‌नमामि गंगे योजना या मां गंगा की मुक्ति

 


प्रयागराज


गंगा मात्र नदी नहीं अपितु भारतीय समाज के लिए वह गंगा मां है। वह भारतीय समाज एवं संस्कृति की जीवन रेखा है। गंगा जहां एक और भारतीय जनमानस को सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास के पथ पर ले जाती है वहीं दूसरी ओर वह मानव के लौकिक जीवन को समृद्धिशाली बनाने के साथ साथ उसके पारलौकिक और आध्यात्मिक जीवन को भी सार्थक और सफल बनाती है किंतु उसका अपना स्वयं का जीवन समाप्ति की दहलीज पर है ।गंगा को गंगा बनाने वाला न तो उसमें जल है और न ही भारतीय संस्कृति को  अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत। वह नित्य प्रति निरंतर सूखती जा रही है। पानी का निरंतर अभाव उसके अस्तित्व के समक्ष प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ा है। जहां कहीं थोड़ा बहुत पानी दिखाई दे जाता है


वह कहने भर को पानी है ,उसे छूने से भी संक्रमित हो जाने का डर लगता है। धरती के समस्त पाप को आत्मसात कर सबको पवित्र बना देने वाली गंगा,अब सब के द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट पदार्थों, औद्योगिक कचरे एवं प्रदूषित जल तथा शहरों के अपशिष्ट मल जल  से काले नाले के रूप में परिणत हो गई है।गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक उसमें प्रवाहित होने वाला कलुषित जल श्रद्धालुओं के लिए भले ही जल हो, किंतु आम आदमी उसे जल के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। गंगा में बहता हुआ औद्योगिक कचरा शहरों का अवशिष्ट मल जल तथा नाना प्रकार के प्रदूषित पदार्थ गंगाजल को पूर्णरूपेण प्रदूषित कर उसके वैशिष्ट्य को लगभग समाप्त कर चुके हैं और गंगा असहाय बनकर लंबे समय से  किसी भगीरथ की प्रतीक्षा में अनवरत मृतप्राय सी बह रही है।सौभाग्य से वर्ष 2014 में संपन्न लोकसभा चुनाव में श्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से प्रत्याशी बने और उन्होंने अपने आप को गंगा के पुत्र के रूप में प्रस्तुत कर गंगा के आवाहन पर बनारस आने तथा गंगा  को प्रदूषण मुक्त कर उसे अविरल प्रवाह प्रदान करने का संकल्प व्यक्त किया। चुनावी सफलता के बाद प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर - अपनी चुनावी घोषणा को अमलीजामा पहनाते हुए उसे मूर्त रूप देने के लिए नमामि गंगे नाम से एक स्वतंत्र मंत्रालय का गठन कर गंगा की मुक्ति ,शुद्धि के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए  ठोस कदम उठाने का कार्य किया है। नमामि गंगे का शाब्दिक अर्थ या तात्पर्य है गंगा को नमस्कार करता हूं या गंगा को प्रणाम करता हूं ।- वाक्य गंगा के प्रति व्यक्ति की सहज रूप से प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।
‌वस्तुतः नमामि गंगे परियोजना का लक्ष्य गंगा को बचाना है,उसे प्रदूषण से मुक्ति प्रदान करना तथा गंगा के प्रवाह को उसके मौलिक स्वरूप में लाना है। इस योजना का आधिकारिक नाम एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन परियोजना अर्थात स्वच्छ गंगा परियोजना है। इस परियोजना हेतु वर्ष 2014 15 के बजट में 2037करोड़ रुपए की आरंभिक राशि की व्यवस्था कर योजना को प्रारंभ किया गया था तथा प्रारंभ करते हुए कहा गया था कि गंगा की सफाई और उसे संरक्षण प्रदान करने के नाम पर अब तक बहुत अधिक राशि खर्च की जा चुकी है किंतु उसकी हालत में कोई अंतर नहीं आया, जिसे देखते हुए इस परियोजना को व्यापक रूप से प्रारंभ किया जा रहा है ।योजना के अंतर्गत गंगा की व्यापक रूप से सफाई तथा उसे पूर्णरूपेण प्रदूषण से मुक्त करना है ।परियोजना  देश के 5 राज्यों तक फैली हुई है, जिनमें उत्तराखंड, झारखंड, उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल और बिहार तो पूर्णरूपेण गंगा नदी के प्रवाह पथ में स्थित हैं ,इसके अतिरिक्त सहायक नदियों के कारण हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा ,छत्तीसगढ़ और दिल्ली का भी कुछ हिस्सा इस परियोजना में सम्मिलित हैं।
