क्यों नहीं संसद में चीन पर चर्चा ?

भारत और चीन के बीच विद्यमान तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। युद्ध न चाहते हुए भी भारत और चीन दोनों देशों की सेनाएं एल ए सी के पास अपना अपना पक्ष मजबूत बताते हुए बड़ी मुस्तैदी के साथ आमने सामने खड़ी है। तनाव चरम पर है, दोनों देश एवं उनकी सेनाएं किसी भी स्थिति में युद्ध नहीं चाहती , किंतु अपने आचरण एवं व्यवहार से ऐसा चित्र प्रस्तुत कर रही हैं , मानो वह युद्ध के लिए तत्पर हैं। बाहर से देखने पर यद्यपि युद्ध की स्थिति बनी हुई है, किंतु युद्ध की विभीषिका एवं उसके परिणामों की कल्पना करके ही दोनों देशों के कूटनीतिज्ञ अपने स्तर से कूटनीतिक प्रयास कर युद्ध की संभावना को समाप्त करने एवं दोनों देशों के मध्य विद्यमान समस्याओं के समाधान खोजने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों या किसी भी प्रकार की समस्या को पारदर्शी ढंग से सबके समक्ष रखने एवं उससे जन-जन को अवगत कराने का पक्षधर चीन कभी नहीं रहा। बड़ी-बड़ी समस्याओं के संदर्भ में भी चीन सदैव मौन बना रहता है ,वह देश के समक्ष कोई भी तथ्य सामने नहीं रखता। जबकि इसके विपरीत भारत में हर समस्या की तह तक जाने के लिए हर व्यक्ति प्रयासरत रहता है। भारत में लोकतंत्र होने के कारण शासन व्यवस्था एवं रीति नीति में पारदर्शिता बनाए रखना तथा देश की हर समस्या तथा रीति नीति से जन-जन को अवगत कराना लोकतंत्र मैं सरकार का दायित्व है, इस को भली-भांति निभाते हुए लगभग हर लोकतंत्रात्मक देश के साथ भारत में भी देश की नीतियों तथा समस्याओं से वहां की जनता को पारदर्शी ढंग से अवगत कराया जाता है, किन्तु इसके विपरीत चीन , पाकिस्तान आदि जैसे देशों में कम्युनिस्ट, तानाशाही एवं फौजी शासन व्यवस्था में प्रायः पारदर्शिता का अभाव रहता है । इस समय चीन एवं भारत के मध्य विद्यमान तनाव एवं समस्याओं को लेकर भारत में जहां एक ओर सरकार पर्याप्त गोपनीयता बरत रही है, वहीं दूसरी ओर उक्त प्रकरण में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेश संसद में चर्चा कराए जाने की मांग कर रहा है, जिसको स्वीकार न कर सरकार संसद में चर्चा कराने के पक्ष में नहीं है। यहां यह प्रश्न उठता है कि आखिर सरकार सीमा पर चीन की उपस्थिति को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों बरत रही है और उस पर संसद में चर्चा कराने के लिए क्यों तैयार नहीं है?


 यूं तो किसी भी मुद्दे पर सदन में चर्चा कराने की मांग करना विपक्षी दलों का अधिकार और उस पर चर्चा कराना सरकार का दायित्व है, किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर ,जहां प्रतिद्वंदी चीन जैसा कूटनीतिज्ञ और धूर्त तथा धोखेबाज हो , वहां पग पग में सावधानी बरतना अति आवश्यक हो जाता है, जिसके कारण अपनी रीति नीति एवं प्रयासों में गोपनीयता बनाए रखने हेतु सरकार सदन में चर्चा के लिए तैयार नहीं है, किंतु विपक्ष की मांग को देखते हुए उसके द्वारा समस्त राजनीतिक दलों से अलग-अलग मिलकर उन्हें समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस बिंदु पर राष्ट्रीय सुरक्षा एवं हित में सदन में चर्चा कराना उचित नहीं है। प्रायः सभी राजनीतिक दल सरकार के मत से सहमत भी हो रहे हैं किंतु प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की मांग आक्रामकता के साथ निरंतर बढ़ रही है। शिवसेना ने भले ही संसद के बाहर इस मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध बयान दिया है मगर संसद में इसकी भूमिका आक्रामक नहीं है। सपा, बसपा , वाईएसआर कांग्रेस ,टीआरएस ,बीजेडी जैसे दलों ने न तो आक्रामक रुख अख्तियार किया है और न ही इस पर चर्चा की मांग ही की है। वस्तुतः राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सैन्य प्रशासन तथा उसकी गतिविधियों से संबंधित प्रकरण पूर्ण गोपनीयता की अपेक्षा रखते हैं, गोपनीय बने रहने पर ही वह विपक्षी देश के लिए चुनौती बन पाते हैं अन्यथा स्थिति में शत्रु देश किसी भी सेना की योजनाओं एवं तैयारियों को जानकर उसके मंसूबे पर पानी फेर सकता है। प्राय: हर देश अपने शत्रु सेनाओं की गतिविधियों ,क्षमताओं एवं योजनाओं की जानकारी अपने गुप्तचरो ,जासूसों के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करते हैं तथा जानकारी प्राप्त होने पर अपने प्रतिद्वंदी सेना की योजनाओं को धूलि धूसरित कर देते हैं। देश की जनता तथा सभी विपक्षी दल इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं । इसलिए प्रकरण में संसद में चर्चा कराने के लिए कहीं से भी जोरदार मांग नहीं उठ रही है। वर्ष 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में कम्युनिस्टों द्वारा की गई चीन की पक्षधरता की भांति इस समय कांग्रेस चीन का मुखर पक्षधर बनकर सरकार की प्रबल


