणासन्न अवस्था में प्रवाहित हो रही है। गंगा की वर्तमान स्थिति क्या है? विकास के नाम पर उन्हें जगह-जगह स्थान स्थान पर बांध दिया गया है ,गंगाजल का अविरल प्रवाह बाधित है ,गोमुख से निकलने वाला गंगाजल सरकारी विकास यात्रा में खो जाता है, गंगासागर तक उस जल की एक बूंद भी नहीं पहुंच पा रही है।गंगा की यह दुर्दशा 1 दिन में न होकर लंबे समय से की गयी निरंतर अवहेलना का परिणाम  है।स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उसके जल को विकास के नाम पर प्रवाहित होने से रोककर अनेक नहरे बनाते हुए विद्युत उत्पादन का अजस्र स्रोत बना दिया गया है ।फलस्वरूप मां गंगा में पानी का पूर्ण  अभाव हो गया है ।आज मां गंगा की स्वच्छता बनाए रखने  तथा उसके अविरल प्रवाह को बनाए रखने के नाम पर करोड़ों रुपए प्रतिवर्ष खर्च किए जा रहे हैं ,किंतु खर्च की जा रही वह धनराशि गंगा  सफाई में रंच मात्र भी योगदान न देकर केवल धन्ना सेठों की तिजोरियो की राशि में ही अभिवृद्धि कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा गंगा के लिए अलग मंत्रालय बनाकर भारी भरकम बजट आवंटित करने से सबको लगा था कि अब तो गंगा की सफाई हो कर ही रहेगी, किंतु अब तक ऐसा नहीं हो सका। गंगा सफाई के नाम पर अनेकानेक परियोजनाओं को संचालित करने हेतु धन का अत्यधिक व्यय कर यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया कि गंगा की सफाई का कार्य किया जा रहा है, किंतु योजनाएं तो अनेक बनी किंतु धरातल पर गंगा की सफाई के नाम पर कोई सार्थक कार्य नहीं हो सका ।गंगा मृतप्राय स्तिथि मे थी और अब अपनी मृत्यु के और नजदीक पहुंच गई है ।                    सरकार की 20 हजार करोड़ की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना का लक्ष्य 2020 तक गंगा को निर्मल बनाकर उसे उसका मौलिक स्वरूप प्रदान करना रहा है किंतु अपेक्षित प्रगति न हो पाने के कारण उसका समय 2022 तक बढ़ा दिया गया है । राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने देश की 351 नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की है और नदियों की स्थिति को देखते हुए उसने उनकी निगरानी के लिए सेंट्रल मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया है ।नदियों में गिर रहे  सीवर गंदे नाले और उनमें घुले रसायन उसके प्रवाह और जल राशि को निरंतर सीमित कर रहे हैं। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए खर्च की जा रही भारी भरकम धनराशि के बावजूद यह कहना कठिन है कि किन नदियों की साफ सफाई का कार्य संपन्न हो सकेगा क्योंकि नदियों को संरक्षित सुरक्षित करने के विभिन्न अभियानों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। वस्तुतः नदियों की साफ सफाई एवं उन्हें प्रदूषण मुक्त करने का जिम्मा जिन भी विभागों को दिया गया है उनको इसके प्रति जवाबदेह नहीं बनाया गया ।यदि कार्य को सौंपते समय संबंधित व्यक्तियों एवं विभागों को कार्य की संपूर्णता एवं उसके परिणाम के प्रति जिम्मेदार एवं उत्तरदायी बना दिया जाए तो संभव है कि उसका परिणाम सार्थक आए किंतु नदियों के संरक्षणऔर संवर्धन के नाम पर भारी भरकम राशि तो खर्च की जा रही है किंतु वह राशि कहां खर्च हो रही है तथा उसका क्या परिणाम प्राप्त हो रहा है यह देखने वाला कोई नहीं। राज्य अथवा केंद्र सरकार तथा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा किए गए कार्य मात्र औपचारिक बनकर रह गए हैं ।