गंगे ! तव दर्शनात्मुक्ति:

 डॉ दिनेश प्रसाद मिश्र 


गंगा , गायत्री और गाय भारतीय संस्कृति की आधारभूत अमूल्य निधि तथा जीवन्त आधार  हैं, जिनमें भारतीय मनीषा ,भारतीय समाज के भौतिक उत्थान के साथ-साथ आध्यात्मिक उत्थान की दिशा भी देखती है।आदिकाल से भारतीय संस्कृति में मानव जीवन के उत्थान में इनके योगदान को देखते हुए  इन्हे सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भारतीय समाज और मानव भौतिक जीवन के उत्थान के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन के उत्थान और संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्ति हेतु निरंतर इनकी आराधना एवं सेवा में रत रहते हैं। गंगा गाय और गायत्री की इस त्रिकुटी में गंगा को पापहर्त्री एवं मोक्षदायिनी मानकर मां का स्थान दिया गया है। फलत:भारतीय समाज में उसे गंगा मां के रूप में संबोधित किया जाता है ।वस्तुतः भारतीय समाज के लिए वह मात्र नदी न होकर गंगा मां है , जो भारतीय समाज एवं मानव जीवन को चतुर्दिक उत्कर्ष प्रदान करती हुई मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य " मुक्ति" को सहज बनाती हुई उसे भवसागर से मुक्त करती है , किंतु विडंबना है कि दर्शन मात्र से मानव जीवन को  मुक्ति प्रदान करने वाली गंगा मांआज अपनी मुक्ति के लिए किसी भगीरथ की राह देख रही है, जो दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं दे रहा है । उद्योगों का अपशिष्ट जल ,शहरों के सीवेज का मल जल तथा अपने साथ लाई गई मिट्टी के साथ साथ विभिन्न माध्यमों से पहुंचने वाले जहरीले तत्वों से युक्त होकर मां गंगा अपनी जीवन शक्ति का परित्याग करती हुई अपने जीवन से भी  विमुख होती हुई दिख रही है।

