हमेशा दोहराये जायेंगे प्रेमचंद के किस्से

नौएडा लोकमंच साहित्य प्रकल्प
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-राजेश बैरागी-
आख्यानों से लेकर आधुनिक कहानी तक हमारे समाज में किस्सागोई की सतत परंपरा रही है। दादी,नानी, बुआ और बड़ी बहन तक से कहानी सुनकर हमारा बचपन बीता है। बदले समय में चाहे यह परंपरा थोड़ी शिथिल हुई हो परंतु जहां प्रेमचंद के नाम की भी मौजूदगी है वहां कहानी अपनी पूरी जवानी के साथ मौजूद है और किसी की मजाल नहीं कि वह कहानी सुनने से मना कर सके।
     मुंशी प्रेमचंद की इसी धाक का अवलंब लेकर आज शाम नौएडा लोकमंच ने एनइए सभागार नौएडा में कहानियों की एक महफ़िल सजाई जिसमें छ: लोगों (इनमें चार महिलाएं थीं) ने यही है मेरा प्यारा वतन, परीक्षा, ठाकुर का कुआं व दो बैलों की जोड़ी सहित पांच कहानियां प्रस्तुत कीं।सबाना,ऊषा छाबड़ा व कपिल पांडेय ने जिस अंदाज में कहानियां प्रस्तुत की वह याद रह जाने वाला था। हालांकि शांतनु मुखर्जी ने थोड़ा निराश किया। इस मौके पर प्रेमचंद के परिजनों की उपस्थिति ने भी साहित्यिक रसिकों को आनंद प्रदान किया।