‌ गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का कार्य वर्ष 1985 में गंगा कार्य योजना के नाम से प्रारंभ हुआ था जिसके द्वारा दूषित कचरा एवं मल-जल लेकर गंगा में मिलने वाले नालों की पहचान कर उन पर जल उपचार संयत्र लगाने की योजना प्रारंभ की गई थी और मार्च 2000 में लगभग 451 करोड़  की धनराशि खर्च करने के बाद इस योजना को पूर्ण घोषित कर दिया गया था किंतु अब तक किए गए कार्य से कोई सार्थक परिणाम उपस्थित नहीं हुआ । गंगा में गिरने वाले प्रदूषित मल जलयुक्त नाले  अविरल कचरा युक्त प्रदूषित  जल को गंगा में छोड़ रहे हैं,उनमें लगे हुए मलजल उपचार यंत्र  हाथी के दांत की तरह ही दिखाई पड़ रहे हैं।उसका कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। गंदे नालों के साथ ही गंगा में प्रदूषित जल की आपूर्ति उसकी सहायक नदियां भी निरंतर कर रही हैं ,जिसे देखते हुए पिछले दिनों राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 16 राज्यों में 34 नदियों की सफाई के लिए 5800 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी थी और अपने हिस्से की 2500 करोड़ की धनराशि भी विभिन्न राज्यों को प्रदान किया था ,जिससे गंगा में मिलने वाली उसकी सहायक नदियों की भी साफ-सफाई हो सके क्योंकि देश की नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो चुकी है ।इनमें निरंतर हो रही जल की कमी और बढ़ते प्रदूषण के कारण इनका अस्तित्व निरंतर समाप्त हो रहा है तथा यह स्वयं में अपने नदी के स्वरूप का परित्याग कर गंदे नाले के रूप में ही स्थापित होकर रह गई हैं। इन नदियों की दो प्रमुख समस्याएं हैं -नदियों में हो रहे जल की निरंतर कमी और दूसरा गंदे नालों तथा औद्योगिक इकाइयों के  अपशिष्ट पदार्थों का नालों के माध्यम से इन नदियों पर मिलना ,जिसके कारण लगभग सूख रही नदियों का बचा कुचा जल, जल न होकर अब गंदे नाले का ही स्वरूप धारण कर चुका है और जिसे किसी न किसी रूप में ढोकर वह गंगा में समर्पित कर उसके जल को प्रदूषित करने तथा गंगा को नाले के रूप में परिवर्तित करने मैं अपना अप्रतिम योगदान दे रही हैं ,जिससे गंगा का जल जो कभी शरीर ही नहीं आत्मा को भी पवित्र करने की सामर्थ्य रखता था, आज उसको छूने मात्र से शरीर में अनेक प्रकार के रोग हो जाने की संभावना बन जाने से उसका स्पर्श करना भी लोग श्रेयस्कर नहीं मानते। नमामि गंगे की घोषणा के बाद यह विश्वास बना था की गंगा की सफाई होगी और गंगा अपने मूल स्वरूप को वापस प्राप्त कर लेगी किंतु इस दिशा में कोई ठोस कार्य न होने से दुखी गंगा पुत्र स्वामी सानंद ने गंगा की जीवन रक्षा हेतु आत्म बलिदान कर दिया किंतु उसका भी कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। ऋषि कल्प पर्यावरणविद सच्चे अर्थों में गंगा को मां मानने वाले स्वामी सानंद का जीवन गंगा रक्षा के नाम पर चला गया, किंतु गंगा के नाम पर राजनीति करने वाले और धन संग्रह कर अटालिकाएं बनाने वालों के कान पर जूं भी नहीं रेंगी और  परिणाम अब भी वही है ढाक के तीन पात ।