*राजनीतिक साजिश से बन रही हैं संतों की हत्या की श्रृखंला* 







*राष्ट्र-चिंतन* 

 

संतोंं की हत्या के पीछे है इस्लाम और ईसाईत की करतूत* 

 

ब नांदेड में संत और उनके सेवादार की लोमहर्षक हत्या। पालघर से लेकर नांदेड तक जारी हत्या की श्रृंखलाओं में कई संत अपनी जान गंवा चुके हैं। पंजाब में भी संत योगेश्वर की लोमहर्षक हत्या हुई, होशियार पुर में संत पुष्पिदंर महाराज पर जानलेवा हमला हुआ, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में दो साधुओं की हत्या हुई। निहत्थे संतों की हत्या की घटनाएं रूक क्यों नहीं रही हैं?केन्द्रीय और राज्य सरकारें निहत्थे संतों की हत्या रोकने के लिए गंभीर क्यों नहीं हैं? क्या यह सिर्फ क्षणिक अपराध का प्रश्न है या फिर साधुओं की हत्या के पीछे कोई साजिश है? क्या यह अंधविश्वास का प्रश्न है या फिर कोई विश्वास के साथ संगठित अपराध का प्रश्न है? 

                  जनाक्रोश को शांत करने के लिए संतों की हत्याओं पर पर्दा डालने का काम हो रहा है और संगठित अपराध, संगठित साजिश को ढका-तोपा रहा है? क्या सरकारें उस समय का इंतजार कर रही हैं जब साधु-संत वर्ग सड़कों पर उतर कर अपनी रक्षा के लिए कोई अहिंसक-हिंसक अभियान की शुरूआत कर दें। सभी वर्ग को सुरक्षा चाहिए, सभी वर्ग को हिंसा विहीन जीवन चाहिए। साधु-संत को भी हिंसा विहीन अपना जीवन जीने का अधिकार है, इस अधिकार से उन्हें वंचित क्यों किया जाना चाहिए? जिस तरह मॉब लिचिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश दिये हैं, केन्द्रीय सरकार भी मॉब लिंचिग पर दिशानिर्देश जारी किये हैं उसी प्रकार संतों की हत्या पर भी केन्द्रीय सरकार और सुप्रीम कोर्ट को गंभीर हो जाना चाहिए। पर घोर चिंता की बात है कि अभी तक केन्द्रीय सरकार और सुप्रीम कोर्ट तक इस प्रसंग पर गंभीरता पूर्वक विचार ही नहीं किया है। 

                आमतौर पर ऐसी दूसरी हत्याओं की श्रृंखला पर राजनीति भी गर्मा जाती है, राजनीति बहस का विषय बन जाती हैं पर राजनीति भी न तो अभियानी है और न ही राजनीति इन हत्याओं को विमर्श और बहस में लाना चाहती है। जबकि संतों की हत्याएं गंभीर साजिश की ओर इंगित करती हैं। कोरोना संक्रमण काल के कारण शायद ये हत्याएं राजनीति को प्रभावित नहीं कर पा रही हैं। पर भविष्य में ऐसी हत्याएं राजनीति को जरूर प्रभावित करेंगी और सरकारों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर सकती हैं।

