बिन पानी सब सून

 डॉ


दिनेश प्रसाद मिश्र 

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे ,मोती ,मानुष , चून। कविवर रहीम का यह दोहा पानी के महत्व का प्रतिपादन भली-भांति कर रहा है । समस्त प्रकृति और जड़ चेतन को जीवंत बनाए रखने में वायु के साथ जल का अप्रतिम योगदान है। इन दोनों में से किसी एक के भी अभाव में जीवन निश्चित रूप से समाप्त हो जाता है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त शक्ति के बलबूते पर कुछ समय मात्र के लिए भले ही इनके अभाव में कुछ समय के लिए कोई मौत से संघर्ष कर ले ,अंतिम परिणाम मृत्यु के समक्ष पराजय को स्वीकार कर उसके आगोश में चला जाना ही अंतिम सत्य बन जाता है। गत दिनों 7 जून को राजस्थान के जालौर जिले में सिरोही के पास रायपुर से रानीवाड़ा क्षेत्र के डूंगरी अपने घर जा रही 60 साल की वृद्धा सुखी देवी तथा उसकी अपनी नातिन अंजलि का अपने साथ पीने का पानी ना ले जाने तथा रास्ते में विद्यमान पानी के अभाव से अकस्मात मौत से सामना हो गया, परिणाम स्वरूप 6 वर्षीय बालिका अंजलि की जीवन लीला प्यास से तड़प तड़प कर समाप्त हो गई । वृद्धा सुखी देवी  बेहोश होकर मृतप्राय सी पड़ी रही ,जहां कुछ राहगीरों द्वारा देखे जाने पर सुखी देवी को पानी  पिलाकर बचा लिया गया किंतु बालिका अंजलि की जीवन लीला ग्रामीणों के पहुंचने के पूर्व ही समाप्त हो चुकी थी, जिससे उसे नहीं बचाया जा सका । उल्लेखनीय है कि श्रीमती सुखी देवी को अपनी नातिन अंजलि के साथ सिरोही क्षेत्र के रायपुर से रानीवाड़ा क्षेत्र के डूंगरी गांव में अपने घर जाना था किंतु कोरोनावायरस के प्रभाव एवं आतंक के चलते परिवहन व्यवस्था बंद होने से किसी भी प्रकार का आवागमन का साधन उपलब्ध न हो पाने के कारण वह करीब 25 किलोमीटर सड़क मार्ग के स्थान पर रेतीले टीलों के मध्य स्थित 15 किलो मीटर के लघु मार्ग का चयन कर अपनी यात्रा को सहज बनाने के लिए निकल पड़ी थी, किंतु दोपहर की गर्मी एवं दहकता सूरज, उससे तपते रेतीले टीले साथ में पानी का अभाव नानी नातिन की जीवन लीला समाप्त करने के लिए पर्याप्त था । वृद्धा नानी को समय रहते सहायता मिल जाने से तो बचा लिया गया किंतु बालिका को अपने प्राण रेतीले टीलों में तड़प तड़प कर उत्सर्ग करने ही पड़े । राजनीतिक दल एवं राजनेता पीने की पानी की व्यवस्था तो उपलब्ध नहीं करा पाए किंतु बच्ची की मृत्यु के पश्चात राजनीतिक शोशेबाजी प्रारंभ कर दी गई हे।

          बालिका अंजलि की मृत्यु पानी के अभाव में राजस्थान के रेतीले टीलों में हुई है किंतु राजधानी दिल्ली सहित देश के समस्त प्रमुख शहर  पेयजल समस्या से जूझ रहेहै। दिल्ली की चाणक्यपुरी विवेकानंद पुरी तथा पंजाबी बाग इत्यादि क्रोम ऐप टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की जा रही है। से पानी पहले और अधिक मात्रा में प्राप्त करने की होड़के चलते लोगों के मध्य मारपीट भी हो रही है। झीलों की नगरी तथा मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित वहां के अनेक शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है भोपाल के एकता नगर में 15 सालों से पानी की समस्या बनी हुई है तथा लोगों को पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है, पर लगभग प्रतिदिन 20 टैंकरो से पानी की आपूर्ति की जाती है। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल के अनेक गांव पानी की गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं दमोह जिले के गोदन गांव में पानी का पानी का पूरी तरह से खात्मा हो गया है यहां निवास करने वाले आदिवासियों को 2 किलोमीटर दूर घाटी से चढ़कर पानी लाना पड़ता है शासन एवं सरकार द्वारा स्थाई व्यवस्था न किए जाने से यह लोगों का जनजीवन अस्तव्यस्त है जिन की समस्या को देखते हुए पिछले 4 साल से एक नवयुवक नरेंद्र कटारे नियमित रूप से अपने टैंकरों के माध्यम से जल की आपूर्ति कर रहा है और उसके द्वारा अब तक इस कार्य में लगभग ₹1000000 खर्च किए जा चुके हैं। राजस्थान के जयपुर जोधपुर उदयपुर आदि जिलों में भी पानी को लेकर मारामारी है टैंकरों के माध्यम से लोगों को जल उपलब्ध कराया जा रहा है। क्या समस्या केवल राजस्थान मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों की ही नहीं है अपितु हर राज्य का हर शहर राज्य एवं हर शहर पानी की समस्या से जूझ रहा है अब तक कोई स्थाई समाधान प्राप्त नहीं किया जा सका है।प्रधानमंत्री जी के जल जीवन मिशन के अंतर्गत घर घर नल से जल पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना को प्रत्येक राज्य द्वारा अपने अपने स्तर से पूर्ण कर पीने का पानी लगभग 2 वर्ष बीत जाने के बाद भी घर-घर तक नहीं पहुंचाया जा सका है । राजस्थान के रेतीले क्षेत्रों को छोड़ देने के बाद भी देश की राजधानी सहित अन्य महत्वपूर्ण शहरों में जल अभाव की समस्या अब तक अपने चरम पर पहुंच गई है,। समस्त प्रमुख शहर पीने के पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। टैंकरों के माध्यम से उनकी प्यास बुझाने का प्रयास सरकारी व्यवस्था तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा की जा रही है। बिहार झारखंड असम उड़ीसा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की 10% से भी कम आबादी को नलों के जरिए जल की आपूर्ति उपलब्ध है। आबादी को अभी भी कम से कम 500 मीटर दूरी से पानी लाना पड़ता है। 

संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को और यू एन वाटर के सहयोग से तैयार वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट में  बताया गया है कि विश्व को अगले कई दशकों तक जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन दो बड़े संकटों का सामना करना पड़ेगा।नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जल संकट से घिरे 122 देशों की सूची में भारत का 120 वां स्थान है। दुनिया के सर्वाधिक जल समस्या ग्रस्त 20 शहरों में भारत के चार प्रमुख शहर चेन्नई कोलकाता मुंबई तथा दिल्ली शामिल हैं जिनका नामउक्त सूचीमें क्रमश: पहले, दूसरे, 11 वें तथा 15वें स्थान पर अंकित है संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार देश के 21 शहरों यथा -बंगलुरु चेन्नई दिल्ली हैदराबाद मुंबई आदि  में पानी का स्तर शीघ्र ही जीरो ग्राउंड वाटर लेबल पर पहुंच जाएगा, जिससे इन शहरों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं होगा।

पृथ्वी का 70% भाग जल से भरा है जिसमें एक अरब चालीस घनलीटर पानी विद्यमान है, जल की इतनी विशाल राशि उपलब्ध होने के बावजूद इसमें पीने योग्य मीठे पानी की मात्रा अत्यंत कम है। पृथ्वी में विद्यमान जल का 97.3% भाग समुद्र का खारा  जल है शेष 27% पीने योग्य जल है। पीने योग्य जल का 75.2% जल ध्रुवीय क्षेत्रों में तथा 22.6% भूगर्भ में जल के रूप में स्थित है, शेष 2.2 प्रतिशत पीने योग्य जल नदियों झीलों  आदि के रूप में पाया जाता है , जिसका 60% भाग कृषि एवं उद्योगों के द्वारा प्रयोग में लाया जाता है शेष 40% सीधे पीने आदि के उपयोग में लाया जाता है। 

द वर्ल्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित 17 अन्य देशों में पानी की समस्या अत्यंत गंभीर है। यह समस्त देश गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं ,अगर इस समस्या पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया जाता तो इन देशों में पानी की एक बूंद भी नहीं बचेगी। 


