मूर्तिमान संघर्ष तथा जन्मजात विद्रोही थे जार्ज

आपातकाल के अप्रतिम योद्धा जॉर्ज फर्नांडिस राजनेता, पत्रकार एवं ट्रेड यूनियन नेता होने के साथ -साथ मूर्तिमान संघर्ष तथा जन्मजात, सास्वत विद्रोही थे। वह 9 बार लोकसभा के लिए तथा एक बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए जाति एवं धर्म के आधार पर मतदान के लिए कुख्यात बिहार से उन्होंने धर्म और जाति की बेड़ियों को तोड़कर अनेक बार लोकसभा में पहुंचने में सफलता प्राप्त की। वह कन्नड ,मराठी, हिंदी,लैटिन,तुलु, मलयाली, उर्दू, तमिल और अंग्रेजी 10 भाषाओं के जानकार थे।जॉर्ज के अनुसार उनके पिता उन्हें  एडवोकेट बनाना चाहते थे वह चाहते थे कि जॉर्ज अधिवक्ता बनकर पारिवारिक विवादों का निस्तारण कराएं किंतु पारिवारिक संपत्ति को लेकर चल रहे निरंतर विवादों तथा पिता की हठधर्मिता एवं दादागिरी को देखकर पिता के प्रति विद्रोह कर उन्होंने अधिवक्ता बनने से इंकार कर  दिया। अधिवक्ता बनने से इनकार करने पर परिवार की हार्दिक इच्छा थी कि वह पादरी बनकर अपने धर्म एवं समुदाय की सेवा करें ,जिसके लिए शिक्षा ग्रहण कर उन्हें धर्म और धार्मिक अध्ययन हेतु सेंट पीटर सेमिनरी बैंगलोर भेजा गया था। 16 वर्ष की उम्र में उन्हें 1946 से 1948 तक रोमन कैथोलिक पादरी का प्रशिक्षण दिया गया, किंतु सेमिनरी की व्यवस्था को देखकर उनका क्रांतिकारी एवं विद्रोही स्वभाव वहां की व्यवस्था से असंतुष्ट होकर विद्रोह कर बैठा और 19 वर्ष की आयु में  धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने से इंकार कर सेमिनरी का परित्याग कर दिया,उक्त संदर्भ में उल्लेखनीय है की सेंट पीटर सेमिनरी में वहां के फादर्स/ अध्यापक ऊंची  टेबल पर बैठकर अच्छा भोजन करते थे जबकि प्रशिक्षणार्थियों को ऐसी सुविधा प्राप्त नही थी तथा उन्हें निम्न कोटि का भोजन प्रदान किया जाता था।वहां के फादर्स एवं व्यवस्थापकों के कर्म, आचरण एवं वाणी में साम्य न होकर परस्पर विरोध था। वह कहते कुछ थे और करते कुछ थे। इस दोमुंहेपन के खिलाफ उनका क्रांतिकारी एवं विद्रोही मन धार्मिक शिक्षा के प्रति विद्रोह कर उठा ।वह सेंट पीटर सेमिनरी धार्मिक शिक्षण संस्थान का परित्याग कर उन्नीस वर्ष की उम्र में किसी को बिना कुछ बताए माया लोक मुंबई पहुंच गए ।मुंबई में वह सड़कों पर रात्रि व्यतीत करते हुए अपने लिए कामकाज खोजते रहे ।कुछ समय पश्चात एक अखबार में उन्हें प्रूफ्र रीडर की नौकरी मिली, जहां उनका संपर्क अनुभवी यूनियन नेता क्लासिक डिमेलो तथा समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया से हुआ, जिनका उनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। यूनियन नेता क्लासिक डिमेलो के सानिध्य में रहकर वह मजदूर आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए उनका प्रतिनिधित्व करने लगे और एक समय ऐसा आया कि वह अपने संघर्ष के बल पर मुंबई में ट्रेड यूनियन के सर्वमान्य नेता बन गए। मजदूर आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए वह उनकी मांगों तथा जायज हक के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे।इसी दौरान वे मुंबई नगर निगम के सदस्य बने तथा 1961 से लेकर 1967 तक महानगर के प्रतिनिधि सभा में शोषित मजदूरों  की आवाज को जोरदारी के साथ उठाते रहे। उनके संघर्ष एवं जज्बे को देखते हुए संयुक्त समाजवादी पार्टी ने सन 1967 के चुनाव मे तत्कालीन कांग्रेस के प्रसिद्ध नेता सदाशिव कानोजी पाटिल के विरुद्ध प्रत्याशी बनाया। उस समय श्री पाटिल का यह कहना था कि चुनाव में उन्हें भगवान भी नहीं हरा सकता और वह तथा उनकी पार्टी कांग्रेस उनकी जीत के लिए  पूर्णरूपेण निश्चिंत थे।जार्ज ने इस अ‌वसर को समझा तथा मजदूर आंदोलन के अपने अनुभव से मुंबई की दीवारों को अपने पोस्टर से पटवा दिया जिसमें लिखा था कि भगवान तो नहीं हरा सकता किंतु आप मतदाता किसी को भी हरा सकते हैं । जॉर्ज का यह कथन आम जनता को प्रभावित करने में सफल रहा और श्री एस. के .पाटिल को जार्ज के समक्ष मुंह की खानी पड़ी तथा लगभग 50% मत प्राप्त करने में सफल हुए। चुनाव जीतने के बाद वह  'जार्ज द जायंट किलर' के नाम से विख्यात हुए ।इस चुनाव से कांग्रेस के प्रत्याशी श्री एस. के. पाटील अत्यंत हतोत्साहित हुए तथा उन्होंने चुनावी राजनीति से सन्यास ले लिया ।उल्लेखनीय है कि पाटिल राजनीति से संन्यास लेने तक कांग्रेस केआर्थिक व्यवस्थापक के रूप में भी कार्य कर रहे थे । इस चुनाव को जीतकर जॉर्ज पहली बार संसद में पहुंचे तथा पूरे राष्ट्र में उनके नाम की चर्चा हुई । सन 1973 में उन्हें ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष चुना गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 3 वेतन आयोगों का गठन हो चुका था किन्तु रेल कर्मचारियों के वेतन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गयी थी,जार्ज नेऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष बनते ही कर्मचारियों की वेतन एवं अन्य मांगों के समर्थन में व्यापक हड़ताल आयोजित करने का निर्णय लिया गया ।8 मई 1974 को मुंबई में हड़ताल शुरू हुई, जिसमें बाद में जार्ज के प्रभाव से टैक्सी ड्राइवर, इलेक्ट्रिसिटी यूनियन और ट्रांसपोर्ट यूनियन भी इस हड़ताल में शामिल हो गई। लगभग पूरा देश रुक सा गया। आरंभ में इंदिरा सरकार ने इस हड़ताल की ओर ध्यान नहीं दिया किंतु बाद में उसकी व्यापकता को देखते हुए उसे निर्ममता से कुचलकर हजारों कामगारों को जेल में डाल दिया गया ,जिससे हड़ताल तो समाप्त हुई किंतु इंदिरा जी का एक स्थाई विरोधी जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म हुआ ,जिन्होंने रेलवे आंदोलन के विरुद्ध सरकार के दमन को आजीवन याद रखते हुए कांग्रेस सरकार का आजीवन विरोध किया और उसके विरुद्ध निरंतर संघर्षरत रहे,। 1975 में आपातकाल की घोषणा के पश्चात प्रमुख विपक्षी दलों के समस्त नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया किंतु जार्ज वेश बदलकर गिरफ्तारी से बचते हुए निरंतर आपातकाल के विरुद्ध आंदोलनरत रहे । जार्ज तो गिरफ्तारी से बचते रहे किंतु आपातकाल लगते ही उनके भाई तथा मंगलौर ट्रेड यूनियन के नेता माइकल को गिरफ्तार कर लिया गया ।