मां गंगा की इस स्थिति को देखते हुए यूं तो येन केन प्रकारेण चर्चा वर्ष पर्यंत होती रहती है, किंतु माघ मास में प्रयागराज में आयोजित होने वाले माघ मेले के समय यह चर्चा मुखर होकर सामने आती है। गंगा में निरंतर कम हो रहे जल तथा बढ़ रहे प्रदूषण को दृष्टिगत रखते हुए कल्प वासियों के स्नान हेतु गंगा में पर्याप्त स्वच्छ जल की उपलब्धता न होने के कारण माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में जनहित याचिका दाखिल कर गंगा में पर्याप्त जल  प्रवाहित करने तथा उसे प्रदूषण मुक्त किए जाने की मांग की गई ,जिस मा.उच्च न्यायालय ने प्रतिदिन 3700 क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया है। सुनवाई के दौरान यह तथ्य उभरकर सामने आया कि प्रयागराज में 16 नालों के पानी के शुद्धिकरण के लिए लगाए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहे हैं ,कई प्लांट बंद है तो कई काम नहीं कर रहे हैं । नालों के माध्यम से शहर के अधिकांश मोहल्लों का पानी गंगा में जा रहा है, पानी की बायोरेमेडीएशन विधि से शुद्धिकरण करने की व्यवस्था बनाई गई है किंतु यह व्यवस्था भी कारगर नहीं है ।सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और बायोरेमेडीएशन विधि से शुद्ध किया जाने वाला पानी बिना उपयुक्त शुद्धता प्राप्त किए गंगा में प्रवाहित हो रहा है। अलग तथ्य है कि गंगा के जल को शुद्ध करने वाले ट्रीटमेंट प्लांट पर करोड़ों रुपए वर्षों से व्यय किए जा रहे हैं, करोड़ों रुपए व्यय करने के बाद भी विद्युत विभाग के अनुसार प्रत्येक ट्रीटमेंट प्लांट  पर विद्युत विभाग के 60 से 65 लाख रुपए बकाया हैं, जिसे देखते हुए यही लगता है कि नगर निगम और जल संस्थान शुद्धिकरण के नाम पर केवल आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं, जबकि गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, किंतु उसका प्रभाव एवं परिणाम निकलकर जमीन पर नहीं आ पाया। गंगा पहले भी मैली थी और आज भी मैली है। उसके शुद्धिकरण के लिए अनेक योजनाओं के प्रभावी हो जाने तथा राष्ट्र का करोड़ों रुपए व्यय हो जाने के बाद भी वह मैली की मैली बनी हुई है। धरती के समस्त पाप को आत्मसात कर सबको पवित्र बना देने वाली गंगा,अब सब के द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट पदार्थों, औद्योगिक कचरे एवं प्रदूषित जल तथा शहरों के अपशिष्ट मल जल  से काले नाले के रूप में परिणत हो गई है।गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक उसमें प्रवाहित होने वाला कलुषित जल श्रद्धालुओं के लिए भले ही जल हो, किंतु आम आदमी उसे जल के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। गंगा में बहता हुआ औद्योगिक कचरा शहरों का अवशिष्ट मल जल तथा नाना प्रकार के प्रदूषित पदार्थ गंगाजल को पूर्णरूपेण प्रदूषित कर उसके वैशिष्ट्य को लगभग समाप्त कर चुके हैं और गंगा असहाय बनकर लंबे समय से  किसी भगीरथ की प्रतीक्षा में अनवरत मृतप्राय सी बह रही है।वर्ष 2014 मे गंगा  को प्रदूषण मुक्त कर उसे अविरल प्रवाह प्रदान करने एवं उसे मूर्त रूप देने के लिए नमामि गंगे नाम से एक स्वतंत्र मंत्रालय का गठन कर गंगा की मुक्ति ,शुद्धि के लिए भारत सरकार द्वारा ठोस कदम उठाने का कार्य किया गया है। नमामि गंगे का शाब्दिक अर्थ या तात्पर्य है गंगा को नमस्कार करता हूं या गंगा को प्रणाम करता हूं । "नमामि गंगे" वाक्य गंगा के प्रति व्यक्ति एवं राष्ट्र  की सहज रूप से उसके प्रति प्रतिबद्धता सम्मान एवं आस्था व्यक्त करता है।

‌         वस्तुतः नमामि गंगे परियोजना का लक्ष्य गंगा को बचाना है,उसे प्रदूषण से मुक्ति प्रदान करना तथा गंगा के प्रवाह को उसके मौलिक स्वरूप में लाना है। इस योजना का आधिकारिक नाम एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन परियोजना अर्थात स्वच्छ गंगा परियोजना है। इस परियोजना हेतु वर्ष 2014 15 के बजट में 2037करोड़ रुपए की आरंभिक राशि की व्यवस्था कर योजना को प्रारंभ किया गया था तथा प्रारंभ करते हुए कहा गया था कि गंगा की सफाई और उसे संरक्षण प्रदान करने के नाम पर अब तक बहुत अधिक राशि खर्च की जा चुकी है किंतु उसकी हालत में कोई अंतर नहीं आया, जिसे देखते हुए इस परियोजना को व्यापक रूप से प्रारंभ किया जा रहा है ।योजना के अंतर्गत गंगा की व्यापक रूप से सफाई तथा उसे पूर्णरूपेण प्रदूषण से मुक्त करना है ।परियोजना  देश के 5 राज्यों तक फैली हुई है, जिनमें उत्तराखंड, झारखंड, उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल और बिहार तो पूर्णरूपेण गंगा नदी के प्रवाह पथ में स्थित हैं ,इसके अतिरिक्त सहायक नदियों के कारण हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा ,छत्तीसगढ़ और दिल्ली का भी कुछ हिस्सा इस परियोजना में सम्मिलित हैं।