               महाराष्ट के पालघर से लेकर नांदेड़ तक जितनी भी हत्याएं हुई हैं उन हत्याओं की परिस्थिति देखने से राज्य सरकारों और उनकी पुलिस पर उगंलियां उठनी स्वाभाविक है। जब आप हत्या की परिस्थितियों का विश्लेषण करेंगे तो पता चल जायेगा कि पुलिस कुछ न कुछ जरूर छिपा रही है और साजिश के गुनहगारों को बचाना चाहती है। पालघर में दो साधुओं और उनके चालकों की हत्या की परिस्थितियां भी देख लीजिये। पुलिस का कहना है कि पालघर की घटना क्षणिक अपराध का प्रश्न है, ग्रामीण फसल चोरों से परेशान थी, साधुओं को फसल चोर समझ लिया गया था। जिन साधुओं की हत्या हुई है, वे साधु अपनी कार में सवार थे और गेरूआ वस्त्रधारी थी। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि फसल चोर क्या कार में चोरी करने जाते हैं और गेरूआ वस्त्र पहन कर जाते हैं? क्या कोई वृद्ध भी जो ठीक तरह से चल फिर नहीं सकता है वह भी चोरी करने जाता है? क्या चोरी करने जाने वाले लोग निहत्थे होते हैं? क्या पाल घर के ग्रामीणों को यह नहीं मालूम था कि गेरूआ वस्त्र में साधु ही होते हैं? क्या पालघर के ग्रामीणों ने कभी साधु-संत नहीं देखे थे? साजिश नहीं होती तो ये साधुओं को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर देते। 70 साल के महाराज कल्पवृक्षगिरी और 35 साल के सुशील गिरी जुना अखड़ा से जुडे हुए थे। जुना अखाड़ा का साफ कहना है कि उनके संतों की हत्या एक गहरी साजिश के तहत हुई है। पालघर जहां पर हत्या की घटना घटी है, वह क्षेत्र ईसाई मिशनरी का प्रभाव क्षेत्र में आता है, वहां पर ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां भी काफी तेज है, जुना अखाड़ा का कहना है कि कुछ सालों से ईसाई मिशनरी ने संतों के खिलाफ भड़काने का कार्य किया है। पालघर की घटना के गुनहगारों को बचाने के लिए ईसाई मिशनरी से जुडे एनजीओ का सक्रिय होना भी बहुत सारे प्रश्न को खडे करते हैं?

                  महाराष्ट के नांदेड में हुई संत और उनके सेवादार की हत्या भी काफी संदिग्ध है। अभी अभी नांदेड में संत सदगुरू शिवाचार्य नागठणकर महाराज और उनके सेवादार भगवान शिंदे की हत्या कर दी गयी है। पुलिस इस लोमहर्षक घटना को दबाने के लिए चोरी का हथकंडा बता दिया। पुलिस का कहना है कि चोरी की दृष्टि से आश्रम में घुस कर हत्या की गयी है। हत्यारे को नशेड़ी घोषित कर दिया गया। नशेड़ी को गुनहगार बना कर पुलिस असली गुनहगारों को बचा गयी। पंजाब के अंदर में एक संत जिनका नाम महात्मा योगेश्वर था। उनके आश्रम में घुस कर उन्हें तेज हथियार से धड अलग कर दिया गया था। हत्या वीभत्स थी। महात्मा योगेश्वर वृद्ध थे। इस हत्या का कोई सुराग तक नहीं मिला है। पंजाब के होशियार पुर में एक संत हैं पुष्पिंदर महाराज। पुष्पिंदर महाराज पर रात में जानलेवा हमला हुआ, उनके शरीर पर गभीर हमले हुए, वे किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब हुए। पंजाब पुलिस कहती है कि पुष्पिंदर महराज पर हमला किसी सिरफिरे या फिर नशेड़ी गिरोह का हाथ हो सकता है।

              जहां तक पंजाब का प्रश्न है तो वहां पर थोड़े से अंतराल में कई हिन्दू नेताओं की हत्या हुई थी, जब जांच आगे बढी और सरकार ईमानदारी दिखायी तो सच सामने आ गया। पाकिस्तान परस्त गिरोह ने हिन्दू नेताओं की हत्या एक साजिश के तौर पर की थी उनका एक ही मकसद घृणा का वातावरण बना कर शांति-सदभाव को प्रभावित करना। सोशल मीडिया पर एक साधु की दिल दहला देने वाली वीडीओ काफी चर्चा में आयी थी। एक विशेष समुदाय के युवक उस साधु को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं और लोग तमाशबीन बन कर देख रहे हैं। उस  वीडीओ पर न तो सरकार ने और न ही किसी न्यायालय ने सज्ञान लिया था। इस कारण उस वीडीओ की सच्चाई सामने आने से रह गयी।