जॉर्ज की गिरफ्तारी न होने से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी शासन व्यवस्था से अत्यंत असंतुष्ट थी ।उनके निर्देश से कर्नाटक सरकार ने उनके छोटे भाई लारेंस को गिरफ्तार कर लिया और बुरी तरह प्रताड़ित किया । किसी समय जार्ज की मित्र रही  अभिनेत्री स्नेह लता रेड्डी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जहां लंबी बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गई।  कांग्रेस एवं इंदिरा सरकार के प्रति  घृणा से भरे हुए जार्ज आपातकाल के विरुद्ध स्थान स्थान पर विस्फोट कर जनता को उसके विरुद्ध जागृत करते हुए आंदोलन चलाना चाहते थे ,जिसके लिए अपने मित्रों को संगठित कर डायनामाइट इकट्ठा कर योजना को मूर्त रूप देना चाहते थे ,किंतु उसके पूर्व ही वह कोलकाता में 10 जून 1976 को गिरफ्तार कर लिए गए ।कोलकाता में जार्ज की गिरफ्तारी के समय  श्रीमती इंदिरा गांधी मास्को में थी पत्रकार विक्रम राव के अनुसार जार्ज की गिरफ्तारी के बाद इंदिरा जी से निर्देश लेने में समय लगा। इसी बीच  चर्च के पादरी विजयन ने कोलकाता में ब्रिटिश और जर्मन उपराजदूतावास को बता दिया गया कि जार्ज को कोलकाता में गिरफ्तार कर लिया गया है और और यह तय है कि उन्हें एनकाउंटर में मार दिया जाएगा। यह खबर तुरंत लंदन और बोन पहुंच गई ।ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन, जर्मन चांसलर विलिब्रांड और आस्ट्रिया के चांसलर ब्रूनो कायेस्की जो सोशलिस्ट इंटरनेशनल के नेता थे, एक साथ इंदिरा गांधी को मास्को में फोन पर गंभीर परिणामों से आगाह किया कि यदि चार्ज को मार दिया गया तो इससे उनके भारत से संबंध खराब हो जाएंगे।जिसके कारण श्रीमती गांधी का जार्ज की हत्या करने का मंसूबा पूरा नहीं हो सका था। जेल में जार्ज को अधिकतम प्रताड़ित किया गया और उन पर थर्ड डिग्री तक टॉर्चर किया गया,निरंतर हथकड़ियों में जकड़ कर रखा गया। उनकी हथकड़ी से बंधी हुई एक फोटो बड़ी लोकप्रिय हुई। कालांतर में आपातकाल की समाप्ति तथा लोकसभा के चुनाव की घोषणा के साथ जेलों में बंद नेताओं को रिहा किया गया किंतु जॉर्ज को रिहा नहीं किया गया । जॉर्ज की रिहाई नहीं हो सकी। लोकसभा के निर्वाचन में जार्ज बिहार के मुजफ्फरपुर से प्रत्याशी बने तथा जेल में ही रहकर चुनाव लड़े ।चुनाव में  हथकड़ियों में जकड़े हुए जॉर्ज की फोटो से युक्त पोस्टरों से मुजफ्फरनगर की दीवारों को पाट दिया गया तथा जार्ज के कटआउट को पूरे निर्वाचन क्षेत्र में घुमाया गया जिससे प्रभावित  होकर मुजफ्फरपुर की जनता ने जार्ज के पक्ष में एकपक्षीय मतदान कर अप्रत्याशित 300000 से अधिक  मतों से विजयश्री प्रदान की। सरकार गठित होने पर वह देसाई सरकार में पहले संचार मंत्री बाद में उद्योग मंत्री बने। उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी कोका कोला तथा आईबीएम को विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम फेरा के नियमों का पालन करने से इंकार करने  देश छोड़ने का आदेश देकर देश से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया। उक्त अधिनियम के तहत विदेशी कंपनियों को अपनी भारतीय सहयोगी कंपनियों में बहुलश: हिस्सेदारी को बेचना होता ।