*अमित शाह की खामोशी का अर्थ और अनर्थ*


 *राष्ट्र चिंतन* 

 *मोदी, शाह और योगी राष्ट्रभक्ति की अमूल्य धरोहर हैं* 

 *आचार्य श्री विष्णुगुप्त* 

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अमित शाह की राजनीति व प्रशासनिक रणनीति, देश की सुरक्षा की कसौटी पर कई विशेषताओं के साथ कसी गयी हैं जो उन्हे अन्य राजनीतिज्ञों की भीड़ से अलग पहचान दिलाती हैं। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि राजनीति, प्रशासनिक रणनीति और देश की सुरक्षा की कसौटी पर उनकी विशेषताएं क्या-क्या हैं जो उन्हें राजनीतिज्ञों की भीड़ से अलग करती हैं। सबसे पहली विशेषता तो यह है कि उन्हें भारतीय राजनीतिक समीकरण की बारीकियों की अद्भुत जानकारी है, विरोधी राजनीतिक समीकरण को भी कैसे अपनी शक्ति बनानी है, उन्हें यह मालूम है। दूसरी उनकी विशेषता है विरोधियों के प्रति सख्त होना और आक्रामक होकर राजनीतिक हमला करना। सुरक्षात्मक होना उन्हें स्वीकार नहीं है। तीसरी विशेषता है नौकरशाही के सिर चढ़कर, नौकरशाही को हांकना। नौकरशाही तभी जनाकांक्षी होती है जब उनकी लगाम कसी हुई होती है और उसके सिर पर बैठने वाला आका लगाम को किसी भी स्थिति में ढीली करने के लिए तैयार नहीं होता। चैथी उनकी विशेषता है, साम, दाम, दंड और भेद की नीति का अनुसरण करना। पाचवीं उनकी विशेषता है आंतरिक सुरक्षा की बारीकियों की जानकारी रखना। आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरा बनने वालों को अंतिम क्रियाकलाप तक पहुचाने से भी वे नहीं हिचकते।

                   उनकी उपर्युक्त विशेषताएं केन्द्रीय गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठने से पहले  जब वे गुजरात में गृह मंत्री थे और बहुत ज्यादा विख्यात नहीं थे तब से सामने आती रही हैं। उस काल को आप पड़ताल कर सकते हैं जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी और विरोधी देषों के विनाशक तत्व किस प्रकार से देश और गुजरात में हिंसा और घृणा का बीजारोपण कर अमानवीय खेल खेला करते थे। दुश्मन देश के हिंसक और घृणित तत्वों को उस समय की केन्द्रीय सरकार द्वारा संरक्षण और सहयोग भी मिलता था। आपको याद करना होगा इशरत जहां को। वह भले ही भारतीय नागरिक थी पर वह मोहरा बनी थी दुश्मन देश की। गुजरात की पुलिस ने उसे मार गिराया था। कहा जाता है कि वह रणनीति अमित षाह की ही थी। इसी तरह गुजरात के उनके गृहमंत्री के कार्यकाल में कई अन्य देशद्रोही और दूर्दांत अपराधियों को सजा दी गयी थी। इसका दुष्परिणाम अमित शाह को भोगना पड़ा था। अमित शाह लंबे समय तक जेल मे थे, कोर्ट ने उन्हें गुजरात मे रहने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उनके इस निर्वासित काल में 2014 के लोकसभा चुनाव के समय उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेवारी मिली थी। इस जिम्मेवारी को उन्होंने ऐसा निभाया कि उनकी वह जिम्मेवारी प्रेरक जिम्मेवारी बन गयी। उत्तर प्रदेश में भाजपा का परचम लहरा उठा और अमित शाह राजनीति की मुख्य धारा में आ गये। भाजपा के अध्यक्ष के नाते अमित शाह की उपलब्धियो मे नरेन्द्र मोदी के प्रथम प्रधानमंत्रित्व के समय राज्यों में भाजपा की सरकारों को लाना और दूसरे कार्यकाल में गृहमंत्री के तौर पर धारा 370 को निष्प्रभावी करने से लेकर नागरिक पंजीकरण कानून पारित कराने तक की उनकी उपलब्धियों से पूरा देश परिचित है।


             इन सब विशेषताओं के रहते हुए भी पिछले कुछ दिनों की उनकी खामोशी  रहस्यमयी है और इसीलिए विमर्श मे हैं। उनकी खामोशी को देख कर ऐसा लगता है कि उनके मंुह पर किसी ने खामोशी के स्टिकर चिपका दिये हैं, उनकी सक्रियता भी लगभग शून्य हो गयी है। खामोशी के साथ ही साथ उनकी सक्रियता भी ठहरे हुए तालाब के उस पानी की तरह है जिसमें हलचल की कोई संभावना ही नहीं बनती है। उनकी निष्क्रियता को देख कर ऐसा लगता है कि उनके रास्ते किसी ने रोक रखे हैं और उनकी सकियता से किसी को परेशानी जरूर है।

