मनुष्य में संस्कार जितने अच्छे होगे, उतने ही उच्च कुल जन्म मिलेगा : योगेश मिश्र

 


लखनऊ। खुशहाल स्वास्थय सेवा संस्थान, जीवन ज्योति हास्य योग लाफिंग क्लब लखनऊ ने रविवार को "मानव जीवन में संस्कारों का महत्व" पर सांय 4 बजे से आठ बजे तक दयानन्द इंटर कालेज, सेक्टर 9 निक्ट अरविंदो पार्क, इंदिरा नगर, लखनऊ में एक वैचारिक चेतना अभियान संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया। जिसका शुभारम्भ पीठाधीश्वर, स्वामी डा. सौमित्र प्रपन्नाचार्य जी महराज, श्री बलरामदास महराज, महंत हनुमान गढ़ी, अयोध्या धाम, श्री बृजमोहन दास जी महराज, महंत श्री दशरथ गद्दी, अयोध्या धाम,  प. केसरी प्रसाद शुक्ल, आध्यात्मिक विचारक, और श्री योगेश मिश्र ज्योतिषाचार्य ने दीप जलाकर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता हास्ययोगी शिवाराम मिश्र, संयोजक हास्य योग लाफिंग क्लब कर रहे थे।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्वामी प्रपन्नाचार्य ने कहा कि संस्कार ही संसार की अमूलय निधि है। उन्होंने कहा कि आत्मा के साथ ही मन को पवित्र, शुद्ध और उन्नत करना ही संस्कार है। जीवन में 16 संस्कार उत्तम विधि से करने होते हैं। इन संस्कारों का प्रभाव शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा पर पड़ता है। मनुष्य जीवन को समुन्नत करना ही संस्कारों का मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन कोई सीधा-साधा मार्ग नहीं है। उसमें दु:खों और कठिनाइयों के मोड़ आते हैं। जीवन में नाना प्रकार के क्रोध, लोभ, मोह, सुख आदि आते हैं। उन्होंने कहा कि संस्कार मनुष्य और आत्मा दोनों से संबंधित हैं। इसलिए माता-पिता का नैतिक धर्म है कि वे बच्चों के प्रति अपने दायित्वों का अच्छी तरह से निर्वहन करें, जिससे संस्कारवान, परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण हो सके।


 अपने संबोधन में योगेश मिश्र ने कहा कि सनातन धर्म में कुल 40 संसकार पुरातन में पाये जाते थे, जो धीरे विलुप्त होकर अब 16 ही बचे है। मानव जीवन ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होता है। हमारे बार बार पृथ्वी पर आने की वजह हमारा संस्कार है। जिसके संस्कार जितने अच्छे होते है, उसको उतने ही उच्च कुल में जन्म मिलता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व है। संसार में किसी भी इंसान का आचार व व्यवहार देखकर ही उसके परिवार के संस्कारों का अनुमान लगाया जा सकता है।


उन्होंने संस्कारों के बारे में कहा कि हम कोरे कागज पर जैसा भी लिखना चाहें वैसा ही लिख सकते हैं। बच्चे का जीवन व मन भी कोरे कागज की भांति होता है। जब बच्चा छोटा होता है तभी से उसमें अच्छे संस्कार भरे जा सकते हैं। कपड़ों पर घी की चिकनाहट धोने के बाद भी पूरी तरह से नहीं उतरती। ठीक इसी तरह से व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का असर जल्दी से नहीं छूटता।


संस्कारो के महत्व पर प्रकाश डालते हुए केसरा प्रसाद शुक्ल ने कहा पृथ्वी पर मानव सर्व श्रेष्ठ प्राणि है इसलिए हमें संस्कार हीन नहीं होना चाहिए। क्योंकि  संस्कारहीन मानव की ईने वाली नस्लें कभी उत्थान नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि हमें अच्छा दिखने का स्वाभाव बनाना का चाहिए बुरा बनने का नहीं। उन्होंने कहा कि जिस राष्ट्र में नारी व गाय का अपमान होगा तो वह राष्ट्र कभी भी उन्नति नहीं कर सकता है।   


महंत बृजमोहन दास ने संस्कार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा सनातन धर्म में संस्कारों का विशेष महत्व है। इनका उद्देश्य शरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको बलवान करना है जिससे मनुष्य समाज में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। संस्कार का अर्थ होता है-परिमार्जन-शुद्धीकरण। हमारे कार्य-व्यवहार, आचरण के पीछे हमारे संस्कार ही तो होते हैं। ये संस्कार हमें समाज का पूर्ण सदस्य बनाते हैं। उन्होंने कहा कि हम अपने बच्चों को जैसा संस्कार देगें वैसा ही वह हमारे साथ व्यवहार करेगा। अगर हम अपने बच्चों में अमेरिका, इग्लैण्ड और रुस की संस्कृति डालेगे तो उसमें भरतीय संस्कार कहा से आएगी। इसलिए माता पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को ऐसा संस्कार दे जिससे वे समाज और राष्ट्र का पुन: निर्माण कर सके। उन्होंने कहा कि राम चरित्र मानास कोई नाचने गाने की चीज नहीं है बल्कि उसे जीवन में उतरकर समाज को लाभ दे।


बलराम दास जी महराज ने कहा कि वर्तमान समय में यह महसूस किया जा रहा है कि जैसे-जैसे शिक्षित नागरिकों का प्रतिशत बढ़ रहा है, वैसे-वैसे समाज में जीवन मूल्यों में गिरावट आ रही है। हमें मूल्यों के सौंदर्य का बोध होना चाहिए। विद्यार्थी जो देश का भविष्य हैं वे तनाव, अवसाद, बाहय आकर्षण और अनुशासनहीनता के शिकार हैं। इसका कारण पाश्चात्य संस्कृति, विद्यालय या समाज ही नहीं, बल्कि संस्कारों के प्रति हमारी उदासीनता है। परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है तो माता-पिता प्रथम शिक्षक। विद्यालय में हम देख रहे हैं कि जो माता-पिता अपने बच्चों में अच्छे संस्कार आरोपित करते हैं वे वाह्य वातावरण से प्रभावित हुए बिना शिक्षक द्वारा दी गई विद्या को फलीभूत करते हैं। अत: परिवार में प्रत्येक सदस्य का दायित्व है कि बच्चों में भौतिक संसाधनों के स्थान पर संस्कारों की सौगात दें।


कार्यक्रम के अन्त में शिवाराम मिश्र ने पीठाधीश्वर, स्वामी डा. सौमित्र प्रपन्नाचार्य जी महराज, श्री बलरामदास महराज, महंत हनुमान गढ़ी, अयोध्या धाम, श्री बृजमोहन दास जी महराज, महंत श्री दशरथ गद्दी, अयोध्या धाम,  प. केसरी प्रसाद शुक्ल, आध्यात्मिक विचारक, और श्री योगेश मिश्र ज्योतिषाचार्य, राम उजागिर मिश्र, ओमप्रकाश गिरी,अतुल अवस्थी, हरिनाथ और राधेश्याम दीक्षित का स्वागत साल और श्री हनुमान जी का चित्र भेट कर किया। कार्यक्रम का संचालन यूनाइट फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष राधेश्याम दीक्षित ने किया।  


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