‌ गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का कार्य वर्ष 1985 में गंगा कार्य योजना के नाम से प्रारंभ हुआ था जिसके द्वारा दूषित कचरा एवं मल-जल लेकर गंगा में मिलने वाले नालों की पहचान कर उन पर जल उपचार संयत्र लगाने की योजना प्रारंभ की गई थी और मार्च 2000 में लगभग 451 करोड़  की धनराशि खर्च करने के बाद इस योजना को पूर्ण घोषित कर दिया गया था किंतु अब तक किए गए कार्य से कोई सार्थक परिणाम उपस्थित नहीं हुआ । गंगा में गिरने वाले प्रदूषित मल जलयुक्त नाले  अविरल कचरा युक्त प्रदूषित  जल को गंगा में छोड़ रहे हैं,उनमें लगे हुए मलजल उपचार यंत्र  हाथी के दांत की तरह ही दिखाई पड़ रहे हैं।उसका कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। गंदे नालों के साथ ही गंगा में प्रदूषित जल की आपूर्ति उसकी सहायक नदियां भी निरंतर कर रही हैं ,जिसे देखते हुए पिछले दिनों राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 16 राज्यों में 34 नदियों की सफाई के लिए 5800 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी थी और अपने हिस्से की 2500 करोड़ की धनराशि भी विभिन्न राज्यों को प्रदान किया था ,जिससे गंगा में मिलने वाली उसकी सहायक नदियों की भी साफ-सफाई हो सके क्योंकि देश की नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो चुकी है ।इनमें निरंतर हो रही जल की कमी और बढ़ते प्रदूषण के कारण इनका अस्तित्व निरंतर समाप्त हो रहा है तथा यह स्वयं में अपने नदी के स्वरूप का परित्याग कर गंदे नाले के रूप में ही स्थापित होकर रह गई हैं। इन नदियों की दो प्रमुख समस्याएं हैं -नदियों में हो रहे जल की निरंतर कमी और दूसरा गंदे नालों तथा औद्योगिक इकाइयों के  अपशिष्ट पदार्थों का नालों के माध्यम से इन नदियों पर मिलना ,जिसके कारण लगभग सूख रही नदियों का बचा कुचा जल, जल न होकर अब गंदे नाले का ही स्वरूप धारण कर चुका है और जिसे किसी न किसी रूप में ढोकर वह गंगा में समर्पित कर उसके जल को प्रदूषित करने तथा गंगा को नाले के रूप में परिवर्तित करने मैं अपना अप्रतिम योगदान दे रही हैं ,जिससे गंगा का जल जो कभी शरीर ही नहीं आत्मा को भी पवित्र करने की सामर्थ्य रखता था, आज उसको छूने मात्र से शरीर में अनेक प्रकार के रोग हो जाने की संभावना बन जाने से उसका स्पर्श करना भी लोग श्रेयस्कर नहीं मानते। नमामि गंगे की घोषणा के बाद यह विश्वास बना था की गंगा की सफाई होगी और गंगा अपने मूल स्वरूप को वापस प्राप्त कर लेगी किंतु इस दिशा में कोई ठोस कार्य न होने से दुखी गंगा पुत्र स्वामी सानंद ने गंगा की जीवन रक्षा हेतु आत्म बलिदान कर दिया किंतु उसका भी कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। ऋषि कल्प पर्यावरणविद सच्चे अर्थों में गंगा को मां मानने वाले स्वामी सानंद का जीवन गंगा रक्षा के नाम पर चला गया, किंतु गंगा के नाम पर राजनीति करने वाले और धन संग्रह कर अट्टालिकाएं बनाने वालों के कान पर जूं भी नहीं रेंगी और  परिणाम अब भी वही है ढाक के तीन पात । पर्याप्त जल की उपलब्धता न होने के कारण गंगा उसी तरह प्रदूषित मल युक्त ,मैली कुचैली ,गंदे नाले के रूप में मरणासन्न अवस्था में  जीर्ण-शीर्ण काया के साथ प्रवाहित हो रही है।