जार्ज चाहते थे कि वह विदेशी कंपनियां अपनी कंपनियों में सहयोगी कंपनियों को हिस्सेदारी तो दे ही साथ ही अपना फार्मूला भी कंपनियों को उपलब्ध कराएं जिनके लिए विदेशी कंपनियां तैयार नहीं थी। उनका कहना था कि यह व्यापार से जुड़ी गोपनीय सूचना है जिस को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता ।फलस्वरूप सरकार ने कोका कोला तथा  आईबीएम को अपना व्यापार करने के लिए लाइसेंस देने से मना कर दिया गया, जिससे उन्हें भारत छोड़ना पड़ा ।यह अलग तथ्य है कि बाद में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पीवी नरसिम्हा राव सरकार द्वारा कोका कोला सहित अनेक विदेशी कंपनियों को भारत आने की अनुमति प्रदान कर दी गई और तब से यह विदेशी कंपनियां भारत में व्यापार कर रही है।

बाजपेई सरकार द्वारा वर्ष 2002 में हिंदुस्तान पैट्रोलियम तथा भारत पेट्रोलियम के का नौ निजी करण का प्रयास तत्कालीन विनिवेश मंत्री अरुण शौरी के प्रस्ताव पर किया गया, जिस का जोरदार विरोध जार्ज द्वारा किया गया। अपने मन की बात कहने से वह नहीं चूके ,उनका मानना था कि बेचने की नीति अमीर को और अधिक अमीर बनाने तथा एकाधिकार बनाए रखने की नीति है। उनके विरोध के चलते हिंदुस्तान पेट्रोलियम एवं भारत पैट्रोलियम को नहीं बेचा जा सका। प्रकरण माननीय सर्वोच्च न्यायालय में जाने पर श यह व्यवस्था दी गई इन कंपनियों की बिक्री के पूर्व संसद की अनुमति लेना आवश्यक है, किंतु शीघ्र चुनाव होने के कारण सरकार में इस प्रकरण को संसद में ले जाना उचित नहीं समझा गया । भारतीय राजनीति में जॉर्ज फर्नांडीज एक ऐसे राजनेता थे जो वह सोचते थे, वही बोलते थे और वही करते थे ।वह मनसा ,वाचा, कर्मणा एक थे। उन्होंने आजीवन अपने कार्य स्वयं किए कभी किसी सहयोगी या कर्मचारी का सहयोग नहीं लिया। अपने कपड़े आजीवन स्वयं धोते रहे ।चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी मान्यता स्पष्ट रूप से प्रकट की। चीन भारत का नंबर 1 तथा पाकिस्तान नंबर 2 का दुश्मन है ।तिब्बत की स्वतंत्रता के संदर्भ में अपने स्पष्ट विचार प्रस्तुत किए तथा दलाई लामा की खुले रूप में पक्षधरता की। जिसके चलते बाजपेई सरकार को चीन से संबंध सामान्य बनाए रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।

अपनी अब तक की राजनीति एवं सिद्धांतों के प्रतिकूल जाकर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर रखने हेतु लगभग समस्त राजनीतिक दलों के लिए अछूत भारतीय जनता पार्टी को आगे बढ़कर सहयोग दिया और राजनीति में व्याप्त अस्पृश्यता को दूर करते हुए स्व.श्री अटल बिहारी वाजपई की सरकार को को सत्तारूढ़ करने में अप्रत्याशित योगदान दिया ।भाजपा को 2 सीटों से सत्ता तक लाने में जार्ज का योगदान अभूतपूर्व है ,अगर जार्ज न होते तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन न होता और वाजपेई जी की सरकार भी न बनती ।