डब्ल्यू आर आई ने  भूजल भंडार और उसमें आ रही निरंतर कमी ,बाढ़ और सूखे के खतरे के आधार पर विश्व के 189देशो को वहां पर उपलब्ध पानी को दृष्टि में रखकर  श्रेणी बद्ध किया है। जल संकट के मामले में भारत विश्व में 13वें स्थान पर है ।भारत के लिए इस मोर्चे पर चुनौती बड़ी है, क्योंकि उसकी आबादी जल संकट का सामना कर रहे अन्य समस्याग्रस्त 16 देशों से 3 गुना ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के उत्तरी भाग में जल संकट भूजल स्तर के अत्यंत नीचे चले जाने के कारण अत्यधिक गंभीर है। यहां पर जल संकट  'डे जीरो' के कगार पर है,इस स्थिति में नलों का पानी भी सूख जाता है। विगत दिनों बंगलौर एवं चेन्नई में यह स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।कम हो रही वर्षा तथा निरन्तर गिरते भूगर्भ जल स्तर को देखते हुये निकट भविष्य में सम्पूर्ण भारत, विशेष रूप से उत्तर भारत में पानी की अत्यन्त कमी अतिशीघ्र होने वाली है, जिसे भांपकर ही प्रधानमंत्री मोदी ने द्वितीय बार शपथ ग्रहण करने के पश्चात अपनी पहली 'मन की बात 'में जल समस्या से निजात पाने के लिए जल संरक्षण हेतु जनान्दोलन चलाने की बात कही है। आज देश के अनेक भागों में जल की अनुपलब्धता के कारण आंदोलन और संघर्ष हो रहे हैं।दक्षिण भारत के चेन्नई से लेकर उत्तर भारत के अनेक शहरों में पेयजल की समस्या मुंह बाए खड़ी है। देश के लगभग 70% घरों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है ।लोग प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य हैं,जिसके चलते लगभग 4 करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रदूषित पानी पीने से बीमार होते हैं तथा लगभग 6 करोड लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने के लिए विवश हैं। उन्हें पीने के लिए शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर पानी वर्षा के जल के रूप में प्राप्त होता है किंतु उसका लगभग 8% पानी ही हम संरक्षित कर पाते हैं, शेष पानी नदियों ,नालों के माध्यम से बहकर समुद्र में चला जाता है।  हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा के जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसके चलते स्थान स्थान पर पोखर ,तालाब, बावड़ी, कुआं आदि निर्मित कराए जाते थे , जिनमें वर्षा का जल एकत्र होता था तथा वह वर्ष भर जीव-जंतुओं सहित मनुष्यों के लिए भी उपलब्ध होता था,  किंतु वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर इन्हें संरक्षण न दिए जाने के कारण अब तक लगभग 4500 नदियां तथा 20000 तालाब झील आदि सूख गये हैं तथा वह भू माफिया के अवैध कब्जे का शिकार होकर अपना अस्तित्व गवा बैठे हैं। देश की बड़ी-बड़ी नदियों को जल की आपूर्ति करने वाली उनकी सहायक नदियां वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर अपना अस्तित्व गवा बैठी हैं,जो कुछ थोड़े बहुत जल स्रोत आज उपलब्ध हैं,उनमें से अनेक औद्योगिक क्रांति की भेंट चढ़ चुके हैं ।फलस्वरूप उनके पानी में औद्योगिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी कचरे के मिल जाने से उन का जल इतना प्रदूषित हो गया है कि उसको  पीना तो बहुत दूर स्नान करने पर भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाने का खतरा विद्यमान है। 

       भारत की कृषि पूर्णतया वर्षा जल पर निर्भर है। वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई के अन्य साधन सुलभ हो जाते हैं किंतु वर्षा न होने पर सभी साधन जवाब दे देते हैं और कृषि सूखे का शिकार हो जाती है। चीनी उत्पादक महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश के किसान निरंतर गन्ने की खेती पर बल दे रहे हैं और सरकार भी गन्ना उत्पादन के लिए उन्हें प्रोत्साहित कर रही है ।इसी प्रकार धान की खेती के लिए पंजाब छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश इत्यादि अनेक राज्य धान की फसल का क्षेत्रफल निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं किंतु उसके लिए पानी प्राप्त न होने के कारण  पानी भूगर्भ से निकाल कर खेतों को सींचा जा रहा है जिससे भूगर्भ में स्थित जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है देखनी है कि 1 किलोग्राम धान के उत्पादन के लिए लगभग 35 सौ लीटर पानी खर्च किया जा रहा जाता है, जिस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा और पानी की समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है।जलसुलभता को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है के की वर्षा जल को पूर्णरूपेण संरक्षित किया जाए तथा येन केन प्रकारेण भूगर्भ के जल स्तर को बढ़ाया जाए ।साथ ही इसके लिए पूर्णरूपेण सरकारों पर ही आश्रित न होकर जनभागीदारी एवं सामाजिक सहयोग प्राप्त कर भारतीय परंपरा के अनुसार जल स्रोतों कुआ बावड़ी जोहड़ इत्यादि स्थान स्थान पर खुदवा कर जहां एक और भूगर्भ जल स्तर को ऊपर उठाया जा सकता है वहीं दूसरी ओर समस्त जीव-जंतुओं को भी पीने के लिए पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। पूर्व में देश के सेठ साहूकारों एवं धन्ना सेठों द्वारा जल केंद्रों का निर्माण कराया जाता था किंतु अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। भारतीय शास्त्रों उपनिषदों में जल केंद्रों के निर्माण को पुण्य कर्मों की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है किंतु आज नए निर्माण तो हो ही नहीं रहे, पुराने जल केंद्र एवं जल स्रोत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। उनके संरक्षण संवर्धन की परम आवश्यकता है जिससे पानी की समस्या का निदान प्राप्त किया जा सकता है, भविष्य में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए न केवल अंजलि अपितु समस्त जीव जंतुओं का जीवन भी बचाया जा सकेगा।

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