      भारत सरकार ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण को कम करने उनके संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए 20000 करोड़ों रुपए के कुल बजट के साथ वर्ष 2014 में नमामि गंगे परियोजना का प्रारंभ किया था ।इस कार्यक्रम के अंतर्गत गंगा नदी की स्वच्छता और पुनरुद्धार के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यों यथा -- घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट ,ठोसअपशिष्ट सहित प्रदूषण कम करने, नदी तट प्रबंधन ,अविरल जल धारा ,ग्रामीण स्वच्छता तथा जैव विविधता के संरक्षण आदि कार्यों को प्रमुख स्थान दिया गया था। इस परियोजना के अंतर्गत 80235 करोड़ की स्वीकृत लागत से कुल 346 परियोजनाएं शुरू हुई थी जिनमें से 158 परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं। विश्व बैंक द्वारा 300 करोड़ रुपए की नमामि गंगे परियोजना को ₹45 अरब रूपये आगामी 5 वर्ष की अवधि के लिए मंजूर किया गया है । जिसके अंतर्गत विश्व बैंक द्वारा 25000 करोड रुपए की 313 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। विश्व बैंक से प्राप्त इस ऋण का उपयोग नदी बेसिन में प्रदूषण को समाप्त करने एवं अवसंरचना परियोजनाओं के विकास और सुधार के लिए किया जाएगा। 45 अरब रुपए के इस ऋण में 11.34 अरब रुपए का उपयोग मेरठ आगरा तथा सहारनपुर में गंगा की सहायक नदियों पर तीन नए हाइब्रिड एन्यूटी प्रोजेक्ट बनाने तथा 1209 करोड़ रुपए बक्सर ,मुंगेर ,बेगूसराय में चल रही डिजाइन बिल्ड ऑपरेट और ट्रांसफर( डी बी ओ टी )परियोजनाओं के लिए मंजूर किया गया है। गंगा को स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त बनाए रखने के एक अन्य प्रयास में नमामि गंगे योजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश सरकार के मत्स्य पालन विभाग द्वारा विभिन्न प्रजातियों की लगभग 1500000 मछलियों को नदी में छोड़ने की कार्य योजना बनाई गई है। इससे नदी में जैव विविधता को बनाए रखने और संरक्षित करने में मदद मिलेगी और नमामि गंगे अभियान के तहत इसकी सफाई सुनिश्चित होगी। मछलियों को पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के करीब 12 जिलों  गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर ,प्रयागराज ,कौशांबी ,प्रतापगढ़, कानपुर, हरदोई, बहराइच ,बुलंदशहर ,अमरोहा और बिजनौर में छोड़ा जाएगा ।वाराणसी और गाजीपुर जिलों में गंगा में लगभग डेढ़ डेढ़ लाख मछलियां छोड़ी जाएगी, जो गंगा को स्वच्छ रखने के साथ-साथ जैव विविधता को भी नया आयाम देंगी।

           केंद्र सरकार गंगा एवं सहायक नदियों की स्वच्छता एवं निर्मलता के लिए अभियान को और गति प्रदान करने के लिए नमामि गंगे 2.0 परियोजना शुरू करने जा रही है। इस परियोजना का प्रारंभ आगामी कुछ महीनों में हो सकता है।