भाजपा को कोई राम मंदिर, धारा 370 और कॉमन सिविल कोडके साथ स्वीकार करने के लिए तैयार नही था और भाजपा के लिए यह उसके मुख्य राजनीतिक आधार थे , वह उन्हें छोड़ने के लिए तैयार न थी। चार्ज ही थे जिन्होंने भाजपा को अपने राजनीतिक एजेंडे से इन्हें दूर करने के लिए तैयार किया। संभव है भाजपा भी इनसे दूरी बनाकर राजनीति की मुख्यधारा में आकर सत्ता हथियाना चाहती रही हो ,किंतु उसके नेताओं द्वारा भाजपा के आधारभूत  धारा 370 ,राम मंदिर एवं कॉमन सिविल कोड से दूर जाने की हिम्मत नहीं थी। जार्ज ने भाजपा को यह अवसर उपलब्ध कराया और उनके सहयोग से भाजपा ने अपने राजनीतिक एजेंडे से परे हटकर अन्य राजनीतिक दलों के मध्य स्वीकार्यता प्राप्त की और सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंची।भाजपा के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक बनकर राजनीतिक दलों के मध्य कुशलता पूर्वक सामंजस्य बनाए रखने का कार्य किया। कई मौकों पर वह बाजपेई के दूत बनकर क्षेत्रीय नेताओं से भी मिले।।वाजपेई सरकार में वह पहले  रेल मंत्री और बाद में रक्षा मंत्री के रूप में सफलतापूर्वक कार्य किया। इसके पूर्व वह वीपी सिंह की सरकार में भी रेल मंत्री के रूप में कार्य कर चुके थे। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने कोंकण रेल परियोजना तथा रक्षा मंत्री के रूप में पोखरण परमाणु विस्फोट को मूर्त रूप देने में अपना योगदान दिया। यह अलग बात है कि पोखरण परमाणु परीक्षण का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री श्रीअटल बिहारी बाजपेई जी को मिला ,उनके हिस्से में कुछ नहीं आया ।बाद में कारगिल युद्ध के समय ताबूत घोटाले का आरोप लगा जिसके चलते उन्हें रक्षा मंत्री के पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उन्होंने भाजपा की अस्पृश्यता तो दूर कर दी किंतु स्वयं समाजवादियों के लिए अस्पृश्य हो गये । समाजवादी विचारधारा के उनके सहयोगी उनसे दूर जा चुके थे तथा उनके चेले उन्हें भविष्य के लिए उपयोगी न पाकर उनसे मुंह मोड़ बैठे थे। परिणाम स्वरूप उन्हें अपना अंतिम चुनाव समाजवादियों द्वारा अपनी मूल पार्टी से टिकट न दिए जाने के कारण मुजफ्फरपुर से निर्दलीय लड़ना पड़ा तथा मुजफ्फरपुर की जनता ने भी उनका सहयोग न दिया और उन्हें वहां से बुरी तरह पराजित होना पड़ा। ऐसे समय में भाजपा भी उनके सहयोग के लिए आगे नहीं आई और उन्हें अकेले छोड़ दिया जॉर्ज ने अपने जीवन में बहुतों को बहुत कुछ दिया तथा दलितों पीड़ितों कामगारों मजदूरों के लिए निरंतर संघर्ष किया किंतु किसी ने भी समय आने पर उनका सहयोग नहीं किया और वह अंतिम समय पर पूर्णरूपेण एकाकी हो गए आज जॉर्ज हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनके विचार उनके कार्य उनका संघर्ष हम सबके बीच है जिसके आधार पर वह भारत के अमर पुत्र बनकर जनमानस के दिलो-दिमाग में लंबे समय तक छाए रहेंगे। उचित होगा कि उनकी लंबी सेवाओं को देखते हुए राजग सरकार उनके लिए भारत रत्न दिए जाने के प्रश्न पत्र विचार करें निश्चित रूप से जॉर्ज को भारत रत्न दिए जाने पर भारत रत्न का सम्मान ही स्वत: सम्मानित होगा तथा भारतीय जनता ,भाजपा एवं राजग की ओर से उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

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