गंगा उसी तरह प्रदूषित मल युक्त ,मैली कुचैली ,गंदे नाले के रूप में मरणासन्न अवस्था में प्रवाहित हो रही है। गंगा की वर्तमान स्थिति क्या है? विकास के नाम पर उन्हें जगह-जगह स्थान स्थान पर बांध दिया गया है ,गंगाजल का अविरल प्रवाह बाधित है ,गोमुख से निकलने वाला गंगाजल सरकारी विकास यात्रा में खो जाता है, गंगासागर तक उस जल की एक बूंद भी नहीं पहुंच पा रही है।गंगा की यह दुर्दशा 1 दिन में न होकर लंबे समय से की गयी निरंतर अवहेलना का परिणाम  है।स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उसके जल को विकास के नाम पर प्रवाहित होने से रोककर अनेक नहरे बनाते हुए विद्युत उत्पादन का अजस्र स्रोत बना दिया गया है ।फलस्वरूप मां गंगा में पानी का पूर्ण  अभाव हो गया है तथा गंगाजल के स्थान पर शहरों के मल जल एवं उद्योगों के द्वारा छोड़े गए गंदे पानी का गंदा नाला बन कर रह गई थ।आज मां गंगा की स्वच्छता बनाए रखने के लिए तथा उसके अविरल प्रवाह को बनाए रखने के नाम पर करोड़ों रुपए प्रतिवर्ष खर्च किए जा रहे हैं ,किंतु खर्च की जा रही वह धनराशि गंगा सफाई में रंच मात्र भी योगदान न देकर केवल धन्ना सेठों की तिजोरियो की राशि में ही अभिवृद्धि कर रही है ।गंगा स्वच्छता अभियान की निरर्थकता एवं उस पर और उसके नाम पर हो रहे निरर्थक व्यय को देखते हुए प्रो़ जी डी अग्रवाल ने गंगा के अविरल प्रवाह को बनाए रखने के लिए संघर्ष करने का निश्चय किया और वह प्रोफेसर जी डी अग्रवाल से स्वामी सानंद बन गए ।स्वामी सानंद ने गंगा के अविरल प्रवाह को बनाए रखना अपने जीवन का एक मात्र उद्देश्य बना लिया, जिसके लिए वह अकेले चलते हुए संघर्ष करते रहे तथा मां गंगा की रक्षा के लिए अपने आंदोलन को धार देते रहे ।केंद्र में तथाकथित हिंदूवादी राष्ट्रवादी सरकार बनने पर उन्हें यह भ्रम हो गया कि यह सरकार तो निश्चित रूप से गंगा की स्वच्छता एवं उसके अविरल प्रवाह के लिए कार्य करेगी। प्रारंभ में शपथ ग्रहण करने के पश्चात गंगा के लिए अलग मंत्रालय बनाकर भारी भरकम बजट आवंटित करने से सबको लगा था की अब तो गंगा की सफाई हो कर ही रहेगी किंतु निकले वही ढाक के तीन पात। गंगा सफाई के नाम पर अनेकानेक परियोजनाओं को संचालित करने हेतु धन का अत्यधिक व्यय कर यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया कि गंगा की सफाई का कार्य किया जा रहा है, किंतु योजनाएं तो अनेक बनी किंतु धरातल पर गंगा की सफाई के नाम पर कोई कार्य नहीं हो सका ।गंगा मृतप्राय स्तिथि मे थी और अब अपनी मृत्यु के और नजदीक पहुंच गई है ,जिसे देखते हुए स्वामी सानंद ने अपने अंतिम संघर्ष के लिए दृढ़ निश्चय होकर 22 जून को आमरण अनशन की घोषणा कर दी सरकार ।सरकार द्वारा किसी प्रकार का कोई प्रयास न किए जाने से दृढ़ निश्चयी श्री स्वामी सानंद आमरण अनशन पर बैठ गए तथा 112 दिन के आमरण अनशन के पश्चात गोलोक वासी हो गए। राष्ट्रवादी तथा हिंदूवादी सरकार उन्हें तिल तिल कर मरते हुए देखती रही या यूं कहें कि सरकार तिल तिल कर मरने के लिए बाध्य करती रही, अतिशयोक्ति नहीं होगी ।राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार द्वारा कोई सार्थक प्रयास उनके अनशन को समाप्त करने के लिए नहीं किया गया। केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती अनशन स्थल पर तो अवश्य आई किंतु कोई सार्थक प्रयास कर स्वामी सानंद के अनशन को समाप्त नहीं करा सकी, वापस जाकर नितिन गडकरी से स्वामी सानंद की दूरभाष पर वार्ता कराई गई ,किंतु उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला। गडकरी स्वामी सानंद से अनशन समाप्त करने का अनुरोध करते रहे और स्वामी सानंद गंगा की अविरल धाराअपने जीवन के मूल्य पर मांगते रहे ,किंतु केंद्रीय मंत्री गडकरी उन्हें वह नहीं दे सके ।