आलोचना करते हुए सैन्य गतिविधियों एवं सीमा पर विद्यमान स्थिति पर चर्चा कराने के लिए कटिबद्ध प्रतीत हो रही है, किंतु जितनी प्रबलता के साथ वह संसद में उसकी चर्चा पर जोर दे रही है, उतने ही दमदार तरीके से सरकार सीमा पर सेना की गतिविधियों एवं योजनाओं पर चर्चा कराने से हटकर सभी दलों से व्यक्तिगत स्तर पर मिलकर स्थिति की जानकारी देने की पक्षधर है, सरकार की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में सीमा एवं चीन की स्थिति को लेकर सामान्य जानकारी प्रस्तुत करते हुए राष्ट्र की सुरक्षा हेतु अपनी प्रतिबद्धता को जोरदार ढंग से रखा जिससे कांग्रेस सहित समस्त राजनीतिक दल सरकार के साथ खड़े नजर आए। राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ गोपनीयता बनाए रखने के कारण सरकार एवं सेना की गतिविधियों एवं योजनाओं की जानकारी खुल कर सामने न आ सकी , जिसके चलते आज सरकार की योजनाएं एवं कूटनीति चीन को लेकर सफल नजर आ रही हैं। आज पहली बार चीन भारत को धमकाने के स्थान पर मिमिया रहा है, जिसका कारण भारतीय सेना द्वारा अपनी योजनाओं को प्रकट न होने देकर बड़ी प्रतिबद्धता के साथ सीमा पर विद्यमान ऊंची ऊंची चोटियों पर राष्ट्र रक्षा हेतु कब्जा जमा कर बैठ जाना ही प्रमुख कारण है। यदि किसी माध्यम से सरकार तथा सेना की इस योजना की जानकारी चीन तक पहुंच गई होती तो निश्चित रूप से ब्लैक टॉप, मगर हिल ,गुरुंग हिल , रेचेनला, रेजांगला, मुख परी और फिंगर 4 इसके नजदीक स्थित 


अनेक फिंगर चोटियों पर कब्जा जमाना उसके लिए असंभव हो जाता और चीन उस क्षेत्र में बढ़त बनाए रखते हुए पूर्व की भांति भारत को धमका रहा होता किंतु पूर्ण गोपनीयता एवं प्रतिबद्धता के साथ सेना द्वारा की गई कार्यवाही ही भारत को बढ़त दिलाने मैं सफल हुई है। ऊंची चोटियों में कब्जे से चीनी सैनिकों की हर गतिविधि का पता लगाने में भारतीय सेना को मदद मिलेगी इससे चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी बौखलाई हुई है, और इस परिस्थिति में उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। उल्लेखनीय है यह चोटिया खाली पड़ी हुई थी और इन पर चीनी सेना की नजर भी थी लेकिन उनके कब्जा करने से पहले ही भारतीय सेना ने इन पर अपना आधिपत्य जमा लिया । इससे सेना को लद्दाख के इस दुर्गम इलाके में चीन पर बढत मिल गई। भारतीय सेना ने जिन चोटियों पर कब्जा जमाया है, वह समस्त चोटियां भारतीय सीमा के अंतर्गत ही आती हैं, किंतु इन चोटि कीयों पर कब्जा जमाने हेतु चीन हरदम प्रयासरत था ।उसने कभी सोचा नहीं था कि इन दुर्गम पहाड़ियों पर भारतीय सेना पहुंचकर कब्जा जमा लेगी। भारतीय सेना द्वारा जिन पहाड़ियों पर कब्जा जमा कर चीन पर महत्वपूर्ण बढ़त बना ली गई है, जिससे चीन अत्यंत चिंतित एवं परेशान है । परिणाम स्वरूप अब चीन युद्ध की बात न कर , समस्या के समाधान के लिए बार-बार बातचीत का अनुरोध कर रहा है, किंतु चीन के साथ पूर्व के जुड़े कड़वे अनुभव तथा उसके दोहरे चरित्र को देखते हुए उस पर विश्वास कर भारतीय सेना किसी भी स्थिति में पर्वत शिखरों से नीचे उतरने के लिए तैयार नहीं है। भारत सरकार का उसे पूर्ण समर्थन प्राप्त है।