                      संतों की दो संस्कृतियां हैं, दो श्रेणियां हैं। एक ढोंगी, और दूसरा निरीह। ढोगी संस्कृति के संतो ंके पास पुलिस की सुरक्षा है, अपनी सुरक्षा है, ये पंचसितारा टाइप के आश्रम में रहते हैं जहां पर आम श्रद्धालुओं के फटकने की कोई गुजांइश ही नहीं होती है। इनके पास मंत्री से लेकर नौकरशाह तक आशीर्वाद के लिए दौड़ लगाते हैं, धन पशु इनके सामने तो शरणागत रहते ही हैें। इनकी हत्या होगी तो फिर तूफान आ जायेगा, सरकारें हिल जायेंगी। हत्या तो निरीह संस्कृति और श्रेणी के संतों की हो रही है। ऐसे वर्ग के संत न केवल अभावों में जिंदगी जीते हैं बल्कि उनके लिए बहुत सारी सुविधाएं और जरूरते कोई मायने नहीं रखती हैं। इनकी अपनी मोक्ष की अभिलाषा होती है, मो़क्ष की कसौटियां होती हैं। जीवन रक्षक साधनों पर ये जीवित होते हैं। ऐसी संस्कृति और श्रेणी के संत राजनीति और घृणा से दूर भी रहते हैं। इनके लिए तो मानव कल्याण और स्वयं की मुक्ति ही सर्वश्रेष्ठ इच्छा होती है। छल-प्रपंच से दूर होते हैं। अगर ये छल-प्रपंची होते तो फिर ये अपनी सुरक्षा खुद कर लेते और साजिशपूर्ण हिंसा का आसान शिकार कभी भी नहीं बनते।

                   देश की राजनीति का एक वर्ग संतों से घृणा करता है, उनके घृणा की कसौटी राजनीति ही है, वोट बैंक की मानसिकताएं हैं। राजनीति का एक बड़ा वर्ग यह मान लिया है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत संत ही हैं। संत ही भाजपा को सत्तासीन करने में भूमिका निभाते हैं। कुछ मजहबी मानसिकताएं भी ऐसे ही विचार रखते हैं। अगर ऐसे विचार अपनी भूमिका नही निभाते होते तो फिर निहत्थे और निरीह श्रेणी के संतों की हत्या पर देश में तूफान खड़ा कर दिया जाता। तथाकथित विदेशी मानवाधिकार संस्थाएं भी भारत के खिलाफ आग उगलना शुरू कर देती। क्या आपने संतों की हत्याओं पर किसी विदेशी-देशी मानवाधिकार संस्थाओं को चिखते-चिल्लाते हुए देखा-सुना है। आतंकवादियों और खूंखार अपराधियों की हत्या और उत्पीड़न पर चिखने और चिल्लाने वाले देशी-विदेशी मानवाधिकार संस्थाओं को संतों की हत्याएं क्यों नहीं रूलाती हैं?

                     संतों को प्रतिक्रियागत हिंसक बनने के लिए बाध्य मत कीजिये। सोशल मीडिया पर जो चिंता और आक्रोश है वह यह कहता है कि संतों को अब प्रतिक्रियागत हिंसक होना ही होगा, शस्त्र रखना ही होगा, अपने दुश्मनों का संहार करना ही होगा। सोशल मीडिया पर विचार यह आया कि जब सभी भगवान शस्त्रधारी हैं तो फिर हमारे संत शस्त्रहीन क्यों हैं? अगर इनके पास शस़्त्र होता तो फिर संत साजिशपूर्ण हत्या के आसान शिकार कभी नहीं होते। अगर सही में संत शस्त्रधारी होकर अपना नियत्रण खो दे और हिंसा पर उतारू हो जाये ंतो फिर कैसी हिंसक स्थिति उत्पन्न होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। केन्द्रीय और राज्य सरकारों को संतों की सुरक्षा प्रदान करने के लिए गंभीर प्रयास करने ही चाहिए।

 

 


 

 



 



 















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