'समंदर की अगर सहरा से यारो दोस्ती होती'

 


ग़ज़ल


समंदर की अगर सहरा से यारो दोस्ती होती
ज़माने में कोई तो बात आख़िर फिर नई होती


बुरा जो वक़्त आया है न आता वक़्त से पहले
कभी तुमने भले मानुष ज़ुबाँ अपनी जो सी होती


यही मैं सोचता हूँ खो के तुमको ए मेरे हमदम
अगर तुम साथ होते तो हसीं ये ज़िंदगी होती


तुम्हे बिन माँगे ही सब कुछ जहां से मिल गया होता
तुम्हारे लहज़े में थोड़ी सी भी गर सादगी होती
      


 


जन्म तिथि:23/5/1983
       शिक्षा:स्नातक
        सम्प्रति:संगीत अध्यापक
        उपलब्धियां:विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
सम्पर्क सूत्र: 103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी, हाँसी
ज़िला हिसार(हरियाणा)


 


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