राज्य सभा चुनाव को लेकर कांग्रेस में हाईप्रोफाइल ड्रामा

पायलट के सहारे भाजपा की सत्ता हथियाने की थी कोशिश

जयपुर/नई दिल्ली। राजस्थान में राज्यसभा 3 सीटों के लिए होने वाले चुनाव को लेकर कांग्रेस में चल रहे हाईप्रोफाइल ड्रामे का फिलहाल पटाक्षेप लग रहा है, कांग्रेस ने अपने सभी विधायकों, समर्थक पार्टियों के और निर्दलीय विधायको कि बाड़ा बंदी कर ली है लेकिन इस सब में भाजपा द्वारा उपमुख्यमंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट  के सहारे  सत्ता हथियाने की कोशिश का भांडा फूट गया है वहीं यह भी साफ हो गया है कि भाजपा और सचिन पायलट मिलजुल कर सारा खेल खेल रहे थे । अब देखना यह है कि कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को सर माथे पर ही बैठा कर रखेगा या उन्हें पार्टी में साइड लाइन किया जाएगा।
जैसा की विदीत है कि सचिन पायलट विधानसभा चुनाव से पूर्व ही अपने को  मुख्यमंत्री घोषित कर चुके थे लेकिन चुनाव होने के बाद विधायकों की मंशा के अनुरूप अशोक गहलोत को तीसरी बार राजस्थान की कुर्सी मिल गई तब भी सचिन पायलट ने एक पखवाड़े तक जयपुर से दिल्ली तक हाईप्रोफाइल ड्रामा किया था लेकिन उनकी नहीं चली बाद में समझौते के बतौर उन्हें उप मुख्यमंत्री पद से नवाजा गया, पार्टी के अध्यक्ष का पद उन्हें छोड़ना था लेकिन उनकी जगह कोई नियुक्ति नहीं हो पाई इसलिए इस पद पर भी वे तब से अब तक बने रहे, मंत्रिमंडल गठन में भी उनकी पूरी चली और बाद में भी दिख रही है लेकिन उसके उपरांत भी उनके मन में मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की टीस बनी रही जो समय समय पर उनके भाषण और बर्ताव से सार्वजनिक होती रही

मनमुटाव से नियुक्तियां टली, लोकसभा चुनाव भी हारे।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की लड़ाई के चलते प्रदेश में डेढ़ साल उपरांत भी राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो पाई, वही प्रदेश अध्यक्ष का मामला भी लटका हुआ है लोकसभा चुनाव में भी सचिन पायलट और उनकी टीम पर कांग्रेस प्रत्याशियों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा था बाद में खींवसर उपचुनाव में भी जहां पार्टी मामूली अंतर से हारी थी वहां भी पायलट और उनके सहयोगियो पर कांग्रेस प्रत्याशी को आरोप लगा और दिल्ली तक शिकायत हुई लेकिन दिल्ली की ओर से कभी इन बातों पर ज्यादा गौर नहीं किया गया ।

मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान की रणनीति बन गई थी

 मध्य प्रदेश में सरकार गिराने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी छोड़ते समय सचिन से ही गहरी मंत्रणा की थी तब भी यह आरोप लगा था कि राजस्थान में सरकार गिराने का भी साथ ही साथ प्लान बना दिया गया है, बाद में पायलट की भाजपा के कई नेताओं से मुलाकात होती रही, सिंधिया को पार्टी में लाने में महत्वपूर्ण रोल निभाने वाले भाजपा नेता जफर इस्माइल  की भी सचिन से लगातार मुलाकात होती रही जो मीडिया में भी आई, जानकार सूत्रों के अनुसार पायलट एक से अधिक बार अपने सभी स्टाफ और सिक्योरिटी को छोड़ अपने ओएसडी और रिश्तेदार निरंजन के साथ गुपचुप दिल्ली यात्रा करके आए, इसी यात्रा में उन्होंने भाजपा नेताओं से भी नज़दीकियां बढ़ाई थी,