                       उदाहरण बहुतेरे हैं। पर आज हम उदाहरण के तौर पर पंजाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सूरक्षा में हुई चूक को लेते हैं। अब तक पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में हुई चूक को लेकर अमित शाह की कोई सबककारी प्रतिक्रिया और सक्रियता सामने नहीं आयी है। वे सिर्फ एक जांच कमिटी का गठन कर निश्ंिचत हो गये। अमित शाह ना तो चुपचाप रहने वाले हैं, और न ही चुप रहकर आगे बढ़ने से रूकने वाले है। वे स्वभाव से आक्रामक हैं, पहले वार करना जानते हैं, दुश्मन का राजनीतिक षिकार करना जानते है। यद्यपि पंजाब सरकार को उन्होंने कोई पाठ नहीं पढ़ाया, कोई सख्त नसीहते नहीं दी, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की, या फिर ऐसा कोई सबक नहीं दिया कि पंजाब जैसी राज्य सरकारें या तो अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी का निर्वाहन करें या बर्खास्त होने और दंड भुगतने के लिए तैयार रहें।

                   

               उनकी खामोशी सिर्फ पंजाब में हुई सुरक्षा की चूक तक सीमित नहीं है। शाहीनबाग की हिंसक करतूत और दुश्मन देश की कारस्तानी पर भी उनकी खामोशी बनी हुई थी। इसका खामियाजा यह हुआ कि शाहीनबाग की मानसिकताओ ने दिल्ली में दंगे की पृष्ठभूमि तक रचा दी। दिल्ली दंगे में दर्जनों लोगों की जानें गयी और सैकड़ों लोग घायल हो गये। किसान आंदोलन में खालिस्तानी और अपराधी तत्वों की हिंसा के बाद भी अमित शाही की खामोशी नहीं टूटी। 26 जनवरी के अवसर पर लाल किले की प्राचीर को लांघकर राष्ट्रीय झंडे के बेअदबी करने के बाद पूरा देश तथाकथित किसान आंदोलन में घूसे हुए खालिस्तानी तत्वों पर कार्रवाई करने के समर्थन में था फिर भी गृहमंत्री के रूप मे उनकी खामोशी टूटी नहीं। इसी संदर्भ में सत्यपाल मलिक की करतूत भी उल्लेखनीय है। सत्यपाल मलिक बार-बार केन्द्र सरकार को संकट में डाल रहे है और नरेन्द्र मोदी को निशाना बना रहे  है। फिर भी सत्यपाल मलिक को प्रोटोकाॅल का पाठ नहीं पढ़ाया जाता।

                        जनमानस की सोच यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इच्छा और कार्यशैली के कारण अमित शाह के राजनीतिक हथियार कुंद हो गये हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच किसी न किसी रूप में लक्ष्मण रेखा जरूर खींच गयी है। दोनों के बीच कहीं न कहीं गलतफहमी जरूर है। अति महत्वाकांक्षा की भी बात हवा में उड़ी है।यद्यपि अति महात्वाकांक्षा की उम्मीद तो कम है पर सोच और कार्यशैली पर उंगलियां जरूर उठ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अब अपनी सोच बदली हुई है। अब वे गांधी और नेहरू के रास्ते पर चल रहे हैं। उन्हें दबाव और उफान की राजनीति नहीं चाहिए, उन्हें आक्रामक राजनीति तथा रणनीति नहीं चाहिए। वे सकारात्मक सोच और कार्यशैली से परिवर्तन लाना चाहते हैं और उसी नीति के सहारे अपने विरोधियों को परास्त करना चाहते है। नरेन्द्र मोदी देश के प्रशासको तथा राजनीतिक विरोधकों में हदृय परिवर्तन लाना चाहते हैं। इसीलिए वे कभी राममंदिर तो कभी बाबा विष्नाथ की दौड़ लगा रहे हैं। क्योंकि यह परिवर्तन आध्यात्मिक जागरण से ही आयेगा, ऐसा उनका विश्वास है।

                  नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ क्रमशः राष्ट्रवाद, राष्ट्रहित व राष्ट्रभक्ति की अमूल्य धरोहर हैं। राष्ट्रवाद, राष्ट्रहित और राष्ट्रभक्ति के सहचर समूह यह नहीं चाहतें कि इस त्रिमूर्ति के बीच कोई लक्ष्मण रेखा बनें, इनके बीच कोई शह-मात का खेल हो, क्योंकि आपसी अहंकार या प्रतिद्वंदिता में राष्ट्र की ही हानि होगी। हमें आज अशेक सिंघल जी की वह उक्ति याद आ रही है कि आठ सौ साल बाद हमारी संस्कृति को विजय और सत्ता मिली है। इस उपलब्धि को आपसी अहंकार और प्रतिद्वंदिता का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए।

                 भय बिन होय न प्रीत। नरेन्द मोदी और अमित शाह की नीति जो भी हों पर राष्ट्र विरोधी तत्व भय से ही शांत रहते हैं, उनकी खतरनाक गतिविधियों पर अंकुष लगता है। जिसकी आज जरूरत है। देश को तोड़ने के लिए खालिस्तानी और तालिबानी शक्तियां बिना भय और सजा से सीधी होने वाली नहीं है। इसके अलावा मजबूत भारत के लिए पंजाब की सुरक्षा चूक, शाहीन बाग और तथाकथित किसानों की करतूत, खतरे की घंटी है। ऐसी गुस्ताखी करने वाली राज्य सरकारों की नींव ही उखाड़ देनी चाहिए। ऐसा तभी होगा जब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह साथ-साथ मिलकर पहले की तरह देश के दुश्मनो को सबक सिखाते रहेंगे और आपसी प्रतिद्वंदिता व अहंकार से भी परे रहें्रगे।


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