भारत के राष्ट्रपति ने केवड़िया, गुजरात में 80वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन का शुभारंभ किया

 


 “वाद को विवाद न बनने देने के लिए संवाद का माध्यम ही सबसे अच्छा माध्यम होता है” : भारत के राष्ट्रपति .


.... ”लोकतन्त्र के मंदिर के अभिरक्षक होने के नाते पीठासीन अधिकारियों का यह दायित्व है कि वे विधानमंडलों में शिष्टाचार, गरिमा और शालीनता सुनिश्चित करें” : उप राष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति .


... “हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान से ही अपनी शक्तियां प्राप्त करती हैं क्योंकि संविधान विधानमंडलों को जन भावनाओं के अनुरूप काम करने का आधार प्रदान करता है” : लोक सभा अध्यक्ष ...


.. ”गुजरातियों का भारत के लोकतन्त्र में अमूल्य योगदान रहा है जिस पर राज्य के लोगों को बहुत गर्व है” : गुजरात के मुख्य मंत्री ...


केवड़िया: भारत के राष्ट्रपति, रामनाथ कोविंद ने आज केवड़िया, गुजरात में 80वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन का शुभारंभ किया । भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति,  एम वेंकैया नायडू; गुजरात के राज्यपाल,  आचार्य देवव्रत; लोकसभा अध्यक्ष,  ओम बिरला; गुजरात के मुख्यमंत्री,  रुपाणी; केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री,  प्रहलादजोशी; केंद्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री,  अर्जुनराम मेघवाल; वरिष्ठ कांग्रेस नेता,  अधीर रंजन चौधरी और अन्य विशिष्टजन भी उद्घाटन समारोह में शामिल हुए । सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए, भारत के राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में आम जन मानस की आशाओं, आकांक्षाओं और जागरूकता में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है । इसलिए पूरे देश में विधानमंडलों की भूमिका व जिम्मे दारियां और भी बढ़ गई हैं। उन्होने कहा कि जन-प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे, लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति सदैव निष्ठा वान रहें।


उन्होने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाैओं और जन-प्रतिनिधियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती, जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की है। श्री कोविन्द ने यह कहा कि देश की जनता, अपने नेताओं से, संसदीय परम्पराओं और मर्यादाओं के पालन की अपेक्षा करती है। इसलिए, कभी-कभी जब जन-प्रतिनिधियों द्वारा संसद या विधान सभा में, अमर्यादित भाषा का प्रयोग या अमर्यादित आचरण किया जाता है, तो जनता को बहुत पीड़ा होती है। इसलिए जन-कल्याण और देश के व्याधपक हित में, जन प्रतिनिधियों को सामंजस्य़ और समन्वरय का मार्ग अपनाना चाहिए। उन्होने इस बात पर ज़ोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यंवस्थाऔ में, ‘वाद’ को ‘विवाद’ न बनने देने के लिए ‘संवाद’ का माध्य म ही, सबसे अच्छाभ माध्य म होता है। यह विचार व्यक्त करते हुए कि संसदीय लोकतंत्र में, सत्ता पक्ष के साथ-साथ प्रतिपक्ष की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, राष्ट्रपति  ने कहा कि इन दोनों में सामंजस्य , सहयोग एवं सार्थक विचार-विमर्श आवश्यक है। इस संबंध में पीठासीन अधिकारियों का यह दायित्वय है कि वे, सदन में, जन-प्रतिनिधियों को स्विस्थ बहस के लिए, उपयुक्त वातावरण उपलब्धक कराएं और शिष्ट संवाद तथा चर्चा को प्रोत्सानहित करें। उन्होने यह भी कहा कि अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि होने के नाते, पीठासीन अधिकारी की जवाबदेही, क्षेत्र की जनता के प्रति भी होती है। सदन के अध्य क्ष का आसन, उनकी गरिमा और दायित्वह - दोनों का प्रतीक होता है, जहां बैठकर वह, पूरी निष्प क्षता और न्यादय-भावना से कार्य करते हैं। उन्होने इस बात पर ज़ोर दिया कि अध्य,क्षीय पीठ - निष्पनक्षता, समद र्शिता और न्याेयप्रियता का आसन है और सभी पीठासीन अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि उनका व्यवहार भी, इन्हीं आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए। उदघाटन समारोह में विशिष्टजनों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति, श्री एम वेंकैया नायडू ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य के तीनों अंगों में से किसी एक का दर्जा दूसरे से अधिक नहीं है क्योंकि संविधान का दर्जा सबसे ऊपर है । इस संबंध में श्री नायडू ने ऐसे न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया जिन्हें न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर माना गया है ।


उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को अपने-अपने क्षेत्र में रहकर ही कार्य करना चाहिए जिससे न केवल परस्पर सद्भाव बना रहेगा बल्कि देश की प्रगति भी सुनिश्चित होगी । इसके लिए परस्पर सम्मान और अपनी जिम्मेदारी को समझने की आवश्यकता है । श्री नायडू ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विधानमंडलों के महत्व को देखते हुए पीठासीन अधिकारी संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र के मंदिर के अभिरक्षक होने के नाते पीठासीन अधिकारियों का यह दायित्व है कि वे विधानमंडलों में शिष्टाचार, गरिमा और शालीनता सुनिश्चित करें।


सदस्यों को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष,ओम बिरला ने गुजरात की भूमि के प्रति आदर भाव व्यक्त करते हुए कहा कि यह राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी और भारत के लौह पुरुष, सरदार पटेल की जन्म स्थली है । उन्होंने यह भी कहा कि केवड़िया में स्टैचू ऑफ यूनिटी के पास आयोजित किए जा रहे 80वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन से संसदीय संस्थाओं को सुदृढ़ करने में बहुत मदद मिलेगी । श्री बिरला ने यह भी कहा कि विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते विधिनिर्माताओं को अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने के लिए सतत प्रयास करने चाहिए। श्री बिरला ने कहा कि जनप्रतिनिधि होने के नाते विधिनिर्माता लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को मुखरित करते हैं । उन्होंने यह भी कहा कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान से अपनी शक्तियां प्राप्त करती हैं क्योंकि संविधान ही विधानमंडलों को जन भावनाओं के अनुरूप काम करने का आधार प्रदान करता है।।


श्री बिरला ने यह भी कहा कि विधायकों को संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए सदैव जनकल्याण के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। श्री बिरला ने सभी विधायकों से यह अपील की कि वे नई ऊर्जा के साथ राष्ट्र के नवर्निर्माण का संकल्प लें। छोटा प्रयास भी लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है । भारतीय लोकतंत्र की इस यात्रा में संस्थाओं में मतांतर हो सकता है परंतु संवैधानिक उपबंधों और लोकतांत्रिक प्रणाली की सीमाओं के भीतर रहकर प्रक्रियाओं में सुधार करके इसका समाधान भी निकाला जा सकता है। इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री विजय रुपाणी ने कहा कि भारत में लोकतंत्र और देश के विकास में गुजरात हमेशा अग्रणी रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि गुजरातियों ने भारतीय लोकतंत्र में अमूल्य योगदान दिया है जिस पर राज्य के लोगों को बहुत गर्व है । उन्होंने यह भी कहा कि महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जीवी मावलंकर से लेकर प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी तक पीढ़ी दर पीढ़ी अनेक नेताओं ने निस्वार्थ भाव से देश की सेवा की है । श्री रूपाणी ने इस बात का भी उल्लेख किया कि महात्मा गांधी और सरदार पटेल के नेतृत्व में भारत ने आजादी की लड़ाई लड़ी और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरदार पटेल ने भारत की संप्रभुता और अखंडता को सुदृढ़ किया। विशिष्टजनों को संबोधित करते हुए लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहां कि सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी प्रतिमा केवड़िया की इस पावन भूमि पर है,ने देश को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।


उन्होंने कहा कि गुजरात महात्मा गांधी की जन्मस्थली भी है जिनके विचारों से आज भी हमें प्रेरणा मिलती है । उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने राजनीतिक और सामाजिक समानता दोनों पहलुओं पर जोर दिया गया था जिसे हमारे संविधान में आत्मसात किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारा संविधान उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों की अमूल्य भेंट है जिन्होंने दिन-रात एक करते हुए इस वृहद और शानदार दस्तावेज को तैयार किया। श्री चौधरी ने इस बात पर जोर दिया कि बहुलता हमारी संस्कृति की मुख्य विशेषता है जिसमें मतभिन्नता और असहमति का स्थानहै । हमारे देश में तर्क-वितर्क की परंपरा रही है, इसलिए हमें सार्वजनिक जीवन में भी वाद-विवाद, वार्ता और असहमति को स्थान देना चाहिए ।


इस सम्मेलन के आयोजन के लिए लोक सभा अध्यक्ष की सराहना करते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री,  प्रहलाद जोशी ने कहा कि आज भारत सशक्त और संयुक्त है क्योंकि सरदार पटेल ने हमें एकता के सूत्र में बांधा । उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि संविधान दिवस मनाने की शुरुआत गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी ने की थी और आज उनके प्रेरणादायी नेतृत्व में एक राष्ट्रीय समारोह बन गया है। श्री जोशी ने कहा कि भारत में प्राचीन काल से ही लोकतांत्रिक व्यवस्था रही है ।


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