उनका कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहा है ।                   नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत गंगा नदी को साफ करने का अभियान कुछ आशा जगा रहा है किंतु कार्य को संपन्न करने में निरंतर बढ़ते समय के कारण इंतजार का समय लंबा होता जा रहा है। वस्तुतः गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए गए हैं ।वर्ष 1985 से गंगा की सफाई का कार्य निरंतर चल रहा है किंतु गंगा स्वच्छ हुई यह समाचार तो कभी सुनने को नहीं मिलता ।वरन् उसके स्थान पर समय-समय पर गंगा के और अधिक प्रदूषित होने तथा उसका पानी प्रयोग में लाने योग्य न होने की सूचना प्राप्त होती रहती है। गंगा की न केवल सफाई का सवाल आज भी मुंह बाए खड़ा है बल्कि उसके लिए बहाए जाने वाले पैसे कहां और कैसे खर्च किए जा रहे हैं इसका किसी को पता नहीं चल रहा है । वर्षों से गंगा का सफाई का कार्य चलने के बावजूद उसका परिणाम तो कोई सामने आ नहीं रहा बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अब भी समय-समय पर इस संदर्भ में निर्देश जारी करने पड़ते हैं, जिससे गंगा में अपशिष्ट और औद्योगिक कचरा न प्रवाहित किया जाए। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड में उत्तर प्रदेश उत्तराखंड पश्चिम बंगाल और बिहार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह निर्देशित किया है कि वह अपने क्षेत्र में गंगा को प्रदूषित करने वाले समस्त नदी नालों पर नियंत्रण करें तथा समय-समय पर उसका परीक्षण भी करें।गंगा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक कुछ स्थानों को छोड़कर गंगा का पानी पीने लायक तो दूर स्पर्श योग्य भी नहीं रह गया है। नदी में कोलीफॉर्म जीवाणु का स्तर इतना बढ़ गया है कि वह मनुष्य की सेहत के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।वस्तुतः गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की सर्वप्रथम योजना गंगा कार्य योजना अस्तित्व में आई उसके पश्चात् समय के साथ बदलती हुई अनेक योजनाओं की अनवरत यात्रा के पश्चात नाम परिवर्तन के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आई नमामि गंगे योजना सफेद हाथी बनकर रह गई हैं, जो सरकार द्वारा निर्गत भारी भरकम धनराशि को हजम कर जा रही हैं किंतु गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक परिणाम प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो रही हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने अपने स्तर से इस दिशा में प्रयास अवश्य कर रही हैं किंतु इस दिशा में कागजी काम तो अवश्य हो रहा है।गंगा की गोद में गिरने वाली गंदगी और जहर को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर पूरा काम नहीं किया गया। उत्तर प्रदेश के कानपुर और उन्नाव में इस दिशा में जो भी कार्य योजनाएं बनी उनको कभी अमल में नहीं लाया जा सका। उन्नाव के औद्योगिक इकाइयों से आने वाला कचरा कानपुर के गंदगी के साथ मिलकर गंगा में निरंतर आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है। कानपुर सीमा से बांगरमऊ सफीपुर आदि अनेक कस्बों तथा उनसे संटे छोटे 34 गांव का सीवेज और गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है ।प्रयागराज में भी गंगा की स्थिति इससे अलग नहीं है ।