 


जहां तक सीमा पर विद्यमान स्थिति को लेकर संसद में चर्चा का प्रश्न है वर्तमान स्थिति में राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सैन्य योजनाओं पर खुलकर कहीं भी कचर्चा नहीं की जा सकती । गोपनीयता बनाए रखते हुए उन पर अमल कर अपने आप को मजबूत बनाए रखना आज की मुख्य आवश्यकता है, जिसके बल पर बिना युद्ध किए कूटनीतिक स्तर पर वार्ता कर समस्या का समाधान करते हुए चीन को झुकाया जा सकता है। हमें यह बात सदैव याद रखनी होगी की 1962 मैं चीनी हिंदी भाई भाई के गूंजते हुए नारे के मध्य चीन ने हम पर युद्ध थोपकर तत्कालीन हमारी कमजोरी तथा अपनी विस्तारवादी नीति के बल पर अक्साई चीन की लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर भूमि हथिया ली थी ,जो आज भी उसके कब्जे में है, जिसे वापस पाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।जिसको लेकर संसद में हुई चर्चा मैं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में कहा था कि उस अक्साई चीन में घास का एक तिनका भी नहीं होता , उसके लिए इतना हाय तोबा क्यों ।इस पर उनके मंत्रिमंडल के ही सदस्य श्री महावीर त्यागी तत्काल उठकर खड़े हुए थे और अपनी टोपी उतारते हुए नेहरू से कहा था मेरे सर में भी एक भी बाल नहीं उगता इसलिए इसे भी कटवा दें या चीन को दे दे , जिसे सुनकर नेहरू निरुत्तर हो गए थे। श्री महावीर त्यागी द्वारा नेहरु के मंत्रिमंडल में रहते हुए उनका इस प्रकार का तीखा विरोध करना भारतीय लोकतंत्रत्मक व्यवस्था की प्रथम एवं अंतिम नजीर है ।आज तक कोई भी मंत्री इतने मुखर रूप में अपने प्रधानमंत्री की किसी भी योजना कथन का विरोध नहीं कर सका । जहां तक पारदर्शिता का का प्रश्न है कोई भी देश, चाहे वहां की व्यवस्था कितनी ही पारदर्शी हो ,राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर पर्याप्त गोपनीयता बनाए रखता है, जिससे सेना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी कोई तथ्य जानकारी खुलकर सामने नहीं आ पाती है।


‌आज आवश्यकता है राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सेना की आवश्यकताओं की हर प्रकार की पूर्ति कर उसकी शक्ति तथा गतिविधियों को मजबूती प्रदान करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सीमा को सुनिश्चित करने की, जिस का आकलन कर कोई भी देश हमारी सीमा एवं सेना की ओर आंख उठा कर देखने का साहस न कर सके। सरकार की कार्यप्रणाली एवं सेना को हर प्रकार से सक्षम बनाने की उसकी रणनीति इस दिशा में सार्थक प्रयास है , जिसे देखते हुए प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार के दिशा निर्देशन में हमारी सेना के हाथों में राष्ट्र की सीमाएं पूर्ण सुरक्षित हैं, जिन्हें निरंतर सुरक्षित बनाए रखने के लिए अत्यंत गोपनीयता पूर्वक समय-समय पर सैन्य योजनाएं बनाने की आवश्यकता है, जिन पर संसद से सड़क तक कहीं भी चर्चा नहीं की जा सकती और न की ही जानी चाहिए।