भाजपा ने दूसरा प्रत्याशी सहमति से उतारा

भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में अपना दूसरा प्रत्याशी इनकी सहमति से ही उतरा था ऐसा जानकार सूत्रों का कहना है भाजपा के पास प्रथम प्रत्याशी को जिताने के लिए 51 प्रथम वरीयता मत के बाद 24 मत बचते थे, दूसरे प्रत्याशी के लिए उसे कम से कम 26 वोट और चाहिए थे, कांग्रेस नेता ने भरोसा दिलाया था कि सारा इंतजाम कर लिया जाएगा भाजपा ने इसी विश्वास के सारा खेल खेल लिया।


पार्टी ने मांग लिया था इस्तीफा

 एक माह पूर्व पार्टी आलाकमान ने पायलट को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कह दिया था जानकार सूत्रों के अनुसार तब पायलट ने  महामंत्री संगठन  को स्पष्ट कहा कि वे इस्तीफा राहुल गांधी को दे देंगे इस तरह वे इस्तीफा देने से बच गए, 15 दिन बाद जब राहुल गांधी से उनकी मुलाकात हुई तब तक राज्यसभा के चुनाव की  मतदान की तारीख आ चुकी थी इसलिए पार्टी ने इस मामले को ठंडा कर के ही रखना उचित समझा।
दूसरी और पायलट भी समझ गए थे कि अब उन्हें कुछ कारगर कदम उठाना ही होगा

पहले गड़बड़ी लॉकडाउन से टली

इससे पहले राज्यसभा चुनाव स्थगित होने से पूर्व 26 मार्च को निर्धारित तिथि से  पूर्व भी पार्टी में गड़बड़ी कराने की एक बड़ी साजिश थी जिसे मुख्यमंत्री ने समय रहते नाकाम कर दिया, फिर चुनाव स्थगित होने से भी मामला टल गया , लेकिन अब दोबारा चुनाव की तिथि आने पर पायलट और उनके नजदीकी सक्रिय हो गए।
जानकार सूत्रों के अनुसार और पायलट के बीच कुछ राजनीतिक सहमति बन चुकी थी जिसके तहत उन्होंने अपने कुछ सहयोगी विधायक, मंत्री लाने का वादा किया कुछ विधायक भाजपा को अपने स्तर पर कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों में से जुटाने थे, दरअसल भाजपा की रुचि राज्यसभा की सीट जीतने में कम और सत्ता हासिल करने में ज्यादा थी और है, बातचीत होने के बाद ही भाजपा ने सचिन के ससुर फारूक अब्दुल्ला और साले उमर अब्दुल्ला को कश्मीर में रिहा किया था जबकि वहां कई नेता अभी भी नजरबंद हैं


गहलोत के एक्शन से गड़बड़ाई गणित

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस समूचे मामले की भनक मिलते ही राजनीतिक कदम उठा लिए और तोड़फोड़ की कार्यवाही को नाकाम कर दिया। संदिग्ध विधायकों की सूची मिलते ही गहलोत ने उनसे संपर्क साधना शुरू कर दिया एक-एक कर विधायक सचिन से दूर होते गए कुछ विधायक संख्या घटती देख भी अलग हो गए।

गुर्जर मतदाता वाले विधायकों को दी प्राथमिकता

पायलट ने अपने साथ जुड़ने के लिए गुर्जर मतदाता वाले विधायकों को प्राथमिकता दी उन्हें समझाया गया कि गुर्जर वोट,उनके अपने वोट तथा भाजपा के वोट से वे पुनः जीत जाएंगे और राज का आनंद ले पाएंगे, बड़ी रकम और  जीत की गणित में यह  विधायक अपना ईमान खो बैठे। इनमें चार मंत्री भी शामिल थे उन्हें पैसा, भाजपा टिकट और जीतने के बाद बढ़िया विभाग का मंत्री बनाने का वादा किया गया था।

पायलट ने बदले सूर और रणनीति

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राजनीतिक कदम उठाने और विधायकों की बाड़ा बंदी के बाद सचिन पायलट को लग गया कि मामला गड़बड़ हो गया है इसलिए उन्होंने अपनी भी रणनीति बदलते हुए पार्टी की एकता और जीत के दावे करते हुए बीजेपी को लांछन करना प्रारंभ कर दिया, जयपुर पहुंचे पार्टी के प्रभारी और सह प्रभारी पदाधिकारियों के सामने जताया जाने लगा कि विधायकों में असंतोष है मेरा कुछ लेना देना नहीं है इसके बाद प्रभारी महामंत्री और सचिवों ने एक-एक विधायक से बातचीत करनी प्रारंभ कर दी, पर ऐसा कुछ नजर नहीं आया।