स्वच्छता अभियान तथा नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कानपुर प्रयागराज गाजीपुर इत्यादि शहरों के अनेक नालों तथा शहर के अपशिष्ट जल को शुद्ध करने हेतु सीवेज प्लांट लगाने तथा नालों को टाइप करने की व्यवस्था की गई थी। कानपुर के सीसामऊ नाले को टेप करने के साथ प्रयागराज सहित अन्य शहरों के अनेक नालों को टैप करने तथा वहां के  प्रदूषित जल तथा अपशिष्ट पदार्थों से युक्त जल को शुद्ध करने की व्यवस्था के अंतर्गत सीवेज ट्रीटमेंटप्लांट तथा बायोरेमेडीएशन विधि की व्यवस्था की गई थी किंतु उसका कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। गाजीपुर, प्रयागराज के अनेक नाले तथा कानपुर के प्रमुख 5नाले उसी गति से सीवेज जल के साथ अपशिष्ट पदार्थ गंगा में अविरल गिरा रहे हैंनदी की सफाई सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने नमामि गंगे अभियान के अंतर्गत गंगा में सीवेज के प्रवाह को खत्म करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की भी योजना बनाई है जिनमें से कानपुर प्रयागराज में कुछ प्लांट चल भी रहे हैं किंतु उनसे बहुत सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे। नदी की सफाई सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने नमामि गंगे अभियान के अंतर्गत गंगा में सीवेज के प्रवाह को खत्म करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की भी योजना बनाई है जिनमें से कानपुर प्रयागराज में कुछ प्लांट चल भी रहे हैं किंतु उनसे बहुत सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे। गाजीपुर जिले में करीब 84 नाले गंगा में अपना प्रदूषित जल छोड़ रहे हैं , जिनमें से अकेले 36 नाले गाजीपुर शहर के हैं, जिनमें विशेष रूप से नवापुर घाट के पास स्थित नाला, कलेक्ट्रेट घाट के बगल से तथा ददरी घाट के पास से गंगा में गिरने वाले नाले समेत कई नालों का दूषित जल गंगा में निरंतरगिर रहा है। कानपुर के 5 नालों  रानी घाट ,गोलाघाट, महेश्वर घाट, डबका नाला और वाजिदपुर नाला को टैप नहीं किए जाने से गंगा में लगभग एक करोड़ लीटर सीवेज का गंदा दूषित पानी निरंतर जा रहा है। नदी की सफाई सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने नमामि गंगे अभियान के अंतर्गत गंगा में सीवेज के प्रवाह को खत्म करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की भी योजना बनाई है जिनमें से कानपुर प्रयागराज में कुछ प्लांट चल भी रहे हैं किंतु उनसे बहुत सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे। कानपुर के 5 नालों  रानी घाट गोलाघाट महेश्वर घाट डव का नाला और वाजिदपुर नाला को टैप नहीं किए जाने से गंगा में लगभग एक करोड़ लीटर सीवेज का गंदा दूषित पानी निरंतर जा रहा है।

              जल अभाव का सामना कर रही आज गंगा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। समय रहते यदि उसे नहीं बचाया गया तो वह दिन दूर नहीं है जब गंगा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। अपने उद्गम स्थल से पर्याप्त जल लेकर आगे बढ़ने वाली मां गंगा जल लुटेरों के माया जाल में फंस कर हिमालय की उपत्यका से निकलते निकलते अपने अगाध जल राशि से हाथ धो बैठती है और अपने आगोश में नाम मात्र का जल लेकर जीर्ण शीर्ण काया लेकर आगे बढ़ती है जहां अनेकानेक नदी नालों के माध्यम से आने वाला प्रदूषित जहर युक्त अपशिष्ट जल जीवन शक्ति के साथ-साथ उस में विद्यमान जैव विविधता को भी समाप्त करती है। गंगाजल का नहरों के माध्यम से अनियंत्रित अवशोषण , अन्य स्रोतों से पर्याप्त जलापूर्ति का अभाव, सनातन धर्म के अन्य प्रतीकों की भांति  मां गंगा को भी लुप्त करने के लिए उद्यत है। कभी अपने स्पर्श, दर्शन एवं स्नान से जन-जन को मुक्ति प्रदान करने वाली गंगा मां आज स्वयं जलाभाव से मुक्ति प्रदान कर उसे जीवन देने हेतु भागीरथ की बाट जोह रही है ,जो उसे जीवन देकर जीर्ण शीर्ण काया तथा प्रदूषित जहर युक्त जल से मुक्ति दिलाकर पुनः जन-जन की मुक्त दायिनी बना सके।

 


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