श्री गडकरी का यह प्रयास था कि  किसी रूप में स्वामी सानंद अनशन समाप्त कर दें जिसके जवाब में स्वामी सानंद ने उनसे कहा अब मैं आप लोगों के झांसे में नहीं आने वाला ।मेरा जीवन गंगा के लिए समर्पित है ।मैं मृत्यु पर्यंत मां गंगा के लिए संघर्ष करता रहूंगा, जिस पर गडकरी ने उन्हें जो कुछ करना हो करें, कहकर फोन काट दिया। स्वामी सानंद एवं गडकरी की यह वार्ता स्वामी शिवानंद सरस्वती द्वारा जारी की गई है स्वामी सानंद का यह अनशन पहली बार नहीं था उन्होंने मां गंगा के लिए सन्यासी बन कर निरंतर संघर्ष किया ।कांग्रेस की सरकार के समय भी  उन्होंने अनशन किया था और तत्कालीन मंत्री जयराम रमेश उनके पास अनशन स्थल पर आए थे और स्वामी सानंद की मांगों को मानते हुए अनेक परियोजनाओं को तत्कालीन सरकार ने रोक दिया था, जिससे उत्तराखंड का सामान्य जनमानस स्वामी सानंद केआंदोलन को विकास के प्रतिकूल मानते हुए उनके विरोध में भी खड़ा हुआ था, किंतु  उनके द्वारा अपने आंदोलन के औचित्य तथा उत्तराखंड की सुरक्षा हेतु मां गंगा के अविरल प्रवाह के महत्व का प्रतिपादन कर अपना पक्ष प्रस्तुत किया गया‌। परिणाम स्वरुप जनसामान्य तो उनके साथ जुड़ा किंतु तथाकथित राष्ट्रवादी एवं हिंदूवादी सरकार के कान तक न तो उनके विचार और न ही उनके आंदोलन आमरण अनशन की गूंज ही पहुंच सकी। सरकार उनकी ओर से पूर्णरूपेण अन्यमनस्क बनी रही और उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा करती रही ,अंततोगत्वा वही हुआ जिसकी आशंका थी ,स्वामी सानंद ने असामान्य परिस्थिति में अपनी अंतिम  सांसे ली तथा गोलोक वासी हो गए।
‌सरकार की रुपए 20 हजार करोड़ की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना का लक्ष्य 2020 तक गंगा को निर्मल बनाकर उसे उसका मौलिक स्वरूप प्रधान करना रहा है किंतु अब तक की उपलब्धियों तथा कार्यों को देखते हुए उसे प्राप्त कर पाना संभव प्रतीत नहीं हो रहा है,  जिससे उसका समय 2022 तक बढ़ा दिया गया है ।अक्टूबर 2016 में इसके लिए बने प्राधिकरण का विघटन कर नेशनल गंगा कौंसिल का गठन किया गया है किंतु निरंतर परिवर्तित हो रहे नामों से कोई उपलब्धि प्राप्त  नहीं होसकी। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने देश की 351 नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की है और नदियों की स्थिति को देखते हुए उसने उनकी निगरानी के लिए सेंट्रल मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया है ।नदियों में गिर रहे  सीवर गंदे नाले और उनमें घुले रसायन उसके प्रवाह और जल राशि को निरंतर सीमित कर रहे हैं। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए खर्च की जा रही भारी भरकम धनराशि के बावजूद यह कहना कठिन है कि किन नदियों की साफ सफाई का कार्य संपन्न हो सकेगा क्योंकि नदियों को संरक्षित सुरक्षित करने के विभिन्न अभियानों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। वस्तुतः नदियों की साफ सफाई एवं उन्हें प्रदूषण मुक्त करने का जिम्मा जिन भी विभागों को दिया गया है उनको इसके प्रति जवाबदेह नहीं बनाया गया ।यदि कार्य को सौंपते समय संबंधित व्यक्तियों एवं विभागों को कार्य की संपूर्णता एवं उसके परिणाम के प्रति जिम्मेदार एवं उत्तरदायी बना दिया जाए तो संभव है कि उसका परिणाम सार्थक आए किंतु नदियों के संरक्षणऔर संवर्धन के नाम पर भारी भरकम राशि तो खर्च की जा रही है किंतु वह राशि कहां खर्च हो रही है तथा उसका क्या परिणाम प्राप्त हो रहा है यह देखने वाला कोई नहीं। राज्य अथवा केंद्र सरकार तथा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा किए गए कार्य मात्र औपचारिक बनकर रह गए हैं ।