मानेसर  ले जाने की थी योजना

एक टीवी चैनल ने तो दावा कर डाला है कि सचिन पायलट अपने कुछ विधायकों को लेकर राजस्थान से बाहर निकलने वाले थे उसके लिए मानेसर में होटल बगैरा बुक करा ली गई थी लेकिन विधायकों की पर्याप्त संख्या नहीं देख कुछ विधायक और भाग खड़े हुए, भाजपा भी पर्याप्त संख्या बल के बिना अपना खेल नहीं खोलना चाह रही थी क्योंकि उसे डर था कि मामला अभी खुल गया तो बाद में वह कुछ नहीं कर पाएगी। इसलिए उसने राज्यसभा चुनाव के बाद ही खेल खेलने का निश्चय किया।
जानकार सूत्रों के अनुसार पायलट ने भाजपा को डेढ़ दर्जन विधायक लाने का वादा किया था जबकि कुछ  निर्दलीय और अन्य विधायक भाजपा ने अपने स्तर पर जुटाने की बात कही थी।

क्रॉस वोटिंग पर विधायकों को बड़ा पैकेज

बाजार में यह चर्चा गर्म है कि इन विधायकों को क्रॉस वोटिंग  कर पार्टी छोड़ने की एवज में उन्हें  चुनावी टिकट तथा 25 से 30 करोड़ की राशि देने का तय किया गया था, कुछ को चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनाने का वादा भी किया गया, सूत्रों के अनुसार कुछ विधायकों ने एडवांस पेमेंट भी ले लिया था इनमें कुछ निर्दलीय विधायक भी शामिल हैं, यह सारा लेन देन पायलट की जानकारी में ही हुआ,जानकार सूत्र बताते हैं कि पायलट के सिविल लाइंस स्थित बंगले से सभी स्टाफ को 6 दिन के लिए छुट्टी पर भेज दिया गया था ताकि आने जाने वालों कि किसी को भनक नहीं प ड सके इसी दौरान कई तरह की गतिविधियां हुई

भाजपा सांसद के पास पहुंची रकम

 जानकारी के अनुसार विधायकों को दी जाने वाली भारी रकम जयपुर के एक सांसद के पास पहुंची थी चर्चा है कि यह रकम दिल्ली से एक बड़ा अधिकारी बैंक की वैन में लेकर आया था पुलिस में भनक लग जाने के कारण पैसा अन्य स्थान पर उतारा गया।
 
पायलट को मिलता बड़ा पद

कांग्रेस की सरकार गिराने और अपने साथ बड़ी संख्या में विधायक ले जाने के बाद पायलट को केंद्र में बड़े मंत्री पद का ऑफर था, उनकी इच्छा राजस्थान के सीएम बनने की थी वे चाहते थे कि पुनः चुनाव लड़कर वे विधायक बने और भाजपा सीएम बना दे परंतु भाजपा ने साफ इंकार कर दिया,
अपने साथ आने वाले डेढ़ दर्जन विधायकों को मंत्री पद देने के वादे के बाद उन्होंने सीएम वाली जिद छोड़ दी,वे किसी भी कीमत पर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद पर नहीं देखना चाहते थे सरकार तोड़ने और भाजपा से नाता जोड़ने से उनकी यह मुराद पूरी हो रही थी वहीं कांग्रेस आलाकमान को भी वे मुख्यमंत्री बनाने का वादा पूरा नहीं करने का सबक देना चाह रहे थे।

पोल खुलने से बगावती बेक

पार्टी छोड़ने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं जुट पाने के कारण एक बार पायलट ने आलाकमान पर दबाव की रणनीति भी बना ली लेकिन मुख्यमंत्री द्वारा संपूर्ण  मामले की एटीएस
और एसओजी से जांच के बाद उनके खेमे में हड़कंप मच गया तथा यह बात साफ हो गई कि भाजपा के सारे खेल के सूत्रधार कोन थे, पायलट ने इसके बाद चुप्पी साध ली और उनके अधिकांश समर्थक भी तितर बितर दिख रहे हैं तथा आलाकमान पर सत्ता परिवर्तन के लिए दबाव बनाने की उनकी योजना भी तार-तार हो गई है।