कागजों में भले ही उत्तर प्रदेश के कानपुर प्रयागराज आदि शहरों के नालों का गंदा पानी तथा उसका जहर गंगा में जाने सेंरोक दिया गया हो व्यवहार में वह अब भी निरंतर गंगा में अपना जहर युक्त गंदा पानी डाल रहे हैं। कमोबेश यह स्थिति गंगा के समग्र प्रवाह पथ की है ।उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल के गंगासागर तक गंगा में सफाई का कार्य एवं उसको प्रदूषण मुक्त किए जाने का का कार्य बमुश्किल कहीं दिखाई पड़ता है किंतु उसको प्रदूषण युक्त करने तथा उसमें जहर घोलने का कार्य करने वाले अनेकानेक गंदे नाले अपनी पूरी क्षमता के साथ  गंगा से मिलते हुए दिखाई पड़ते हैं।वस्तुत: नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत गंगा या अन्य नदियों को प्रदूषण मुक्त करने में जितना योगदान उनमें गिरने वाले गंदे नालों को रोकने का है ,उससे बड़ा योगदान नदियों  के जल स्तर को बढ़ाने से हो सकता है ।यदि गंदे नालों को रोक दिया जाए और नदियों में बहने वाले जल के स्तर को बढ़ा दिया जाए तो इस समस्या का समाधान शीघ्र प्राप्त हो सकता है किंतु नदियों में निरंतर हो रही जल की कमी प्रदूषण स्तर को निरंतर बढ़ाता ही जाता है जिसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के साथ साथ सामान्य जनमानस को भी सोचने विचार करने की आवश्यकता है। जनमानस की सहभागिता के आधार पर ही किए गए कार्यों से नदियों की साफ सफाई हो सकती है तथा उनका जलस्तर बढ़ सकता है,किंतु अभी तक कहीं भी जनमानस का सहयोग दिखाई नहीं दे रहा ।परिणाम स्वरूप अपेक्षित परिणाम भी कही परिलक्षित नहीं हो रहा है ।

केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में स्थान पाने वाली नमामि गंगे परियोजना के चलते हुए भी गंगा में गिरने वाले नालों की संख्या में अभी तक कोई कमी नहीं आई। प्रधानमंत्री मोदी जी एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी के प्राथमिकता के कार्यों में गंगा को प्रदूषण मुक्त करना प्रमुख कार्य है, किंतु अब तक अरबों रुपया पानी की तरह बहा देने के बावजूद गंदे नालों का प्रदूषित औद्योगिक कचरा तथा मल युक्त जल निरंतर पतित पावनी गंगा में पहुंचकर प्रदूषित कर रहा है ।उत्तर प्रदेश में आज भी 61% नालों का गंदा पानी सीधे गंगा में जा रहा है ।गंगा में मिलने वाले मात्र 39% वाले ही अब तक टैप किए गए हैं , सरकारी विवरण के अनुसार 27% नालों में काम चल रहा है जबकि  26% नाले ऐसे हैं जिनकी डीपीआर भी अभी तक नहीं बनी है ।प्रदेश में गंगाजल की स्थित  इतनी भयंकर है कि गढ़मुक्तेश्वर एवं बदायूं को  छोड़कर किसी भी स्थान में गंगा का जल नहाने लायक नहीं है, साथ ही प्रदेश में एक भी स्थान पर आचमन योग्य नहीं है। प्रदेश में गंगा नदी में छोटे-बड़े कुल 301 नाले मिलते हैं इनमें से 86 तो बिजनौर से लेकर कानपुर के बीच मिलते हैं जबकि  कानपुर से आगे बलिया तक215 नाले  मिलते हैं, इनमें से  117 नाले  ही ऐसे हैं जो टैप हैं। आज भी 184 नाले बिना किसी ट्रीटमेंट के शहरों  की गंदगी एवं कचरा गंगा नदी में निरंतर समर्पित कर कर रहे हैं।