उनका कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहा है प्रदूषण की रोकथाम के लिए बनाई गई विभिन्न एजेंसियां यदि अपना कार्य भली-भांति इमानदारी पूर्वक करती तो नदियों के किनारे बसे शहरों में स्थापित सीवेज शोधन संयंत्र पूर्ण क्षमता के साथ कार्य कर नदियों में गिरने वाले सीवर तथा मल जल को साफ कर शोधित कर देते किंतु राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना ऐसा कोई उदाहरण पेश नहीं कर सकी है जो नदियों को संरक्षित करने के मामले में अनुकरणीय साबित हो सके। यह सही है कि गंगा नदी को साफ करने का अभियान कुछ आशा जगा रहा है किंतु कार्य को संपन्न करने में निरंतर बढ़ते समय के कारण इंतजार का समय लंबा होता जा रहा है। वस्तुतः गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए गए हैं ।वर्ष 1985 से गंगा की सफाई का कार्य निरंतर चल रहा है किंतु गंगा स्वच्छ हुई यह समाचार तो कभी सुनने को नहीं मिलता ।वरन् उसके स्थान पर समय-समय पर गंगा के और अधिक प्रदूषित होने तथा उसका पानी प्रयोग में लाने योग्य न होने की सूचना प्राप्त होती रहती है। गंगा की न केवल सफाई का सवाल आज भी मुंह बाए खड़ा है बल्कि उसके लिए बहाए जाने वाले पैसे कहां और कैसे खर्च किए जा रहे हैं इसका किसी को पता नहीं चल रहा है । वर्षों से गंगा का सफाई का कार्य चलने के बावजूद उसका परिणाम तो कोई सामने आ नहीं रहा बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अब भी समय-समय पर इस संदर्भ में निर्देश जारी करने पड़ते हैं, जिससे गंगा में अपशिष्ट और औद्योगिक कचरा न प्रवाहित किया जाए। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड में उत्तर प्रदेश उत्तराखंड पश्चिम बंगाल और बिहार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह निर्देशित किया है कि वह अपने क्षेत्र में गंगा को प्रदूषित करने वाले समस्त नदी नालों पर नियंत्रण करें तथा समय-समय पर उसका परीक्षण भी करें।गंगा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक कुछ स्थानों को छोड़कर गंगा का पानी पीने लायक तो दूर स्पर्श योग्य भी नहीं रह गया है। नदी में कोलीफॉर्म जीवाणु का स्तर इतना बढ़ गया है कि वह मनुष्य की सेहत के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।वस्तुतः गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की सर्वप्रथम योजना गंगा कार्य योजना अस्तित्व में आई उसके पास जॉब उसके पश्चात् समय के साथ बदलती हुई अनेक योजनाओं की अनवरत यात्रा के पश्चात नाम परिवर्तन के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आई नमामि गंगे योजना सफेद हाथी बनकर रह गई हैं, जो सरकार द्वारा निर्गत भारी भरकम धनराशि को हजम कर जा रही हैं किंतु गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक परिणाम प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो रही हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने अपने स्तर से इस दिशा में प्रयास अवश्य कर रही हैं किंतु इस दिशा में कागजी काम तो अवश्य हो रहा है।गंगा की गोद में गिरने वाली गंदगी और जहर को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर पूरा काम नहीं किया गया। उत्तर प्रदेश के कानपुर और उन्नाव में इस दिशा में जो भी कार्य योजनाएं बनी उनको कभी अमल में नहीं लाया जा सका। उन्नाव के औद्योगिक इकाइयों से आने वाला कचरा कानपुर के गंदगी के साथ मिलकर गंगा में निरंतर आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है।