एनजीटी ने कई बार इस तथ्य की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए उसे फटकार लगाई है किंतु सरकारी अधिकारी पूरे प्रकरण को आंकड़ों के मायाजाल में उलझा कर गंगा को प्रदूषित बनाए रखकर भ्रष्टाचार की गंगा बहाने में सफल होते आ रहे हैं। संबंधित अधिकारियों की लापरवाही एवं उनकी अकर्मण्यता के चलते विद्यमान गंगा प्रदूषण  को दृष्टि में रखकर एनजीटी तथा हाईकोर्ट ने गंगा गंगा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। गंगा को प्रदूषण मुक्त किए जाने के कार्य की गंभीरता  का आकलन इसी तथ्य से किया जा सकता है कि अभी तक 301 नालों में से 82 नालों में टैपिंग का काम चल रहा है, 77 नालों कीअभी डीपीआर तक नहीं बनी, साथ ही  पूर्व में एसटीपी बनाने के लिए चिन्हित किए गए 25 नालों के संदर्भ में अब अधिकारी कह रहे हैं कि इनमें एसटीपी बनाने की आवश्यकता नहीं है। गंगा के प्रदूषण की जांच हेतु उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदेश के 32 स्थानों से गंगाजल का सैंपल लेता है, बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार उन 32 स्थानों में से 30 स्थानों पर गंगाजल अत्यंत प्रदूषित है। प्रयागराज से प्राप्त सरकारी आंकड़ों के अनुसार आज भी 198 एमएलडी दूषित पानी बिना शोधित किए ही गंगा यमुना में प्रवाहित हो रहा है। प्रयागराज में कुल 76 नालों से सीवेज का पानी आता है जिनमें से 32 नालों को एसटीपी से जोड़ा जा चुका है, जबकि झूंसी के  12, नैनी के 6 और फाफामऊ के तीन तथा शहर के 11 ना लें अभी तक यह स्थिति से जुड़ नहीं सके हैं।झूसी नैनी और फाफामऊ में यसटीपी ना होने के कारण कई नालों का 198 एमएलडी सीवेज का गंदा पानी नदी में जा रहा है।

नमामि गंगे परियोजना के  अंतर्गत करोड़ों रुपए खर्च  करने के बाद भी गंगा प्रदूषण में कोई कमी न आने के कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्णपीठ ने नमामि गंगा परियोजना के महानिदेशक, जल निगम उत्तर प्रदेश और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर कड़ी  टिप्पणी करते हुए नमामि गंगा के मद में आवंटित धन और उत्तर प्रदेश को दिए गए धन  तथा आवंटित धन के उपयोग पर जानकारी मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राप्त जान प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रयागराज में जल को शुद्ध करने वाली कंपनी से किए गए करार में यह प्रावधान रखा गया है कि यदि निश्चित मात्रा से अधिक जल प्रवाहित होता है तो उसके शोधन की जिम्मेदारी की जिम्मेदारी संबंधित कंपनी की नहीं होगी परिणाम स्वरूप अधिक जल प्रवाहित होने के कारण प्रदूषित जल ही प्रवाहित होकर गंगा में जा रहा है। यह स्थिति केवल प्रयागराज की ही नहीं है, उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे 26 शहर  बसे हुए हैं, इन 26 शहरों के साथ ही विभिन्न राज्यों में गंगा किनारे बसे शहरों की भी यही स्थिति है। किसी भी शहर के सीवेज के पानी और औद्योगिक कचरे का बिना शोधन किए उसे गंगा में प्रवाहित किया जा रहा है ।परिणामस्वरुप करोडों रुपए खर्च करने के बाद भी गंगा प्रदूषित ही बनी हुई है ।गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से भारी भरकम धनराशि की तो व्यवस्था कर दी गई है किंतु कार्य को समय से संपन्न करने एवं उसकी गुणवत्ता को बनाए रखते हुए धान के सदुपयोग का दायित्व निर्धारित नहीं किया गया जिसके कारण परियोजना के कार्य में न तो गति है और  न ही समयबद्थता, अपितु धन का दुरुपयोग हो रहा है, जिस पर अंकुश लगाते हुए संबंधित संस्थाओं पर समयबद्ध ढंग से कार्य की गति   तथा धन के उपयोग का दायित्व निर्धारित करते हुए  ही लाया जा सकता हैनिर्धारित समय सीमा पर परियोजना को पूर्ण कर मां गंगा को प्रदूषण मुक्त कर स्वच्छ बनाया जा सकता है, अन्यथास्थिति में नमामि गंगे परियोजना व्यक्ति विशेषों के निरंतर आय का साधन ही बनी रहेगी।

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