 कानपुर सीमा से बांगरमऊ सफीपुर आदि अनेक कस्बों तथा उनसे संटे छोटे 34 गांव का सीवेज और गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है ।प्रयागराज में भी गंगा की स्थिति इससे अलग नहीं है प्रयागराज में 82 नाले हैं जिनमें से अब तक मात्र 42 नाले ही टेप हो सके हैं। बिना टेप  हुए 40 नालों का गंदा पानी वर्ष में मात्र 2 माह ही शोधित हो रहा, जबकि शेष 10 महीने प्रतिदिन इनका 13.8 करोड़ लीटर अपशिष्ट गंगा और यमुना में गिर रहा है ।राजापुर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की औसत क्षमता 5 करोड़ लीटर प्रतिदिन है लेकिन यहां रोजाना 8 करोड़ लीटर नाले का पानी आता है जो शोधित करके गंगा में छोड़ा जाता है। इसी एसटीपी के बगल में राजापुर का नाला बहता है, जिससे ढाई करोड़ लीटर प्रतिदिन गंदा पानी सीधे गंगा नदी में चला जाता है ।नगरीय क्षेत्र में 40 छोटे बड़े नाले ऐसे हैं जिसके पानी का शोधन साल में सिर्फ 60 दिन हो पाता है अन्य दिनों में गंगा-यमुना में बिना शोधित हुए ही पानी प्रवाहित होता रहता है। स्पष्ट है कि कागजों में भले ही उत्तर प्रदेश के कानपुर प्रयागराज आदि शहरों के नालों का गंदा पानी तथा उसका जहर गंगा में जाने सें
रोक दिया गया हो व्यवहार में वह अब भी निरंतर
 गंगा में अपना जहर युक्त गंदा पानी डाल रहे हैं। कमोबेश यह स्थिति गंगा के समग्र प्रवाह पथ की है ।उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल के गंगासागर तक गंगा में सफाई का कार्य एवं उसको प्रदूषण मुक्त किए जाने का का कार्य बमुश्किल कहीं दिखाई पड़ता है किंतु उसको प्रदूषण युक्त करने तथा उसमें जहर घोलने का कार्य करने वाले अनेकानेक गंदे नाले अपनी पूरी क्षमता के साथ  गंगा से मिलते हुए दिखाई पड़ते हैं।
वस्तुत: नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत गंगा या अन्य नदियों को प्रदूषण मुक्त करने में जितना योगदान उनमें गिरने वाले गंदे नालों को रोकने का है ,उससे बड़ा योगदान नदियों  के जल स्तर को बढ़ाने से हो सकता है ।यदि गंदे नालों को रोक दिया जाए और नदियों में बहने वाले जल के स्तर को बढ़ा दिया जाए तो इस समस्या का समाधान शीघ्र प्राप्त हो सकता है किंतु नदियों में निरंतर हो रही जल की कमी प्रदूषण स्तर को निरंतर बढ़ाता ही जाता है जिसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के साथ साथ सामान्य जनमानस को भी सोचने विचार करने की आवश्यकता है। जनमानस की सहभागिता के आधार पर ही किए गए कार्यों से नदियों की साफ सफाई हो सकती है तथा उनका जलस्तर बढ़ सकता है,किंतु अभी तक कहीं भी जनमानस का सहयोग दिखाई नहीं दे रहा ।परिणाम स्वरूप अपेक्षित परिणाम भी कही परिलक्षित नहीं हो रहा है ।दुनिया भर में नदियों को गतिशील बनाए रखने के लिए इसके तल से ड्रेजिंग व डेसिल्टिंग के माध्यम से उसकी गोद में विद्यमान गाद निकालने की निरंतर व्यवस्था की जाती है जिससे उनमें में जल संचयन और जल प्रवाह में गति उत्पन्न होती हैं , किंतु गंगा सहित भारत की अन्य समस्त नदियों में उनमें विद्यमान गाद की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। जल की निरंतर हो रही कमी से गति  के अभाव से वह अपने आप साफ नहीं हो रही वरन् उस में निरंतर वृद्धि हो रही है, जिससे नदियों के जल  प्रवाह की गति समाप्त हो रही है, वह मंथर गति से आगे बढ़ रही हैं। अपने जल प्रवाह की गति के लिए जानी जाने वाली गंगा का जल अपने गंतव्य की ओर अत्यंत मंथर गति से आगे बढ़ रहा है। इसे देखकर तय लगता है जैसे उसमें गति ही ना हो,बिना नदियों को गति दिए उनको हम बचा नहीं सकते। जल संवर्धन एवं जल संरक्षण ही नदियों के जलस्तर में वृद्धि कर उन्हें गति दे सकता है जो आम जनमानस के सहयोग से ही संभव है।